साइबर अपराध के लगातार उलझते तौर-तरीकों के बीच गुरुग्राम की एक सत्र अदालत ने डिजिटल अरेस्ट से जुड़े मामले में बेहद सख्त रुख अपनाया है। कथित तौर पर चवालीस लाख रुपये के फर्जीवाड़े में फंसे जोगिंदर नामक व्यक्ति को नियमित राहत देते हुए न्यायालय ने पुलिस अनुसंधान की कमजोर कड़ियों को उजागर किया। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश डॉक्टर गगन गीत कौर ने सत्रह सितंबर दो हजार छब्बीस को पारित अपने फैसले में रेखांकित किया कि मुख्य वित्तीय कड़ियों की तह तक पहुंचे बिना केवल सिम पंजीकरण के आधार पर अनिश्चितकालीन हिरासत न्यायसंगत नहीं ठहराई जा सकती। अदालत ने पचास हजार रुपये के मुचलके और समान राशि के एक स्थानीय जामिनदार की शर्त पर आरोपी की रिहाई का रास्ता साफ किया।
यह पूरा विवाद साइबर अपराध थाना मानेसर में उन्नीस दिसंबर दो हजार पच्चीस को दर्ज की गई प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या 0344 से उपजा है। अभियोजन पक्ष ने शुरुआत में भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं, जिनमें 318(4), 319, 336(2), 336(3) और 338 शामिल हैं, के साथ-साथ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66D के तहत आरोप गढ़े थे। इसके बावजूद जब साक्ष्यों का परीक्षण हुआ, तो जांच की अधूरी तैयारियों ने पुलिस के दावों को अदालत में कमजोर कर दिया।
दूरसंचार कर्मी बनकर बिछाया गया था जाल
अभियोजन की केस डायरी के मुताबिक, पीड़ित राम गणेश को आठ दिसंबर दो हजार पच्चीस को एक अज्ञात नंबर से कॉल प्राप्त हुई थी। फोन करने वाले धोखेबाजों ने खुद को एयरटेल के गुरुग्राम मुख्यालय का प्रतिनिधि घोषित किया और दावा किया कि पीड़ित के पहचान पत्रों का इस्तेमाल करके बेंगलुरु में एक लैंडलाइन सेवा सक्रिय की गई है। जालसाजों ने मनगढ़ंत कहानी रचते हुए पीड़ित को डराया कि इस संदिग्ध टेलीफोन लाइन के जरिए गैरकानूनी गतिविधियां संचालित हो रही हैं।
इसके तुरंत बाद पीड़ित को व्हाट्सएप पर स्थानांतरित कर दिया गया, जहां वर्दीधारी पुलिसकर्मियों और केंद्रीय जांच एजेंसियों के फर्जी अफसर बनकर बैठे शातिरों ने बातचीत शुरू की। राम गणेश को यह कहकर भयभीत किया गया कि उनके आधार नंबर से देश के कई राज्यों में बैंक खाते खोले गए हैं, जिनका सीधा संबंध मादक पदार्थों की तस्करी, अवैध हथियारों की खरीद-फरोख्त और हवाला नेटवर्क से है। लगातार वीडियो कॉल के जरिए पीड़ित पर डिजिटल निगरानी रखी गई और खुद को निर्दोष साबित करने तथा फंड वेरिफिकेशन कराने के नाम पर पैसे मांगे गए। झांसे में आकर पीड़ित ने पहले चौंतीस लाख रुपये और उसके कुछ ही समय बाद दस लाख रुपये विभिन्न खातों में स्थानांतरित कर दिए। पूरी रकम गंवाने के बाद ही पीड़ित को अहसास हुआ कि वह एक सुनियोजित साइबर षड्यंत्र में फंस चुके हैं।
सिम कार्ड का लेनदेन और वित्तीय सुरागों का अभाव
तकनीकी अनुसंधान के दौरान जांच एजेंसी ने पाया कि जिस कॉलिंग नंबर से पीड़ित से संपर्क साधा गया था, वह अभिलेखों में जोगिंदर के पते पर पंजीकृत था। इसी आधार पर पुलिस ने अठारह जून दो हजार छब्बीस को जोगिंदर को गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भेज दिया। हालांकि जमानत अर्जी पर बहस करते हुए बचाव पक्ष के वकील ने अदालत के समक्ष एकदम अलग तथ्य प्रस्तुत किए। वकील ने दलील दी कि जिस सिम और मोबाइल हैंडसेट की बात की जा रही है, उसे जोगिंदर ने घटना से काफी पहले, यानी छब्बीस अक्टूबर दो हजार पच्चीस को ही तीन सौ सत्तर रुपये में एक अनजान शख्स को बेच दिया था। बचाव पक्ष ने इस सौदे से जुड़े ऑनलाइन भुगतान का लेखा-जोखा भी रिकॉर्ड पर रखा और तर्क दिया कि कथित ठगी की वारदात सिम बेचे जाने के लगभग डेढ़ माह बाद घटित हुई थी।
अदालती कार्यवाही के दौरान यह हकीकत भी सामने आई कि ठगी गई चवालीस लाख रुपये की पूरी रकम में से एक भी पैसा जोगिंदर के खाते में जमा नहीं हुआ था। बैंक लेनदेन के विवरण से स्पष्ट हुआ कि चौंतीस लाख रुपये सीधे रिशेप क्लिनिक के खाते में गए थे, जबकि शेष दस लाख रुपये पैंशिया नेटवर्क्स प्राइवेट लिमिटेड के खाते में ट्रांसफर किए गए थे। इसके अलावा तलाशी के दौरान भी आरोपी से कोई आपत्तिजनक बरामदगी या नकदी हासिल नहीं की जा सकी थी।
अदालत का विश्लेषण और अनुसंधान पर तल्ख टिप्पणियां
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के उपरांत अतिरिक्त जिला सत्र न्यायाधीश ने पाया कि पुलिस चालान में ऐसा कोई सीधा प्रमाण मौजूद नहीं है जो यह सिद्ध करे कि डिजिटल निगरानी के वक्त संबंधित मोबाइल फोन वास्तव में जोगिंदर के हाथ में था। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि पंजीकृत नंबर का अपराध में जुड़ना निश्चित तौर पर रिकॉर्ड का हिस्सा है, किंतु इस बात का परीक्षण मुकदमे की सुनवाई के दौरान ही होगा कि आरोपी का उस लूटी गई रकम से कोई प्रत्यक्ष लेना-देना था या नहीं।
न्यायालय ने खासतौर पर उस वक्त गहरी नाराजगी जताई जब जांच अधिकारी से यह सवाल किया गया कि जिन कंपनियों और खातों में चौंतीस लाख व दस लाख रुपये जमा हुए, उनके स्वामियों के खिलाफ अब तक क्या कदम उठाए गए। जांच अधिकारी ने अदालत में दलील दी कि चूंकि लाभार्थी बैंक शाखा बेंगलुरु में स्थित है और स्थानीय स्तर पर काम का अत्यधिक दबाव था, इसलिए उस दिशा में पड़ताल को फिलहाल आगे नहीं बढ़ाया जा सका। पीठ ने इस स्पष्टीकरण को अत्यंत गैर-पेशेवर और गैर-जिम्मेदाराना ठहराते हुए फटकार लगाई कि मुख्य लाभार्थियों को छोड़कर केवल सिम धारक को लंबे समय तक जेल में नहीं रखा जा सकता।
अदालत ने गुरुग्राम पुलिस आयुक्त को आदेश की अधिकृत प्रति भेजने का निर्देश दिया ताकि शीर्ष स्तर पर यह समीक्षा हो सके कि गंभीर तकनीकी मामलों की पड़ताल किस ढर्रे पर चल रही है। अदालत ने साफ किया कि चूंकि चालान पहले ही दाखिल किया जा चुका है, इसलिए आरोपी को हिरासत में रखने से कोई वैधानिक लाभ नहीं होगा, हालांकि यह राहत केवल जमानत तक सीमित है और मुकदमे के अंतिम गुण-दोष को प्रभावित नहीं करेगी। वहीं गुरुग्राम के फर्रुखनगर इलाके में बाईस वर्षीय युवक के कत्ल के बाद पुलिसकर्मियों की लापरवाही को लेकर दो जवानों को निलंबित किए जाने का घटनाक्रम भी सामने आया है।




















