भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो सिर्फ टिकट खिड़की तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि समाज की सोच पर गहरा असर छोड़ती हैं। 16 सितंबर 2016 को जब फिल्म 'पिंक' सिनेमाघरों में उतरी थी, तब इसे किसी पारंपरिक मसाला फिल्म की तरह नहीं देखा जा रहा था। पर्दे पर जब तीन सामान्य कामकाजी लड़कियों के स्वाभिमान और न्याय की जंग सामने आई, तो यह सिनेमाई कहानी पूरे देश के भीतर एक गंभीर विमर्श का जरिया बन गई।
कम बजट और बिना मसाला कंटेंट के बॉक्स ऑफिस पर बड़ा धमाका
फिल्म का निर्माण लगभग 30 करोड़ रुपये के सीमित बजट में पूरा किया गया था। इसमें किसी भी तरह के कमर्शियल डांस नंबर या तयशुदा बॉलीवुड फार्मूले नहीं जोड़े गए थे। इसके बावजूद दर्शकों की सकारात्मक चर्चा और मजबूत वर्ड ऑफ माउथ के सहारे फिल्म ने घरेलू स्तर पर भारत में 65 करोड़ रुपये से अधिक की शुद्ध कमाई दर्ज की। वहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसने दुनिया भर के सिनेमाघरों से 157 करोड़ रुपये से ज्यादा का ग्रॉस कलेक्शन निकालकर बॉक्स ऑफिस के सभी जानकारों को चौंका दिया था।
तीन कामकाजी महिलाओं का जीवंत संघर्ष और अभिनय
कहानी के केंद्र में तीन आत्मनिर्भर महिलाएं थीं, जिनके किरदार तापसी पन्नू ने मीनल के रूप में, कीर्ति कुल्हारी ने फलक के रूप में और एंड्रिया तियांग ने एंड्रिया के रूप में निभाए थे। महानगरों में रहकर नौकरी करने वाली आजाद ख्याल महिलाओं को किन सामाजिक पूर्वाग्रहों, चरित्र हनन और रोजमर्रा की मुश्किलों से जूझना पड़ता है, इसे इन तीनों अभिनेत्रियों ने बेहद संजीदगी से पर्दे पर उतारा। उनकी सहज अदायगी और मजबूत स्क्रीन प्रेजेंस ने साबित कर दिया कि एक सशक्त पटकथा के आगे बड़े स्टारडम का दिखावा भी फीका पड़ जाता है।
अमिताभ बच्चन की कोर्टरूम दलीलें और 'नो मीन्स नो' का सबक
फिल्म में दीपक सहगल के किरदार में अमिताभ बच्चन नजर आए थे, जिन्होंने बाइपोलर डिसऑर्डर की समस्या से जूझ रहे एक अनुभवी वकील की भूमिका निभाई थी। अदालत के भीतर महिलाओं के सम्मान, उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानूनी अधिकारों पर उनकी शांतिपूर्ण लेकिन तीखी दलीलों ने दर्शकों को झकझोर कर रख दिया। रितेश शाह द्वारा तैयार किए गए धारदार स्क्रीनप्ले ने दर्शकों को अंत तक बांधे रखा।
इसी अदालती बहस के दौरान गूंजा संवाद 'नहीं का मतलब नहीं होता (No Means No)' भारतीय समाज के लिए सहमति का सबसे बड़ा और स्पष्ट सिद्धांत बन गया। इस एक वाक्य ने महिलाओं की रजामंदी, उनकी सुरक्षा और सदियों पुरानी पितृसत्तात्मक सोच पर राष्ट्रव्यापी बहस छेड़ दी।
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक गूंज
फिल्म की इस अप्रत्याशित सफलता को आलोचकों और राष्ट्रीय स्तर पर भी भरपूर सराहना मिली। 'पिंक' को 'अन्य सामाजिक मुद्दों पर सर्वश्रेष्ठ फिल्म' की श्रेणी में 64वां राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्रदान किया गया। इसके अलावा, महिलाओं के अधिकारों और सहमति के संदेश को वैश्विक स्तर पर मान्यता देते हुए फिल्म का विशेष प्रदर्शन यूनाइटेड नेशंस (UN) के मुख्यालय में भी आयोजित किया गया, जहां इसे अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों से खूब वाहवाही मिली। यह फिल्म साबित करती है कि जब सिनेमा समाज की कड़वी हकीकत को ईमानदारी से पेश करता है, तो वह एक स्थायी सामाजिक आंदोलन बन जाता है।



















