बस्तर क्षेत्र में सब्जियों की मांग हमेशा ऊंची बनी रहती है, और इसी का फायदा उठाकर कई किसान अब पारंपरिक फसलों के बजाय नई और नकदी फसलों का रुख कर रहे हैं। तोरई लोगों की सबसे पसंदीदा सब्जियों में से एक है, जो अब किसानों के लिए मुनाफे का बड़ा जरिया बन चुकी है। तोरई की खेती एक ऐसा विकल्प है जिसमें किसानों को कम लागत लगाकर बहुत अधिक मुनाफा प्राप्त होता है। सही तकनीक और योजना के साथ अगर कोई किसान तोरई उगाना शुरू करे, तो वह बहुत जल्द लखपति बन सकता है।
बरसात के मौसम में सब्जियों की भारी मांग
आमतौर पर बरसात के समय ज्यादातर किसान धान की खेती को प्राथमिकता देते हैं। धान उगाने वालों की बड़ी संख्या के कारण बाजार में सब्जियों की कमी होने लगती है, जिससे इनकी खेती करना एक फायदे का सौदा बन जाता है। धान की अधिकता और सब्जियों की कमी के चलते बाजार में तोरई की डिमांड और इसके दाम दोनों अच्छे मिलते हैं। बस्तर में ऐसे समय में सब्जियों की आपूर्ति करके किसान बढ़िया आमदनी कर रहे हैं। जानकारों के मुताबिक, आधे एकड़ तोरई की खेती में शुरुआत में पच्चीस से दस हजार तक का भी जिक्र आता है, जिससे लागत और कमाई का समीकरण किसानों के पक्ष में रहता है।
कमलू बघेल ने पेश की सफलता की मिसाल
बस्तर के निवासी कमलू बघेल एक ऐसे ही प्रगतिशील किसान हैं जो तोरई की खेती करके लाखों रुपये की कमाई कर रहे हैं। उन्होंने अपनी आधे एकड़ जमीन पर यह फसल उगाई है। कमलू का कहना है कि उनकी इस पूरी खेती में लगभग 30 से 35 हजार रुपये की कुल लागत आई है। इस निवेश के बदले उन्हें अपनी फसल से करीब एक लाख रुपये तक का सीधा फायदा मिलने की उम्मीद है। उनके अनुसार, इस फसल का एक बड़ा लाभ यह है कि इसमें बीमारियों का प्रकोप बहुत कम लगता है, जिससे कीटनाशकों और दवाइयों पर होने वाला अतिरिक्त खर्च बच जाता है।
खेत की तैयारी और रोपण की सही विधि
तोरई की अच्छी पैदावार के लिए खेत की तैयारी विशेष तरीके से करनी होती है। कमलू बघेल बताते हैं कि सबसे पहले पूरे खेत की अच्छी तरह से दो बार जुताई करनी चाहिए। मिट्टी को नरम और समतल बनाने के लिए इसके बाद खेत में रोटावेटर चलाना आवश्यक है। अगली प्रक्रिया में खेत के अंदर बेड बनाए जाते हैं और उनके ऊपर मल्चिंग बिछाई जाती है ताकि नमी बरकरार रहे। खाद प्रबंधन के तहत बेसल डोज में मुख्य रूप से गोबर की खाद, डीएपी और सुपर का इस्तेमाल किया जा सकता है। पौधों को फैलने की जगह देने के लिए बेड से बेड की दूरी कम से कम एक मीटर से ज्यादा रखनी चाहिए। वहीं, एक पौधे से दूसरे पौधे के बीच की दूरी सटीक दो फीट होनी चाहिए।
खाद प्रबंधन और फसल का चक्र
तोरई उगाने के लिए सीधे खेतों में इसका बीज भी लगाया जा सकता है और नर्सरी में तैयार पौधा भी रोपा जा सकता है। पौधों को पोषण देने के लिए फसल में ऊपर से 19:19 खाद डालना जरूरी होता है। फसल की सुरक्षा के लिए, हालांकि इसमें बीमारियां न के बराबर लगती हैं, फिर भी एहतियात के तौर पर समय-समय पर उचित कीटनाशक का छिड़काव करना चाहिए। यह खेती इसलिए भी खास है क्योंकि फसल केवल दो महीने के भीतर कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह पूरी फसल मुख्य रूप से तीन महीने की होती है, जो बहुत कम समय में किसानों को उनकी मेहनत का फल दे देती है।















