देश भर की सड़कों पर बिना वैध थर्ड पार्टी बीमा के दौड़ रहे करोड़ों वाहनों पर शिकंजा कसने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक और सख्त रुख अपनाया है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने केंद्र सरकार को एक ऐसी प्रायोगिक परियोजना तैयार करने का सुझाव दिया है, जिसके तहत वैध बीमा न रखने वाले वाहनों को पेट्रोल पंपों पर ईंधन देने से रोका जा सके। शीर्ष अदालत ने देश में चल रहे 56 प्रतिशत से अधिक बिना बीमा वाले वाहनों की स्थिति को बेहद चिंताजनक बताते हुए कहा कि यह स्थिति सड़क दुर्घटना के पीड़ितों को त्वरित कानूनी और वित्तीय सुरक्षा पाने के अधिकार से वंचित करती है।
पेट्रोल पंपों पर ईंधन वितरण को बीमा सत्यापन से जोड़ने का प्रस्ताव
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (IRDAI) और सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) आपस में गहन विचार-विमर्श करके एक प्रायोगिक योजना का खाका तैयार करें। इस योजना के माध्यम से देश भर के पेट्रोल पंपों पर ईंधन वितरण प्रणाली को वाहनों के लाइव इंश्योरेंस डेटाबेस से सीधे जोड़ा जाएगा। यदि कोई वाहन चालक अपने वाहन का नवीनीकृत थर्ड पार्टी बीमा प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाता है या सिस्टम में उसका बीमा समाप्त दिखता है, तो उसे तब तक पेट्रोल या डीजल नहीं दिया जाएगा जब तक वह वैध बीमा पॉलिसी हासिल न कर ले।
पीठ ने स्पष्ट किया कि ईंधन वितरण पर रोक लगाने की इस व्यवस्था से दोहरे दूरगामी परिणाम हासिल होंगे। पहला लाभ यह होगा कि बिना बीमा या बिना पंजीकरण के अवैध रूप से चल रहे वाहनों की तुरंत पहचान की जा सकेगी। दूसरा, यह व्यवस्था वाहन मालिकों को अपनी कानूनी जिम्मेदारियां पूरी करने और समय पर बीमा का नवीनीकरण कराने के लिए प्रेरित करेगी। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी दर्ज किया कि पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय को भी सैद्धांतिक तौर पर इस तरह की प्रायोगिक परियोजना को चुनिंदा क्षेत्रों में लागू करने में कोई आपत्ति नहीं है।
नए वाहनों के लिए अनिवार्य बीमा अवधि में एक-एक वर्ष की बढ़ोतरी
साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने नए चारपहिया वाहनों के लिए खरीद या पंजीकरण के समय 3 साल और नए दोपहिया वाहनों के लिए 5 साल की थर्ड पार्टी बीमा पॉलिसी लेना अनिवार्य किया था। हालांकि, उस ऐतिहासिक आदेश के आठ वर्ष बीत जाने के बाद भी सड़कों पर बड़ी संख्या में वाहन बिना बीमा के चलाए जा रहे हैं। प्रारंभिक बहु-वर्षीय बीमा अवधि समाप्त होने के बाद अधिकांश वाहन मालिक अपनी नीतियों का नवीनीकरण नहीं कराते हैं, जो एक गंभीर सुरक्षा चूक है।
हालांकि IRDAI और जनरल इंश्योरेंस काउंसिल (GIC) ने इस अनिवार्य बीमा अवधि को आगे न बढ़ाने की सिफारिश की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सड़क सुरक्षा और जनहित को सर्वोपरि मानते हुए इस अवधि में विस्तार करने का फैसला सुनाया। पीठ ने निर्देश दिया कि अब से नए चारपहिया वाहनों की खरीद पर 4 वर्ष और नए दोपहिया वाहनों की खरीद पर 6 वर्ष की थर्ड पार्टी बीमा पॉलिसी खरीदना अनिवार्य होगा। शीर्ष अदालत ने IRDAI को निर्देश दिया है कि इस फैसले से संबंधित आवश्यक प्रशासनिक दिशानिर्देश तुरंत जारी किए जाएं ताकि नए नियमों को तत्काल प्रभाव से लागू किया जा सके।
देश में 56 फीसदी वाहन बिना बीमा के, संसदीय समिति के चौंकाने वाले आंकड़े
शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में वित्त संबंधी स्थायी समिति की 2024-25 की रिपोर्ट के आंकड़ों का हवाला देते हुए स्थिति की भयावहता को रेखांकित किया। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कुल 30.48 करोड़ पंजीकृत वाहन हैं, जिनमें से 16.54 करोड़ वाहन बिना किसी वैध बीमा कवर के सड़कों पर दौड़ रहे हैं। इसका सीधा अर्थ है कि देश के लगभग 56 प्रतिशत वाहन बिना किसी थर्ड पार्टी सुरक्षा के चलाए जा रहे हैं, जो कानून और सड़क सुरक्षा दोनों के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील विषय है।
अदालत ने टिप्पणी की कि इतनी बड़ी संख्या में बिना बीमा वाले वाहनों के कारण दुर्घटना पीड़ितों को मिलने वाला वैधानिक संरक्षण निष्प्रभावी हो जाता है। जब कोई अनबीमाकृत वाहन किसी हादसे का शिकार होता है, तो पीड़ितों या उनके परिजनों को मिलने वाली मुआवजे की राशि में भारी देरी होती है। बीमा कंपनी का सुरक्षा चक्र न होने के कारण पीड़ितों को वाहन मालिक से सीधे मुआवजा पाने के लिए लंबी, खर्चीली और जटिल कानूनी लड़ाइयों का सामना करना पड़ता है, जिससे कई मामलों में उन्हें उचित न्याय ही नहीं मिल पाता है।
एएनपीआर कैमरों से स्वचालित ई-चालान और टोल प्लाजा पर भीड़ से राहत
राष्ट्रीय राजमार्गों पर होने वाली दुर्घटनाओं और टोल प्लाजा पर लगने वाली वाहनों की लंबी कतारों पर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल पर बल दिया। अदालत ने MoRTH और IRDAI को निर्देश दिया कि चुनिंदा व्यस्त राजमार्ग गलियारों और टोल बिंदुओं पर ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन (ANPR) कैमरे स्थापित किए जाएं। इन कैमरों की मदद से टोल प्लाजा पर वाहनों को भौतिक रूप से रोके बिना उनकी स्वचालित पहचान की जा सकेगी, जिससे टोल पर समय और ईंधन की बचत होगी।
अदालत ने निर्देश दिया कि इन ANPR कैमरों को बीमा सूचना ब्यूरो (IIB) और 'वाहन' पोर्टल के केंद्रीय डेटाबेस से सीधे जोड़ा जाए। जैसे ही कोई बिना बीमा वाला वाहन इन कैमरों के सामने से गुजरेगा, सिस्टम अपने आप उसकी पहचान करके स्वतः ई-चालान जारी कर देगा। इसके अतिरिक्त, राज्य पुलिस के पास मौके पर बीमा जांच की समान व्यवस्था न होने की समस्या को दूर करने के लिए पुलिस बलों को IIB और 'वाहन' पोर्टल से जुड़े हैंडहेल्ड उपकरण और मोबाइल ऐप उपलब्ध कराने का आदेश दिया गया है, ताकि रियल टाइम जांच और चालान की प्रक्रिया सुनिश्चित हो सके।
मोटर वाहन अधिनियम की धारा 146 का कड़ाई से पालन और नीति विकल्प
सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि मोटर वाहन अधिनियम की धारा 146 का उद्देश्य केवल दुर्घटना पीड़ितों को वित्तीय मुआवजा दिलाना ही नहीं है, बल्कि उन्हें और उनके परिवारों को लंबे मुकदमों और आर्थिक तंगी से बचाना भी है। जब सड़क हादसे में किसी व्यक्ति की जान चली जाती है या वह स्थायी रूप से दिव्यांग हो जाता है, तो परिजनों पर अचानक आर्थिक संकट आ खड़ा होता है। अनिवार्य बीमा व्यवस्था इसी आर्थिक संकट से सुरक्षा कवच प्रदान करती है।
सड़क दुर्घटना दावा मामलों में कई व्यापक निर्देश जारी करते हुए पीठ ने IRDAI को यह भी आदेश दिया कि वह निजी वाहन मालिकों के लिए बीमा विकल्पों को अधिक पारदर्शी और सुलभ बनाए। प्राधिकरण को सुनिश्चित करना होगा कि वाहन चालकों को कानून के तहत निर्धारित न्यूनतम कवरेज वाली मूल पॉलिसी के साथ-साथ व्यक्तिगत दुर्घटना कवर, ऐड-ऑन और स्वयं के वाहन की क्षति (ओन डैमेज) कवर जैसे विभिन्न अनुकूलित विकल्प आसानी से उपलब्ध कराए जाएं।



















