सौर मंडल के केंद्र में मौजूद हमारे सूरज की गतिविधियों में अचानक तीव्र उछाल दर्ज किया गया है, जिसके चलते अंतरिक्षीय मौसम में भारी उथल-पुथल देखने को मिल रही है। सौर सतह पर सक्रिय एक विशेष क्षेत्र में हुए सिलसिलेवार शक्तिशाली धमाकों के बाद अरबों टन अत्यधिक गर्म प्लाज्मा और प्रचंड चुंबकीय ऊर्जा का प्रवाह सीधे पृथ्वी की कक्षा की दिशा में आगे बढ़ रहा है। आने वाले 72 घंटों की समयसीमा हमारे भू-परिवेश और तकनीकी तंत्र के दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील मानी जा रही है। अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के आकलनों के अनुसार, 9 अक्टूबर से 11 अक्टूबर के दौरान सूरज से उत्सर्जित कम से कम तीन अलग-अलग कोरोनल मास इजेक्शन यानी सीएमई हमारी पृथ्वी के सुरक्षात्मक चुंबकीय कवच से सीधे टकराने वाले हैं। इस अंतरिक्षीय हलचल से पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल और डिजिटल नेटवर्क पर व्यापक असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।
सनस्पॉट 4549 में विस्फोट और सौर सुनामी का उभार
अंतरिक्ष में उत्पन्न हुए इस तीव्र सौर विक्षोभ का मूल केंद्र सूरज की बाहरी सतह पर स्थित ‘सनस्पॉट 4549’ नामक बेहद सक्रिय क्षेत्र है। बीते 8 अक्टूबर को इस विशिष्ट सनस्पॉट के भीतर एक के बाद एक कई जोरदार आंतरिक हलचलें और तीव्र धमाके रिकॉर्ड किए गए। इन विस्फोटों के परिणामस्वरूप एम6.7 श्रेणी की शक्तिशाली सौर लपट या सोलर फ्लेयर अंतरिक्ष में छूटी। खगोल विज्ञान में एम-श्रेणी के सौर विस्फोटों को मध्यम से उच्च तीव्रता वाली घटनाओं में गिना जाता है, जो पृथ्वी के आयनमंडल को उत्तेजित कर रेडियो सिग्नलों में तात्कालिक रुकावट पैदा करने की पूरी क्षमता रखते हैं।
हालांकि, 8 अक्टूबर को दर्ज की गई यह सौर घटना केवल लपटों के उत्सर्जन तक ही सीमित नहीं रही। इस आंतरिक धमाके ने सौर धरातल पर एक व्यापक और विनाशकारी लहर को जन्म दिया, जिसे विज्ञान की तकनीकी शब्दावली में मोर्टन वेव या आम बोलचाल में सौर सुनामी कहा जाता है। जब सौर सतह पर कोई असामान्य रूप से बड़ा धमाका घटित होता है, तो अत्यधिक गर्म प्लाज्मा और तीव्र चुंबकीय ऊर्जा की शॉकवेव पूरे सौर वायुमंडल में बिजली की गति से फैल जाती है। इस विशेष सौर सुनामी की तीव्रता इतनी अधिक थी कि वैज्ञानिकों ने इसे लगभग पूरे सौर फलक को ढकने वाली यानी नियर-ग्लोबल घटना के रूप में वर्गीकृत किया है।
16 लाख किमी प्रति घंटे की रफ्तार से अंतरिक्ष में बढ़ा प्लाज्मा
इस सौर सुनामी का आकार और इसकी गति अभूतपूर्व रूप से विशाल दर्ज की गई। विस्फोट से पैदा हुए शॉक फ्रंट का ऊर्ध्वाधर विस्तार हमारी पूरी पृथ्वी के कुल व्यास से भी कई गुना अधिक ऊंचा मापा गया। ऊर्जावान कणों और गर्म प्लाज्मा की यह लहर 16 लाख किलोमीटर प्रति घंटे से भी अधिक की प्रचंड गति से आगे बढ़ी, जो लगभग 10 लाख मील प्रति घंटे के वेग के बराबर है। इस अप्रत्याशित वेग के साथ ही सूरज की सबसे बाहरी परत यानी कोरोना से भारी मात्रा में चुंबकीय प्लाज्मा अंतरिक्ष में निष्कासित हो गया, जिसने तीन पृथक कोरोनल मास इजेक्शन का रूप ले लिया।
कोरोनल मास इजेक्शन केवल गैस के बादल नहीं होते, बल्कि ये अरबों टन आयनित पदार्थ, सुपरहीटेड प्लाज्मा और सौर चुंबकीय धाराओं का घातक संयोजन होते हैं। जब ये अंतरिक्ष की निर्वात सीमाओं को पार करते हुए हमारे ग्रह की परिधि में दाखिल होते हैं, तो इनका सीधा टकराव पृथ्वी के प्राकृतिक सुरक्षा कवच यानी मैग्नेटोस्फीयर से होता है। 9 अक्टूबर से लेकर 11 अक्टूबर के मध्य इन तीनों तूफानों के क्रमिक रूप से पृथ्वी के निकट से गुजरने या सीधे हमारे चुंबकीय आवरण पर प्रहार करने की स्थिति बन रही है।
भू-चुंबकीय तूफानों की तीव्रता और जी3 श्रेणी का खतरा
पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र पर सौर तूफानों के असर को मापने के लिए वैज्ञानिकों ने जी1 से लेकर जी5 तक का एक मानक पैमाना निर्धारित किया हुआ है। इस वर्गीकरण प्रणाली के तहत अलग-अलग स्तरों के प्रभाव देखे जाते हैं
- जी1 (माइनर): यह सबसे हल्का प्रभाव होता है, जिसमें उपग्रहों या ग्रिड पर कोई खास असर नहीं पड़ता और केवल ध्रुवीय क्षेत्रों के ऊंचे अक्षांशों पर बहुत हल्की प्राकृतिक रोशनी दिखाई देती है।
- जी2 (मॉडरेट): इस मध्यम स्तर के प्रभाव में बिजली के ट्रांसमिशन ग्रिडों में हल्के उतार-चढ़ाव आ सकते हैं और अंतरिक्ष में तैर रहे उपग्रहों की कक्षा में मामूली खिंचाव महसूस हो सकता है।
- जी3 (स्ट्रॉन्ग): यह एक मजबूत और गंभीर श्रेणी मानी जाती है। इसमें उच्च-आवृत्ति वाले रेडियो संचार में व्यापक रुकावट आती है, उपग्रह आधारित नेविगेशन में त्रुटियां उत्पन्न होती हैं और सामान्य से काफी निचले अक्षांशों तक अद्भुत ऑरोरा दिखाई देते हैं।
वर्तमान अंतरिक्षीय गणनाओं के आधार पर वैज्ञानिकों का अनुमान है कि सूरज से आ रहे इन तीन तूफानों के संयुक्त प्रभाव से पृथ्वी पर जी3 श्रेणी का सशक्त भू-चुंबकीय तूफान जन्म ले सकता है।
तकनीकी बुनियादी ढांचे और रोजमर्रा की सेवाओं पर संभावित असर
जब भी कोई बड़ा सौर तूफान पृथ्वी की तरफ बढ़ता है, तो डिजिटल दुनिया और बुनियादी सेवाओं पर निर्भर आधुनिक जनजीवन के लिए कई सवाल खड़े हो जाते हैं। जी3 श्रेणी का भू-चुंबकीय तूफान जैविक दृष्टि से मानव शरीर को कोई सीधा भौतिक नुकसान नहीं पहुंचाता, क्योंकि पृथ्वी का घना वायुमंडल इन हानिकारक विकिरणों को सतह तक पहुंचने से पहले ही रोक लेता है। इसके विपरीत, जमीन और अंतरिक्ष में स्थापित हमारे संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल बुनियादी ढांचे पर इसके तीन स्पष्ट प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिल सकते हैं।
पहला प्रमुख प्रभाव रेडियो ब्लैकआउट के रूप में सामने आ सकता है। एम-क्लास सोलर फ्लेयर और आवेशित प्लाज्मा कणों के प्रभाव से पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल में आयनीकरण तेजी से बढ़ जाता है, जिससे हाई-फ्रीक्वेंसी रेडियो सिग्नल्स परावर्तित होने के बजाय अवशोषित होने लगते हैं। यह रुकावट विशेष रूप से महासागरों के ऊपर उड़ने वाले वाणिज्यिक विमानों, समुद्री जहाजों के संचार और लंबी दूरी के आपातकालीन रेडियो लिंक को प्रभावित करती है।
दूसरा बड़ा नुकसान उपग्रह प्रणालियों और जीपीएस नेविगेशन पर पड़ सकता है। पृथ्वी की निचली और भू-स्थिर कक्षा में चक्कर काट रहे उपग्रहों के संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक सर्किट इस चुंबकीय उथल-पुथल से सीधे प्रभावित होते हैं। इसके साथ ही, आयनमंडल में आए व्यवधान के कारण अंतरिक्ष से जमीन पर आने वाले जीपीएस सिग्नलों के पारगमन समय में सूक्ष्म अंतर आ जाता है। नतीजतन, स्मार्टफोन पर चलने वाले गूगल मैप्स, नागरिक नेविगेशन ऐप्स और वाहनों के ट्रैकिंग सिस्टम या तो गलत स्थान दिखा सकते हैं या कुछ समय के लिए संपर्क खो सकते हैं।
तीसरा गंभीर असर हाई-वोल्टेज बिजली ग्रिडों पर पड़ सकता है। पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में तेजी से आने वाले बदलावों के कारण जमीन के भीतर विद्युत धाराएं प्रेरित होने लगती हैं, जिन्हें जियोमैग्नेटिकली इंड्यूस्ड करंट्स कहा जाता है। यह अनियंत्रित धारा लंबी दूरी की ट्रांसमिशन लाइनों और विशाल पावर ट्रांसफॉर्मरों में अचानक अतिरिक्त वोल्टेज का भारी दबाव बना देती है। इसके चलते ग्रिड में तकनीकी असंतुलन, ऑटोमैटिक सेफ्टी ट्रिपिंग और स्थानीय बिजली आपूर्ति ठप होने का गंभीर जोखिम खड़ा हो जाता है।
आसमान में प्रकृति का अद्भुत दृश्य: विस्तृत इलाकों में दिखेगा ऑरोरा
तकनीकी तंत्र पर मंडराते इन व्यवधानों के बीच इस अंतरिक्षीय घटना का एक अत्यंत सुंदर और विहंगम दृश्य भी देखने को मिलेगा। सौर तूफान जब पृथ्वी के वायुमंडल से क्रिया करता है, तो रात के अंधेरे में आसमान में हरी, गुलाबी, लाल और नीली रोशनी की लहरें नाचती हुई नजर आती हैं, जिन्हें ऑरोरा कहा जाता है।
यह जादुई नजारा तब बनता है जब सूरज से आए अत्यधिक ऊर्जावान आवेशित कण पृथ्वी की चुंबकीय रेखाओं के सहारे वायुमंडल की ऊपरी परतों में प्रवेश करते हैं और वहां मौजूद ऑक्सीजन तथा नाइट्रोजन गैस के अणुओं से टकराते हैं। यह टकराव गैसों को उत्तेजित कर देता है, जिससे वे चमकीले रंगों के रूप में प्रकाश उत्सर्जित करती हैं। सामान्य परिस्थितियों में ऑरोरा केवल उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के अत्यंत सुदूर ठंडे क्षेत्रों तक ही सीमित रहता है। लेकिन जी3 स्तर का सशक्त तूफान चुंबकीय क्षेत्र को इस कदर संकुचित और विक्षुब्ध कर देता है कि यह चमकीला नजारा संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और यूरोप के कई मध्यवर्ती और निचले अक्षांशीय देशों के आसमान में भी स्पष्ट दिखाई दे सकता है, जहां आमतौर पर ऐसा दृश्य कभी नहीं दिखता।



















