आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक का दायरा अब केवल कंप्यूटर कोडिंग या जटिल गणितीय समीकरणों को हल करने तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह जीव विज्ञान और जीवन विज्ञान के अनुसंधानों में भी कदम रख चुका है। एंथ्रोपिक ने यह जानकारी साझा की कि उसके एआई मॉडल क्लॉड ने बैक्टीरियोफेज, जो बैक्टीरिया को संक्रमित करने वाले वायरस होते हैं, के भीतर एक अनोखी जैविक प्रणाली का पता लगाया है। इस नए सिस्टम को आर्ट नाम दिया गया है, जिसका पूरा रूप एरे-एसोसिएटेड रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेजेस है। यह संरचना काफी हद तक लोकप्रिय जीन एडिटिंग तकनीक क्रिस्पर से मिलती-जुलती नजर आती है, जिसके सामने आने के बाद वैज्ञानिक हलकों में इसे लेकर भारी उत्सुकता देखी गई।
सितंबर की घोषणा और मौलिकता पर उठे सवाल
सितंबर के महीने में सार्वजनिक किए गए इस दावे ने अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक बिरादरी में तुरंत ध्यान आकर्षित किया। हालांकि, इस उत्साह के बीच डेनमार्क के एक शोधकर्ता ने इस उपलब्धि की मौलिकता पर गंभीर आपत्ति दर्ज करा दी। शोधकर्ता का कहना है कि वे और उनकी टीम पहले से ही इसी प्रणाली पर लंबे समय से काम कर रहे थे। इस आपत्ति के सामने आने के बाद यह बहस छिड़ गई है कि क्या यह खोज वास्तव में एआई की अपनी स्वतंत्र समझ का नतीजा है या फिर किसी मानव शोधकर्ता के काम से प्रभावित है। इसके अलावा, एंथ्रोपिक का यह पूरा दावा अभी तक किसी वैज्ञानिक प्रयोगशाला में प्रायोगिक तौर पर सिद्ध नहीं हुआ है और न ही इसे किसी पीयर-रिव्यू जर्नल में समीक्षा के बाद प्रकाशित किया गया है।
एआई एजेंटों का विश्लेषण और क्रिस्पर से तुलना
इस खोज की प्रक्रिया को समझाते हुए बताया गया कि क्लॉड ने बैक्टीरिया को संक्रमित करने वाले वायरसों में एक असामान्य जैविक पैटर्न को रेखांकित किया था। इस जटिल जांच को पूरा करने के लिए लगभग 950 एआई एजेंटों को काम पर लगाया गया, जिन्होंने दो लाख से अधिक रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज एंजाइमों के डेटाबेस की बारीक छानबीन की। निरंतर 21 घंटे तक चले सघन कम्प्यूटेशनल विश्लेषण के बाद एआई को एक संभावित उम्मीदवार खोजने में सफलता मिली। एंथ्रोपिक के अनुसार इस तंत्र में क्रिस्पर जैसी कई समानताएं मौजूद हैं। क्रिस्पर तकनीक ने जेनेटिक रिसर्च और कई गंभीर बीमारियों के उपचार की दिशा में क्रांति ला दी है, हालांकि वैज्ञानिकों ने अभी तक यह पुष्ट नहीं किया है कि आर्ट प्रणाली वास्तव में व्यावहारिक जीन एडिटिंग करने में सक्षम है अथवा नहीं।
शोधकर्ता का विरोध और साझा किए गए डेटा की बहस
विवाद की मुख्य जड़ कोपेनहेगन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता मारियो रोड्रिग्ज मेस्त्रे का वह बयान है जिसमें उन्होंने दावा किया कि उनकी टीम वर्षों से इस विशेष जैविक संरचना का अध्ययन कर रही है। मेस्त्रे ने स्पष्ट किया कि अपनी डॉक्टरेट की रिसर्च के दौरान उन्होंने क्लॉड का बहुत बड़े पैमाने पर उपयोग किया था। इस अध्ययन के दौरान उन्होंने कई अप्रकाशित सामग्रियां और आंकड़े भी मॉडल के साथ साझा किए थे। इसी आधार पर मेस्त्रे ने यह कड़ा सवाल खड़ा किया है कि क्या एंथ्रोपिक द्वारा प्रस्तुत की गई खोज शत-प्रतिशत स्वतंत्र रूप से की गई थी या फिर उनके द्वारा की गई बातचीत और अनपब्लिश्ड रिसर्च के आदान-प्रदान का इस परिणाम पर सीधा असर पड़ा है।
एंथ्रोपिक का स्पष्टीकरण और शोध की वर्तमान स्थिति
इस पूरे मामले पर अपना पक्ष रखते हुए एंथ्रोपिक ने स्पष्ट किया कि उसका मॉडल उपयोगकर्ताओं के निजी चैट ट्रांसक्रिप्ट पर प्रशिक्षित नहीं किया जाता है। कंपनी की कार्यप्रणाली के मुताबिक क्लॉड के एजेंट सीधे सार्वजनिक जेनेटिक डेटाबेस में पैटर्न तलाशते हैं और नई परिकल्पनाएं तैयार करते हैं, जिसके बाद वैज्ञानिक केवल शुरुआती दिशा तय करते हैं और लैब परीक्षणों को आगे बढ़ाते हैं। कंपनी ने यह भी स्वीकार किया कि मूल रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज एंजाइम विज्ञान जगत में पहले से ही ज्ञात था। इस खोज में एआई का वास्तविक योगदान केवल दोहराए जाने वाले डीएनए अनुक्रमों के पैटर्न की पहचान करना था, जो एक नई जैविक प्रणाली की संभावना को दर्शाता है। फिलहाल यह खोज शुरुआती चरण में है, इसके काम करने का सटीक तरीका और उपयोगिता अभी स्पष्ट नहीं है और इसका पीयर-रिव्यू भी बाकी है।


















