भारत में दो हजार रुपये से अधिक के चुनिंदा यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई मर्चेंट भुगतानों पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर को फिर से लागू करने की योजना को जनवरी तक के लिए टाला जा सकता है। पहले इस नई शुल्क व्यवस्था को 15 अक्टूबर 2026 से प्रभावी करने की उम्मीद जताई जा रही थी, लेकिन अब संभावित विस्तार से बैंकों, डिजिटल भुगतान मंचों और खुदरा व्यापारियों को नई व्यवस्था के अनुसार अपने बुनियादी ढांचे को ढालने के लिए कुछ महीनों की अतिरिक्त राहत मिल सकती है।
इस पूरे मामले पर विचार-विमर्श जारी है और सरकारी स्तर पर क्रियान्वयन की तारीख को आगे बढ़ाने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। हालांकि, नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया यानी एनपीसीआई ने अभी तक इस प्रस्ताव पर अपना अंतिम आधिकारिक फैसला सार्वजनिक नहीं किया है। यदि इस नियम को मंजूरी मिलती है, तो यह देश के खुदरा डिजिटल भुगतान परिदृश्य में एक बड़ा नीतिगत मोड़ साबित होगा, क्योंकि यूपीआई कई वर्षों से शून्य एमडीआर व्यवस्था के तहत संचालित हो रहा है।
त्योहारी खरीदारी के बीच शुल्क लागू करने की चुनौतियां
प्रस्तावित 15 अक्टूबर की तारीख ठीक भारत के प्रमुख त्योहारी सीजन के समय पड़ रही थी। यह वह समय होता है जब देश भर में खुदरा दुकानों, बाजारों और डिजिटल ई-कॉमर्स मंचों पर लेनदेन की संख्या और मात्रा में अभूतपूर्व उछाल देखने को मिलता है। ऐसे व्यस्त व्यावसायिक दौर में नई लेन-देन फीस प्रणाली शुरू करने से तकनीकी और परिचालन संबंधी कई जटिलताएं उत्पन्न हो सकती थीं।
त्योहारी सीजन के दौरान भुगतान सेवा प्रदाताओं और खुदरा विक्रेताओं को अपने आईटी बुनियादी ढांचे, दैनिक निपटान प्रक्रियाओं और बिलिंग गणनाओं में तुरंत व्यापक बदलाव करने पड़ते। जनवरी तक विस्तार मिलने की स्थिति में वित्तीय संस्थानों और तकनीकी मंचों को नई शुल्क संरचना को पारदर्शी तरीके से समझाने और व्यापारियों के सॉफ्टवेयर में जरूरी तकनीकी संशोधन करने के लिए पर्याप्त अवसर मिल जाएगा।
कारोबारियों और तकनीकी प्रणालियों पर असर
भुगतान सेवा प्रदाताओं के लिए यह अनिवार्य होगा कि वे संशोधित फीस ढांचे के बारे में कारोबारियों को स्पष्ट विवरण दें, ताकि दुकानदारों को ठीक-ठीक पता चल सके कि कौन से लेनदेन शुल्क के दायरे में आएंगे और उनके बैंक खाते में होने वाले दैनिक निपटान में कितनी कटौती दिखेगी। यद्यपि एमडीआर का वित्तीय भार सीधे तौर पर ग्राहकों के बजाय व्यापारियों द्वारा वहन किया जाता है, फिर भी अतिरिक्त लागत का प्रभाव यह तय कर सकता है कि छोटे और मध्यम खुदरा विक्रेता ग्राहकों से डिजिटल भुगतान स्वीकार करना कैसे जारी रखते हैं।
दुकानदारों के मन में इस बात को लेकर भी चिंताएं बनी हुई हैं कि उनके कौन-से लेनदेन छूट की श्रेणी में आएंगे और किन पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा। नियमों की समयसीमा आगे बढ़ने से इन सभी तकनीकी और वाणिज्यिक शंकाओं के समाधान के लिए उचित समय मिल सकेगा।
प्रस्तावित शुल्क ढांचा और स्लैब व्यवस्था
तैयार किए जा रहे नीतिगत मसौदे के अनुसार, एमडीआर सभी प्रकार के भुगतानों पर नहीं लगाया जाएगा, बल्कि यह केवल 2,000 रुपये से अधिक के निर्दिष्ट पर्सन-टू-मर्चेंट यानी पी2एम भुगतानों पर ही लागू होगा। इसके अलावा, ली जाने वाली राशि व्यापारी की व्यावसायिक श्रेणी और उद्योग के आधार पर अलग-अलग तय की गई है।
रेलवे टिकट बुकिंग, दूरसंचार सेवा प्रदाताओं, बीमा प्रीमियम भुगतान और ईंधन यानी पेट्रोल पंप आउटलेट्स के लिए प्रति पात्र लेनदेन 5 रुपये का एक समान निश्चित शुल्क प्रस्तावित किया गया है। वहीं दूसरी ओर, अन्य सभी पात्र व्यावसायिक श्रेणियों में आने वाले व्यापारियों के लिए लेनदेन मूल्य का 0.4 प्रतिशत एमडीआर तय किया गया है, जिसके तहत प्रति लेनदेन अधिकतम 300 रुपये की सीमा निर्धारित की गई है।
इसे एक व्यावहारिक उदाहरण से समझा जा सकता है। यदि कोई ग्राहक सामान्य श्रेणी के किसी पात्र स्टोर पर यूपीआई के जरिए 10,000 रुपये का भुगतान करता है, तो वहां 0.4 प्रतिशत की दर से प्रस्तावित एमडीआर 40 रुपये बनेगा। वहीं, यदि यही 10,000 रुपये का भुगतान रेलवे, टेलीकॉम, बीमा या पेट्रोल पंप पर किया जाता है, तो उस पर केवल 5 रुपये का फ्लैट चार्ज ही कटेगा। यह वर्गीकरण सभी उच्च-मूल्य वाले भुगतानों पर एकमुश्त भारी दर लगाने के बजाय अलग-अलग क्षेत्रों की प्रकृति के अनुसार संतुलन बनाने के लिए तैयार किया गया है।
किन लेनदेनों को मिलेगी पूरी छूट
इस प्रस्तावित ढांचे में आम नागरिकों और छोटे खुदरा विक्रेताओं के हितों की सुरक्षा के लिए कई महत्वपूर्ण छूटों का प्रावधान भी शामिल किया गया है। सबसे अहम बात यह है कि आम लोगों के बीच होने वाले व्यक्तिगत लेनदेन, जैसे दोस्तों या परिवार के सदस्यों को पैसे ट्रांसफर करना, इस एमडीआर व्यवस्था से पूरी तरह बाहर रहेंगे।
इसके अलावा, 2,000 रुपये तक के सभी मर्चेंट भुगतान भी पूरी तरह शुल्क मुक्त रहेंगे। भारत में दैनिक जीवन में किराना, फल-सब्जी और स्थानीय खरीदारी जैसे छोटे मूल्य के सौदे ही यूपीआई की कुल मात्रा का सबसे बड़ा हिस्सा बनाते हैं, इसलिए यह छूट आम उपभोक्ता के रोजमर्रा के व्यवहार को अप्रभावित रखेगी।
प्रस्तावित व्यवस्था में रुपे डेबिट कार्ड से जुड़े लेनदेन को भी छूट के दायरे में रखा गया है। साथ ही, पर्सन-टू-पर्सन मर्चेंट यानी पी2पीएम श्रेणी के तहत आने वाले छोटे व्यापारी भी इससे अप्रभावित रहेंगे। इस वर्ग में आमतौर पर वे छोटे विक्रेता और खोमचे वाले आते हैं जो अपने क्यूआर कोड के माध्यम से सीधे अपने बैंक खाते में प्रति माह 1 लाख रुपये तक की राशि प्राप्त करते हैं। ये सुरक्षात्मक नियम उन लाखों छोटे उद्यमियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं जो बिना किसी अतिरिक्त बैंकिंग खर्च के यूपीआई का उपयोग कर रहे हैं। हालांकि, इन सभी प्रस्तावों के लागू होने की अंतिम तिथि और नियम एनपीसीआई के अंतिम निर्णय पर निर्भर करेंगे।


















