छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच वर्षों से खिंचे चले आ रहे महानदी जल बंटवारे के पेचीदा विवाद को आपसी सहमति से हल करने की दिशा में नई दिल्ली में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में आयोजित इस उच्चस्तरीय बैठक में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय तथा ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने अपने अपने राज्यों के पक्ष और चिंताओं को विस्तार से पटल पर रखा। इस विचार विमर्श के दौरान केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल, केंद्रीय जल आयोग के अध्यक्ष और दोनों राज्यों के मुख्य सचिव भी उपस्थित रहे। जुलाई के महीने में भी केंद्रीय जल शक्ति मंत्री की अगुवाई में दोनों मुख्यमंत्रियों की एक अहम बैठक हुई थी, जिसमें दोनों पक्षों ने यह स्पष्ट किया था कि तकनीकी संवाद के जरिए ही इस संवेदनशील मामले का टिकाऊ और सौहार्दपूर्ण समाधान निकाला जा सकता है।
विष्णु देव साय ने रखा परस्पर सम्मान और संतुलन पर आधारित रोडमैप
बैठक की कार्यवाही के दौरान छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए समाधान की एक संतुलित रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने जोर देकर कहा कि महानदी दोनों पड़ोसी राज्यों को अलग करने वाली दीवार नहीं, बल्कि उन्हें आपस में जोड़ने वाला एक अटूट प्राकृतिक सेतु है। उनके अनुसार विवाद का निपटारा ऐसे सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए जिसमें किसी भी पक्ष को पराजय का अहसास न हो और सभी के हितों का संरक्षण हो सके। छत्तीसगढ़ का मुख्य जोर इस बात पर रहा कि जो भी व्यवस्था तय की जाए, वह पूरी तरह न्यायपूर्ण, निष्पक्ष, वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित, पारदर्शी और लंबे समय तक टिकने वाली हो। इस प्रक्रिया में दोनों ही राज्यों के अन्नदाताओं, आम नागरिकों और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों को पूरी सुरक्षा मिलनी चाहिए।
नदी के उद्गम क्षेत्र के अधिकार और हीराकुंड बांध के संचालन में सहयोग
विष्णु देव साय ने भौगोलिक वास्तविकताओं का उल्लेख करते हुए बताया कि महानदी का उद्गम स्थल छत्तीसगढ़ की धरती पर है। इसके साथ ही इस विशाल नदी के कुल जलग्रहण क्षेत्र का आधे से भी अधिक हिस्सा छत्तीसगढ़ की भौगोलिक सीमाओं के भीतर आता है। इसी तथ्य को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि राज्य के किसानों, सिंचाई तंत्र और सुदूर आदिवासी क्षेत्रों की जमीनी जरूरतों को किसी भी अंतिम समझौते में समुचित प्राथमिकता मिलनी जरूरी है। इसके साथ ही उन्होंने पड़ोसी राज्य की चिंताओं को दूर करते हुए भरोसा दिलाया कि छत्तीसगढ़ ओडिशा के सरोकारों के प्रति पूरी तरह संवेदनशील है। उन्होंने माना कि हीराकुंड बांध ओडिशा की जीवनरेखा के समान है, इसलिए छत्तीसगढ़ उसके नियमित और सुचारु संचालन के लिए हर संभव सहयोग प्रदान करने को तत्पर रहेगा। सोशल मीडिया मंच X पर इस बैठक की जानकारी साझा करते हुए उन्होंने लिखा कि महानदी हमारी जीवनधारा और हमारी समृद्धि का आधार है।
बस्तर में नक्सलवाद के खिलाफ मिली सफलता का उदाहरण
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने सुरक्षा और विकास के परस्पर रिश्ते की चर्चा करते हुए बस्तर संभाग में नक्सलवाद के खात्मे की दिशा में चल रहे अभियानों का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने रेखांकित किया कि छत्तीसगढ़ ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के अटूट संकल्प और उनकी प्रशासनिक प्रतिबद्धता के सकारात्मक नतीजों को बहुत करीब से देखा है। केंद्र सरकार और राज्य के समन्वित प्रयासों से 31 मार्च 2026 की एक निश्चित समय सीमा तय करके नक्सलवाद के विरुद्ध निर्णायक कदम उठाए गए हैं। इसी दृढ़ इच्छाशक्ति का परिणाम है कि आज बस्तर के अंचलों में बंदूकों की गूंज के बजाय चहुंमुखी विकास और जनकल्याण पर चर्चाएं हो रही हैं। केंद्र ने भी यह जानकारी दी है कि 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद के पूर्ण उन्मूलन का लक्ष्य पूरा कर लिया जाएगा। मुख्यमंत्री ने भरोसा जताया कि जिस दृढ़ता से बस्तर की दशकों पुरानी विकट समस्या का समाधान निकाला गया, उसी राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति से महानदी के जल विवाद का भी स्थायी निपटारा संभव होगा।
ओडिशा के मुख्यमंत्री को छोटा भाई बताकर सांस्कृतिक रिश्तों पर दिया जोर
ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी के प्रति गहरा आत्मीय भाव प्रकट करते हुए विष्णु देव साय ने उन्हें अपना छोटा भाई करार दिया। उन्होंने कहा कि दोनों राज्य केवल भौगोलिक सीमाओं से नहीं, बल्कि गहरे सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक बंधनों से आपस में बंधे हुए हैं। दोनों ही मुख्यमंत्री वनांचल की माटी और परिवेश से निकलकर शीर्ष पदों तक पहुंचे हैं, इसलिए वे भलीभांति समझते हैं कि एक सामान्य किसान के खेत तक सिंचाई का पानी पहुंचना कितना बड़ा जीवनदायिनी संबल होता है। उन्होंने आध्यात्मिक जुड़ाव का जिक्र करते हुए कहा कि महाप्रभु जगन्नाथ के प्रति अगाध आस्था शिवरीनारायण की पावन भूमि से लेकर पुरी के सागर तट तक एक ही सांस्कृतिक चेतना के रूप में निरंतर बहती है। ऐसी समृद्ध साझी विरासत के चलते महानदी को तनाव अथवा विवाद का जरिया बनाने के बजाय आपसी समन्वय और साझा विकास का सशक्त आधार बनाया जाना चाहिए।
तकनीकी समिति का अध्ययन और न्यायाधिकरण से आगे की राह
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि उनके राज्य को केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय की मध्यस्थता पर गहरा विश्वास है। इसके साथ ही वे केंद्रीय जल आयोग द्वारा किए जाने वाले निष्पक्ष, वैज्ञानिक और पारदर्शी तकनीकी आकलन का पूरा सम्मान करते हैं। उन्होंने आश्वस्त किया कि दोनों राज्यों की आपसी सलाह और तकनीकी मूल्यांकन से जो भी व्यावहारिक हल निकलकर आएगा, छत्तीसगढ़ उसे सकारात्मक सोच के साथ स्वीकार करेगा और उसे लागू करने में पूरा हाथ बंटाएगा। उल्लेखनीय है कि जुलाई की बैठक में भी केंद्र सरकार ने लगातार संवाद और तकनीकी साझेदारी के जरिए न्यायसंगत और स्थायी समझौते पर बल दिया था। इसी क्रम में केंद्रीय जल आयोग के नेतृत्व में गठित विस्तारित तकनीकी समिति ने भी लंबित तकनीकी पहलुओं पर जमीनी काम प्रारंभ कर दिया है। महानदी के जल बंटवारे का यह संवेदनशील मसला वर्ष 2018 से महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण के समक्ष विचाराधीन है। बीते कुछ महीनों के दौरान दोनों राज्यों के बीच राजनीतिक तथा तकनीकी धरातल पर चर्चा की गति काफी तेज हुई है। इससे पहले 20 सितंबर को भुवनेश्वर में भी मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी के बीच आमने सामने की वार्ता में महानदी के मसले पर गहन चर्चा हुई थी, जहां दोनों पक्षों ने खुले संवाद से राह निकालने की सकारात्मक उम्मीद जताई थी।





















