भारतीय नौसेना के समुद्री अभियानों और लंबी दूरी तक रसद आपूर्ति को सशक्त बनाने के उद्देश्य से हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड में पहले फ्लीट सपोर्ट शिप सूर्या का औपचारिक जलावतरण किया गया। मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026 को आयोजित इस कार्यक्रम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस विशालकाय जहाज को नौसेना के कार्यों के लिए समर्पित किया। इसके साथ ही भारतीय रक्षा तंत्र में 114 राफेल लड़ाकू विमानों की संभावित खेप से पहले समुद्री मोर्चे पर एक नया अध्याय जुड़ गया है। इसी समारोह के दौरान यार्ड में 300 टन उठाने की क्षमता वाली आधुनिक गोलियथ क्रेन और एक उन्नत स्लिपवे का उद्घाटन भी संपन्न हुआ, जबकि श्रृंखला के अगले फ्लीट सपोर्ट शिप के निर्माण की नींव यानी कील रखने की रस्म भी पूरी की गई। थल सेना और वायुसेना के आधुनिकीकरण के समानांतर नौसेना के संसाधनों को उन्नत बनाने की दिशा में यह एक ठोस रणनीतिक कदम है।
एक ही मंच से तीन बड़े रक्षा मील के पत्थर
समारोह को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने रेखांकित किया कि एक ही दिन और एक ही स्थान पर हासिल की गई ये तीनों उपलब्धियां देश की बढ़ती जहाज निर्माण कुशलता और समुद्री आत्मनिर्भरता का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि पहला जहाज समुद्र में उतारना हमारी तकनीकी दक्षता को दिखाता है, दूसरे की कील रखना भविष्य के काम के प्रति हमारी प्रतिबद्धता है और नए स्लिपवे का आरंभ हमारी निर्माण क्षमता के विस्तार को दर्शाता है। राजनाथ सिंह के अनुसार, आज हिंदुस्तान शिपयार्ड में केवल लोहे और इंजनों का ढांचा नहीं तैयार हो रहा, बल्कि भारत के समुद्री वर्चस्व और सुरक्षा के भावी आधार को गहराई से मजबूत किया जा रहा है।
हिंद महासागर में रणनीतिक उपस्थिति और प्राचीन परंपरा
रक्षा मंत्री ने जोर देकर कहा कि हिंद महासागर के विस्तृत जलक्षेत्र में भारतीय नौसेना ने संकट के समय सबसे पहले आगे आने वाले बल और एक भरोसेमंद सुरक्षा साझेदार के रूप में अपनी साख निरंतर सिद्ध की है। चाहे समुद्र में डाकुओं के हमलों को विफल करना हो, विदेशों से नागरिकों को सुरक्षित बाहर निकालने के जटिल अभियान हों, मानवीय सहायता पहुंचानी हो या फिर प्राकृतिक आपदाओं में राहत सामग्री का वितरण करना हो, नौसेना ने हर मोर्चे पर त्वरित कार्रवाई और पेशेवर अनुशासन पेश किया है।
राजनाथ सिंह ने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का उल्लेख करते हुए कहा कि एक प्रमुख समुद्री शक्ति के रूप में भारत का यह उभार कोई आकस्मिक घटना नहीं है, बल्कि यह सदियों पुरानी उस समृद्ध समुद्री परंपरा को दोबारा जीवित करने का सतत प्रयास है जिसे भारत ने प्राचीन काल में स्थापित किया था। इस व्यापक राष्ट्रीय अभियान में हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड की भूमिका अत्यंत केंद्रीय और महत्वपूर्ण बनी हुई है।
आठ दशकों का सफर और मिनीरत्न का गौरव
हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड को राष्ट्रीय समुद्री क्षमता का सजग रक्षक बताते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि यह संस्थान पिछले आठ दशकों से अधिक समय से भारतीय सुरक्षा की रक्षा आवश्यकताओं और पोत निर्माण की जरूरतों को पूरा करता आ रहा है। रक्षा मंत्रालय के प्रशासनिक दायरे में शामिल होने के पश्चात शिपयार्ड के कामकाज और वित्तीय स्थिति में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है। वर्ष 2025 में संस्थान को मिनीरत्न श्रेणी-1 का प्रतिष्ठित दर्जा प्राप्त होना इस सकारात्मक कायाकल्प और कर्मियों के अथक परिश्रम का सीधा प्रमाण है।
रक्षा मंत्री ने स्पष्ट किया कि किसी भी देश की समुद्री संप्रभुता केवल नौसेना की टुकड़ियों या किसी एक शिपयार्ड के अलग-थलग प्रयासों से सुरक्षित नहीं रह सकती। इसके लिए एक सुगठित, परस्पर जुड़े हुए राष्ट्रीय समुद्री तंत्र की आवश्यकता होती है, जिसमें सभी अंग एक साथ मिलकर काम करें।
साझा प्रयास, आत्मनिर्भरता और 2047 का संकल्प
राजनाथ सिंह ने इस बात पर बल दिया कि नौसेना, हिंदुस्तान शिपयार्ड, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन, विभिन्न शैक्षणिक संस्थान, निजी विनिर्माता, एमएसएमई इकाइयां और नए स्टार्टअप मिलकर एक संगठित टीम के रूप में कार्य करें। सूर्या जैसे फ्लीट सपोर्ट जहाजों के शामिल होने से भारतीय युद्धपोतों को लंबे समय तक समुद्र में बने रहने, ईंधन और राशन प्राप्त करने तथा अभियानों को निर्बाध गति से चलाने की असीम क्षमता मिलेगी।
पिछले दस वर्षों के दौरान रक्षा निर्माण के पूरे ढांचे में मूलभूत परिवर्तन आया है, जिसके चलते देश अब केवल विदेशी उपकरणों के आयात पर निर्भर रहने की प्रवृत्ति से बाहर निकलकर अपनी खुद की प्रणालियों का विकास कर रहा है। आज घरेलू शिपयार्ड अत्याधुनिक युद्धपोत और पनडुब्बियां तैयार कर रहे हैं। रक्षा मंत्री ने अंत में स्पष्ट किया कि आत्मनिर्भर बनना केवल एक प्रारंभिक पड़ाव है, जबकि असली लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी बनना है ताकि मित्र देशों को भी भारत में निर्मित जहाज और समुद्री सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन का जिक्र करते हुए उन्होंने दोहराया कि वर्ष 2047 तक एक सुरक्षित, आत्मनिर्भर और विकसित भारत का निर्माण करना ही देश का अंतिम लक्ष्य है।


















