असम में अहोम राजवंश की करीब छह सदी पुरानी राजधानी के अवशेषों को अब यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में जगह दिलाने की कोशिश शुरू हो गई है। भारत ने रंगपुर-शिवसागर परिसर को इसके लिए औपचारिक रूप से नामित कर दिया है। यह जानकारी असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने सोशल मीडिया पर साझा की।
छह सदी तक अटूट रहा अहोम राज
अहोम राजवंश ने 1228 में असम में अपनी सत्ता स्थापित की थी और उसके बाद 1826 तक लगातार ब्रह्मपुत्र घाटी पर राज किया। इतने लंबे समय तक बिना किसी बड़े व्यवधान के एक ही राजवंश का शासन चलना अपने आप में खास बात मानी जाती है। रंगपुर-शिवसागर परिसर शिवसागर के ऐतिहासिक राजधानी क्षेत्र में फैला हुआ है और इसमें उस दौर के मंदिर, राजमहल, बड़े जलाशय और उन्नत इंजीनियरिंग के नमूने शामिल हैं, जो अहोम शासकों की वास्तुकला और तकनीकी समझ को दिखाते हैं।
रंग घर, एशिया का सबसे पुराना एम्फीथिएटर
इस परिसर में शामिल इमारतों में सबसे ज्यादा पहचान रंग घर की है। मुख्यमंत्री सरमा इसे एशिया का सबसे पुराना बचा हुआ एम्फीथिएटर बताते हैं और आज भी यह शिवसागर में अहोम इंजीनियरिंग की सबसे स्पष्ट झलक देता है।
नामांकन की प्रक्रिया कैसे पूरी हुई
यूनेस्को में भारत के स्थायी मिशन ने 19.06.2026 को रंगपुर-शिवसागर परिसर को औपचारिक रूप से नामांकित किया, और इसे यूनेस्को की श्रेणी (iii) और (iv) के तहत शामिल करने का अनुरोध किया गया है। ये श्रेणियां किसी सांस्कृतिक परंपरा की गवाही और किसी स्थापत्य समूह की असाधारणता को परखती हैं। सरमा ने शुक्रवार रात एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए यह जानकारी सार्वजनिक की और बताया कि नामांकन का कागजी काम पहले ही पूरा हो चुका है।
चराईदेव मोइदम की कड़ी से जुड़ाव
असम के लिए यह पहला मौका नहीं है जब अहोम विरासत को यूनेस्को से मान्यता दिलाने की कोशिश हो रही हो। अहोम राजाओं के समाधि स्थल चराईदेव मोइदम को 2024 में ही यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया जा चुका है। सरमा ने नई नामांकन को उसी सफलता की अगली कड़ी बताया। उन्होंने कहा, "साथ में ये दोनों स्थल अहोम की पूरी कहानी कहते हैं, एक जगह राजवंश आराम करता है तो दूसरी जगह उसने राज किया।" इस तरह उन्होंने चराईदेव के समाधि स्थल को शिवसागर की सत्ता की धरती से जोड़ा।
केंद्र सरकार को धन्यवाद
सरमा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी धन्यवाद किया और उनके प्रयासों को असम की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को दुनिया भर में पहचान दिलाने की दिशा में एक "अभूतपूर्व पहल" बताया। मुख्यमंत्री के इस पोस्ट से साफ है कि राज्य और केंद्र दोनों मिलकर असम के अहोम कालीन स्थलों को दुनिया की बाकी बड़ी धरोहरों की सूची में शामिल कराने के लिए लगातार कोशिश कर रहे हैं।



















