जब कोई छात्र सालों की मेहनत और त्याग के बाद अपनी मंजिल के करीब पहुंचता है और अचानक परीक्षा रद्द होने की खबर आती है, तो मानसिक स्थिति पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है। पूर्व मिस वर्ल्ड और बॉलीवुड अभिनेत्री मानुषी छिल्लर ने हाल ही में उस कठिन दौर को याद किया जब वर्ष 2015 में ऑल इंडिया प्री मेडिकल टेस्ट यानी नीट (AIPMT) का पर्चा लीक हो गया था। अभिनेत्री सोहा अली खान के डिजिटल पॉडकास्ट में बातचीत करते हुए उन्होंने साझा किया कि महीनों की दिन-रात की पढ़ाई के बाद जब एकाएक परीक्षा निरस्त हुई, तो उन पर और लाखों उम्मीदवारों पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था।
सिर्फ परीक्षा नहीं, परिवारों का त्याग दांव पर
मानुषी छिल्लर के अनुसार, बाहरी लोगों के लिए यह कहना बेहद आसान होता है कि छात्र दोबारा तैयारी करके परीक्षा दे दें। हालांकि, धरातल पर सच्चाई इससे बिल्कुल अलग होती है। नीट यूजी जैसी बड़ी प्रतियोगी परीक्षा के पीछे अभ्यर्थी का मानसिक स्वास्थ्य, उसके माता-पिता की गाढ़ी कमाई और कई वर्षों के व्यक्तिगत त्याग छिपे होते हैं। उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभव को साझा करते हुए बताया कि डॉक्टर बनने के लक्ष्य को पाने के लिए उन्हें अपनी हर पसंदीदा गतिविधि से दूरी बनानी पड़ी थी।
चिकित्सा क्षेत्र में जाने की लगन के कारण उन्होंने अपने कुचिपुड़ी नृत्य के अभ्यास और चित्रकारी करने के शौक को पूरी तरह रोक दिया था। जब साल 2015 में धांधली के कारण पर्चा रद्द हुआ और नई तारीख घोषित हुई, तब उन्हें अपनी सभी खुशियों को दरकिनार करके दोबारा किताबों के बीच लौटना पड़ा। मानुषी ने स्वीकार किया कि वह अतिरिक्त एक वर्ष उनके जीवन में किसी कठोर सजा की तरह बीता था।
पुनः परीक्षा का मानसिक दबाव और एंग्जायटी
पॉडकास्ट के दौरान मानुषी छिल्लर ने बताया कि जब कोई अभ्यर्थी महीने भर की कड़ी मशक्कत के बाद यह सोचता है कि दौड़ समाप्त हो चुकी है, और तभी अचानक उसे पता चले कि 45 दिन तक वही सब दोबारा पढ़ना है, तो अंदर से हिम्मत टूट जाती है। उस नाजुक मोड़ पर मन में लगातार यह सवाल उठता है कि क्या दोबारा उस पूरी प्रक्रिया से गुजरने की शारीरिक और मानसिक क्षमता बची भी है या नहीं।
उन्होंने जोर देकर कहा कि दोबारा परीक्षा कक्ष में बैठना केवल कागजों पर उत्तर लिखना नहीं होता। इसका सीधा मतलब होता है कि छात्र को उस पूरे भय, घबराहट और एंग्जायटी को दोबारा उसी तीव्रता के साथ झेलना पड़ता है। उस तनावपूर्ण माहौल में खुद को संभाले रखना बेहद चुनौतीपूर्ण साबित होता है।
पारिवारिक पृष्ठभूमि और अन्य छात्रों का संघर्ष
मानुषी ने अपनी स्थिति का आकलन करते हुए माना कि उन्हें अपने घर में अनुकूल माहौल मिला था। चूंकि उनके माता-पिता स्वयं डॉक्टर थे, इसलिए उन्हें परीक्षा के दौरान सही मार्गदर्शन और संबल प्राप्त हुआ। लेकिन कोचिंग संस्थानों में अपने आसपास के साथियों को देखकर उन्हें अपने विशेषाधिकार का अहसास हुआ।
उन्होंने देखा था कि किस तरह कई छात्रों के माता-पिता कर्ज लेकर भारी फीस चुकाते थे। कई अभ्यर्थी तंग कमरों में रहकर रात-दिन मेहनत करते थे। जब ऐसे मेहनती छात्रों का पर्चा लीक की वजह से रद्द होता है, तो केवल एक छात्र का सपना ही नहीं टूटता बल्कि पूरा परिवार बिखर जाता है।
मानसिक स्वास्थ्य को बचाने में खेल की भूमिका
पढ़ाई के उस अत्यधिक दबाव से निपटने के लिए मानुषी के माता-पिता ने एक सख्त दिनचर्या तय की थी। उन्होंने नियम बनाया था कि पढ़ाई का चाहे कितना भी बोझ हो, रोज 1 घंटा जिम जाना या बास्केटबॉल खेलना अनिवार्य होगा। मानुषी का मानना है कि इस एक घंटे की शारीरिक गतिविधि ने ही उन्हें अवसाद और भारी मानसिक तनाव से बचाए रखा।
मेडिकल कॉलेज का बर्नआउट और करियर में बदलाव
नीट परीक्षा पास करके जब मानुषी मेडिकल कॉलेज पहुंचीं, तो वहां का अनुभव भी चुनौतीपूर्ण रहा। उन्होंने कहा कि प्रवेश परीक्षा की तैयारी के दौरान छात्र इतने थक जाते हैं कि कॉलेज में दाखिला लेते समय उनकी ऊर्जा समाप्त हो चुकी होती है। उन्होंने मजाकिया अंदाज में टिप्पणी की कि मेडिकल कॉलेज के सबसे खुशहाल दिन सिर्फ पहला और आखिरी दिन होते हैं। परीक्षा की इस थकावट और बर्नआउट ने ही उन्हें ब्यूटी पेजेंट और अभिनय की दुनिया की तरफ रुख करने के लिए प्रेरित किया, जिसके बाद उन्होंने अपना करियर बदल लिया।



















