भारतीय जनता पार्टी के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और आयुक्तों के चयन नियमों को लेकर विपक्षी दलों पर तीखा वार किया है। उन्होंने दावा किया कि वर्ष 2023 से पहले जब संसद ने इस संबंध में कोई स्पष्ट अधिनियम नहीं बनाया था, तब देश में चुनाव आयोग के भीतर नियुक्तियों को लेकर हिटलर जैसी तानाशाही का माहौल था। अपने बयानों के लिए लगातार चर्चा में बने रहने वाले नेता का यह रुख ऐसे वक्त में सामने आया है, जब सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा आयोग की आंतरिक प्रक्रियाओं से जुड़ी कई याचिकाओं पर बेहद अहम सुनवाई तय है।
गोंडा में संवाददाताओं से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि देश में 2023 में संसद द्वारा नया कानून पारित किए जाने से पहले तक चुनाव आयुक्तों को चुनने की कोई पारदर्शी वैधानिक व्यवस्था नहीं थी। उन्होंने सीधे तौर पर तर्क दिया कि सर्वोच्च न्यायालय के रुख के बाद संसद ने विधिवत एक वैधानिक प्रक्रिया तैयार की, जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री की तीन सदस्यीय समिति बनाई गई।
विपक्ष की आपत्तियों और ईवीएम पर उठाए सवाल
बृजभूषण शरण सिंह ने आरोप लगाया कि वर्ष 2014 के बाद से विपक्षी दलों के चुनावी आधार और राजनीतिक प्रभाव लगातार कम हो रहे हैं। इसी हताशा के चलते वे इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) और चुनाव आयोग जैसी प्रमुख संवैधानिक संस्थाओं की साख पर अकारण सवाल उठा रहे हैं। उन्होंने पूछा कि जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब किस नियम के तहत चुनाव आयुक्त बनाए जाते थे। अपने इस तर्क को मजबूती देने के लिए उन्होंने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों नवीन चावला और एमएस गिल का विशेष उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि अतीत में आयोग के प्रमुखों के चयन को लेकर कई बार राजनीतिक झुकाव के गंभीर सवाल उठे थे। उदाहरण देते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि एमएस गिल बाद में कांग्रेस नीत सरकार में केंद्रीय मंत्री तक बने। उनका कहना था कि जब तक पुरानी व्यवस्था से विपक्षी दल लाभ में थे, तब तक उन्हें कोई आपत्ति नहीं थी, लेकिन अब लोकतांत्रिक हार का सामना करते ही वे संस्थाओं पर दोष मढ़ने लगे हैं।
सर्वोच्च न्यायालय में 5 अक्टूबर की सुनवाई की पृष्ठभूमि
यह पूरा राजनीतिक घटनाक्रम देश की शीर्ष अदालत में होने वाली सुनवाई से ठीक पहले उभरा है। सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश सूर्याकांत की अगुवाई वाली पीठ के समक्ष 5 अक्टूबर 2026 को याचिकाओं पर सुनवाई होनी है। इन याचिकाओं में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयोग की निष्पक्षता, विशेष गहन पुनरीक्षण और आयोग के भीतर सामूहिक रूप से निर्णय लेने की प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए गए हैं।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने चुनाव आयोग नियुक्ति कानून 2023 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर एक विभाजित फैसला दिया था। इसके बाद मामले को बड़ी संविधान पीठ के विचारार्थ भेजने की सिफारिश की गई थी। इस कानूनी खींचतान के बीच आया यह बयान सत्तारूढ़ खेमे की तरफ से एक रणनीतिक रक्षा पंक्ति तैयार करने जैसा माना जा रहा है।
बयान के रणनीतिक और राजनीतिक मायने
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, बृजभूषण शरण सिंह के इस आक्रामक रुख के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े संदेश छिपे हुए हैं। पहला उद्देश्य वर्ष 2023 के संसदीय कानून के समर्थन में एक मजबूत जनधारणा तैयार करना है। उनका यह कथन स्पष्ट करता है कि वर्तमान प्रणाली, जिसमें कार्यपालिका और विपक्ष दोनों का प्रतिनिधित्व शामिल है, कोई मनमाना कदम नहीं बल्कि संसद द्वारा स्वीकृत एक पूरी तरह से वैध और संवैधानिक व्यवस्था है।
दूसरा पहलू अदालत में चल रही सुनवाई के बीच विपक्षी दलों की अति-सक्रियता को राजनीतिक दबाव करार देना है। कांग्रेस और सपा जैसे दल जब आयोग पर एकतरफा निर्णय लेने के आरोप लगा रहे हैं, तब इस बात को रेखांकित किया जा रहा है कि यह कोई विधिक विवाद नहीं बल्कि चुनावी पराजयों से उपजी राजनीतिक हताशा है।
तीसरा पहलू ऐतिहासिक प्रसंगों को सामने लाकर रक्षात्मक मुद्रा से आक्रामक रुख में बदलना है। नवीन चावला और एमएस गिल का नाम लेकर यह याद दिलाने का प्रयास किया गया है कि पिछली सरकारों के दौर में संवैधानिक पदों पर किस तरह के फैसले लिए गए थे। इस प्रकार, जहां विपक्षी खेमा अदालत के सहारे आयोग की मौजूदा कार्यप्रणाली और चयन ढांचे को चुनौती देने की कोशिश कर रहा है, वहीं सत्ता पक्ष संसदीय कानून की संप्रभुता के आधार पर इस नैरेटिव का जवाब दे रहा है।















