बिहार के खेतों में रबी सीजन की सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं। इस दौर में राज्य भर में बड़े पैमाने पर गेहूं की बुआई की जाती है, लेकिन इसके साथ ही आलू और प्याज जैसी नकदी फसलों का रकबा भी काफी महत्वपूर्ण रहता है। जहानाबाद जिले के मोदनगंज प्रखंड स्थित जय किशुन बिगहा गांव के प्रगतिशील किसान लक्ष्मीकांत आजाद इस बार दो एकड़ से अधिक रकबे में प्याज की खेती की तैयारी कर रहे हैं। विविध फसलों की पैदावार करने वाले लक्ष्मीकांत का स्पष्ट मानना है कि अगर सही वक्त पर खेत तैयार किया जाए और उत्तम किस्म के बीजों का चयन हो, तो पैदावार कई गुना बढ़ाई जा सकती है। इसी रणनीति के तहत उन्होंने समय रहते खेत की जुताई और मिट्टी की तैयारी का काम शुरू कर दिया है।
नर्सरी तैयार करने का सही समय और तकनीक
प्याज की सफल फसल के लिए सबसे पहली और बुनियादी जरूरत एक मजबूत नर्सरी तैयार करना होती है। लक्ष्मीकांत आजाद के अनुसार, रबी प्याज के लिए नर्सरी डालने का सबसे मुफीद वक्त 15 अक्टूबर से शुरू होकर अक्टूबर महीने के आखिरी दिनों तक चलता है। नर्सरी तैयार करते समय किसानों को खेत की गहरी जुताई और मिट्टी के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना चाहिए। इसके साथ ही रासायनिक खादों के अंधाधुंध इस्तेमाल से बचते हुए जैविक खाद का प्रयोग फसल के लिए बेहद गुणकारी साबित होता है। पौधों की जड़ों के पास वर्मी कंपोस्ट यानी केंचुआ खाद डालने से पौधों को जरूरी पोषण मिलता है, जिससे अंकुरण और शुरुआती बढ़वार बहुत अच्छी होती है। साथ ही नर्सरी में नमी बनाए रखने के लिए संतुलित सिंचाई का प्रबंधन भी जरूरी है।
काली मिट्टी का फायदा और खरपतवार नियंत्रण
रबी के मौसम में प्याज की खेती करते समय मिट्टी की बनावट काफी मायने रखती है। यदि खेत की मिट्टी केवाल यानी भारी काली मिट्टी है, तो उसमें प्राकृतिक रूप से खरपतवार की समस्या बेहद कम देखने को मिलती है। खरपतवार न होने से निराई-गुड़ाई पर लगने वाली मजदूरी का एक बड़ा हिस्सा बच जाता है, जिससे कुल उत्पादन लागत घटती है। इसके अतिरिक्त, मिट्टी के पोषक तत्व सीधे फसल को मिलते हैं, जिससे प्याज के कंदों का आकार सुडौल बनता है और अंतिम उपज में शानदार इजाफा दर्ज किया जाता है।
रोपाई का उपयुक्त समय, सिंचाई और खाद
नर्सरी में पौधे तैयार हो जाने के बाद मुख्य खेत में रोपाई का चरण आता है। लक्ष्मीकांत बताते हैं कि 15 दिसंबर से 15 जनवरी के बीच का समय प्याज की रोपाई के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। रोपाई के बाद पूरी फसल अवधि के दौरान 5 से 6 बार नियमित और संतुलित सिंचाई की दरकार होती है। पानी देने के साथ-साथ समय-समय पर जरूरी पोषक तत्वों और खाद का छिड़काव भी उपज की गुणवत्ता तय करता है। लक्ष्मीकांत अपनी खेती के लिए बीज का प्रबंध बंगाल से करते हैं, जहां से उच्च गुणवत्ता वाले बीज मंगवाए जाते हैं।
लागत का हिसाब-किताब और शुद्ध मुनाफा
प्याज की खेती किसानों के लिए आर्थिक रूप से काफी फायदेमंद साबित हो सकती है। प्रति एकड़ प्याज की बुआई और देखभाल में करीब 35 से 40 हजार रुपये के बीच कुल लागत आती है। यदि बाजार में प्याज की औसत कीमत 1500 रुपये प्रति क्विंटल भी मिल जाती है, तो किसान एक ही सीजन में प्रति एकड़ 80 से 90 हजार रुपये तक का शुद्ध मुनाफा आसानी से कमा सकते हैं। योजनाबद्ध तरीके से की गई खेती किसानों को कम लागत में शानदार आय दिला सकती है।





















