दुनिया में भारत को 'दुनिया का दवाखाना' कहा जाता है, लेकिन इस दवाखाने की नींव काफी हद तक चीन पर टिकी है. नीति आयोग ने अपनी ताजा तिमाही व्यापार रिपोर्ट में खुलासा किया है कि भारत की दवा आपूर्ति श्रृंखला में काम आने वाले जरूरी कच्चे माल यानी API (एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रेडिएंट्स) और मुख्य शुरुआती सामग्री के लिए देश चीन पर बहुत ज्यादा निर्भर है. इन उत्पादों के कुल आयात में चीन की हिस्सेदारी 65 फीसदी है, जो देश के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में से एक के लिए गंभीर चिंता का विषय है.
तिमाही रिपोर्ट में क्या कहा गया
नीति आयोग ने व्यापार पर जारी इस तिमाही रिपोर्ट में यह भी बताया कि पर्यावरण नियमों के पालन की बढ़ती जरूरतों के चलते भारत में दवा निर्माण और R&D की लागत काफी बढ़ गई है. इसके अलावा कमजोर नवोन्मेष और वाणिज्यिक माहौल ने नए आविष्कारकों और दीर्घकालिक निवेशकों के लिए अनिश्चितता पैदा कर दी है. रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि भारत को अधिक मूल्य वाले दवा खंड में विविधता लानी होगी.
सुधार के लिए सुझाव
नीति आयोग ने रिपोर्ट में पेटेंट व्यापारीकरण, अनुसंधान सहयोग और स्टार्टअप इनक्यूबेशन को बढ़ावा देने के लिए नियामकीय पारदर्शिता बढ़ाने की जरूरत बताई है. साथ ही यह भी कहा गया है कि उद्योग और शिक्षा जगत के बीच मजबूत प्रौद्योगिकी हस्तांतरण जरूरी है, ताकि भारतीय दवा उद्योग मूल्य श्रृंखला में ऊपर चढ़ सके और चीन पर निर्भरता धीरे-धीरे कम हो सके.
नीति आयोग के उपाध्यक्ष का बयान
रिपोर्ट जारी करने के मौके पर नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक कुमार लाहिड़ी ने कहा कि भारत को दुनिया का दवाखाना माना जाता है. उन्होंने कहा कि हम दवा क्षेत्र में मात्रा के मामले में अच्छा कर रहे हैं, लेकिन अब मूल्य श्रृंखला में ऊपर जाने की जरूरत है. उन्होंने यह भी जोड़ा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की एक अच्छी साख है और उन्हें कोई कारण नहीं दिखता कि अगर भारतीय दवा कंपनियां अच्छी गुणवत्ता और उचित कीमत पर ब्रांडेड उत्पाद पेश करें, तो वे वैश्विक मंच पर बड़ी जगह क्यों नहीं बना सकतीं.
भारत: वैश्विक दवा आपूर्ति का बड़ा स्तंभ
भारत सस्ती जेनेरिक दवाओं का एक प्रमुख वैश्विक आपूर्तिकर्ता है. मात्रा के हिसाब से देखें तो भारत अफ्रीका की करीब 50 फीसदी, अमेरिका की 40 फीसदी और ब्रिटेन की 25 फीसदी जेनेरिक दवाओं की जरूरत पूरी करता है. पिछले वर्ष वैश्विक दवा बाजार की कुल मांग 1,300 अरब डॉलर रही, जिसमें 1,020 अरब डॉलर की दवाएं और 261 अरब डॉलर के API शामिल थे. इन आंकड़ों से साफ है कि भारत के लिए दवा उद्योग में आत्मनिर्भरता हासिल करना कितना बड़ा अवसर और कितनी बड़ी चुनौती दोनों है.













