गोवा की गलियों में जब तीन दशक पहले एक युवा वैज्ञानिक ताजे मशरूम लेकर निकला था, तब स्थानीय बाजार उसे अपनाने के लिए तैयार नहीं थे। उस समय भारतीय खानपान में मशरूम को मुख्य सब्जी के रूप में कम ही स्वीकार किया जाता था। दुकानदार टोकरियों में रखे मशरूम को अपनी दुकानों पर जगह देने से मना कर देते थे और ग्राहक इसे खरीदने में हिचकिचाते थे। इस कठिन शुरुआत के बावजूद डॉ. संगम कुराडे ने अपने कदम पीछे नहीं खींचे। उन्होंने मुश्किलों को चुनौती मानकर स्वीकार किया और आज उसी दृढ़ संकल्प के बल पर 117 करोड़ रुपये से अधिक के सालाना कारोबार वाला विशाल कृषि व्यवसाय खड़ा कर दिया है।
मापुसा की गलियों से शुरुआत और शुरुआती अड़चनें
फूड साइंस एंड टेक्नोलॉजी में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करने के बाद डॉ. संगम कुराडे ने वर्ष 1994 में मशरूम की खेती करने का फैसला किया। उनका शैक्षणिक अनुभव उन्हें बताता था कि मशरूम केवल एक साधारण मौसमी उपज नहीं है, बल्कि इसे एक सालभर चलने वाले आधुनिक औद्योगिक मॉडल में बदला जा सकता है। शुरुआती दौर में जब वह ताजे मशरूम टोकरियों में भरकर गोवा के मापुसा बाजार में दुकानों के चक्कर काटते थे, तब बहुत कम बिक्री होती थी। लोगों में इस उत्पाद को लेकर जानकारी का अभाव था। ऐसे में उन्होंने तकनीक सीखने के साथ साथ स्थानीय स्तर पर उपभोक्ताओं के बीच मशरूम की स्वीकार्यता और मांग पैदा करने का काम भी शुरू किया।
शुरुआती संघर्षों के दौर में उन्हें यूएसएआईडी से करीब 1.25 करोड़ रुपये का वित्तीय अनुदान मिला। इस आर्थिक सहायता ने उनके काम को गति दी और उन्होंने अपने फार्म के बुनियादी ढांचे को मजबूत किया। लगातार प्रयासों के दम पर उनके फार्म में प्रतिदिन एक टन मशरूम का उत्पादन होने लगा था, जिससे उनका व्यवसाय स्थिरता की ओर बढ़ता दिखने लगा।
तालपोना नदी की विनाशकारी बाढ़ और तीन महीने में वापसी
जब कारोबार रफ्तार पकड़ रहा था, तभी प्रकृति ने उनकी सबसे कठिन परीक्षा ली। तारीख थी 2 अक्टूबर 2009, जब तालपोना नदी में आई भयानक बाढ़ ने उनकी पूरी उत्पादन यूनिट को जलमग्न कर दिया। बीते 15 वर्षों की कड़ी मेहनत, तैयार ढांचा और उपकरण पलक झपकत ही मलबे के ढेर में बदल गए। किसी भी साधारण उद्यमी के लिए यह सब कुछ समेटकर पीछे हट जाने का समय हो सकता था, लेकिन डॉ. कुराडे ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने नुकसान पर आंसू बहाने के बजाय अपनी यूनिट को दोबारा खड़ा करने की ठानी। अपनी अटूट इच्छाशक्ति के सहारे उन्होंने महज तीन महीनों के भीतर पूरी उत्पादन इकाई को फिर से चालू कर दिया।
उसगांव में 'एग्रीफैक्चर' मॉडल और आधुनिक विस्तार
बाढ़ के बाद जोखिम को पूरी तरह खत्म करने के लिए डॉ. कुराडे ने अपने काम करने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने अपने कारोबार को सुरक्षित और तकनीकी रूप से उन्नत बनाने के लिए गोवा के उसगांव में एक नया केंद्र स्थापित किया। यहां उन्होंने 'एग्रीफैक्चर' का सिद्धांत लागू किया, जिसका सीधा मतलब है खेती के भीतर फैक्ट्री जैसी तकनीकी सटीकता, कठोर मानक और प्रक्रियाएं लागू करना।
इस मॉडल के तहत पूरी तरह से नियंत्रित इनडोर वातावरण तैयार किया गया, जहां तापमान, नमी और खाद की गुणवत्ता को वैज्ञानिक रूप से प्रबंधित किया जाता है। मौसम की अनिश्चितताओं से बेपरवाह यह प्रणाली सालभर लगातार उत्पादन सुनिश्चित करती है। आज इस उपक्रम के पास 1.2 लाख वर्ग मीटर का विशाल ग्रोइंग एरिया मौजूद है, जहां से रोजाना लगभग 28,000 किलोग्राम यानी 28 टन मशरूम का उत्पादन किया जाता है। सामान्य बटन मशरूम से शुरू हुआ यह सफर अब अंतरराष्ट्रीय स्तर की महंगी किस्मों तक पहुंच चुका है, जिसमें शिटाके, पोर्टोबेलो और किंग ऑयस्टर जैसी किस्में शामिल हैं।
वित्तीय वृद्धि और 117 करोड़ रुपये का मील का पत्थर
डॉ. कुराडे की कंपनी जुरी फूड्स एंड फार्म्स प्राइवेट लिमिटेड ने वित्तीय मोर्चे पर भी लगातार मजबूत प्रदर्शन किया है। वित्तीय वर्ष 2014 में कंपनी का राजस्व लगभग 6.10 करोड़ रुपये दर्ज किया गया था। तकनीक और मांग के तालमेल से यह आंकड़ा वित्तीय वर्ष 2017 में बढ़कर 19.48 करोड़ रुपये और वित्तीय वर्ष 2019 में 33.23 करोड़ रुपये पर पहुंच गया।
इसके बाद कंपनी ने अपनी रफ्तार और तेज की। वित्तीय वर्ष 2024 में जुरी फूड्स एंड फार्म्स का कुल कारोबार 85.29 करोड़ रुपये तक जा पहुंचा। वित्तीय वर्ष 2025 में कंपनी का समेकित राजस्व 37 प्रतिशत की प्रभावशाली वृद्धि के साथ 117 करोड़ रुपये के पार निकल गया। इस दौरान कंपनी ने 20.21 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा दर्ज करके यह साबित कर दिया कि आधुनिक कृषि तकनीक और दृढ़ संकल्प के साथ खेती को एक बेहद मुनाफे वाले उद्योग में बदला जा सकता है।

















