राजस्थान के भरतपुर जिले में एक बार फिर लंपी स्किन डिजीज ने गोवंश को अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया है, जिससे स्थानीय पशुपालकों की चिंताएं काफी बढ़ गई हैं। हालांकि इस बार संक्रमण का दायरा तो तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसकी घातकता पिछली बार की तुलना में कम आंकी जा रही है। पशुपालन विभाग पूरी तरह से सतर्क अवस्था में है और हालात को काबू में करने के लिए लगातार जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं। प्रशासन की सक्रियता के बावजूद ग्रामीण इलाकों में बीमारी के नए मामले लगातार सामने आ रहे हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में एहतियात बरती जा रही है।
भरतपुर जिले में इस संक्रामक बीमारी के मामले मुख्य रूप से अगस्त के तीसरे सप्ताह के दौरान यानी बीस अगस्त के आसपास से देखे जाने लगे थे। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक अब तक पूरे जिले में लगभग तीन हजार गोवंश इस संक्रमण की गिरफ्त में आ चुका है। जानकारों और अधिकारियों का मानना है कि मानसून की विदाई के वक्त और बारिश के अंतिम दौर के बाद बढ़ी हुई आद्र्रता और मौसम में अचानक आए बदलाव ने इस वायरस के तेजी से फैलने के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा कर दी थीं। शुरुआती रिपोर्टों से यह बात सामने आई है कि उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे हुए इलाकों में इसके मामले सबसे ज्यादा तादाद में दर्ज किए गए, जिसके बाद यह धीरे-धीरे जिले के अन्य हिस्सों में भी फैलने लगा। वर्तमान समय में सेवर, नदबई और उच्चैन के क्षेत्रों में लंपी के सर्वाधिक मरीज जानवर मिल रहे हैं, जो पशु मालिकों के लिए बड़ी मुसीबत बने हुए हैं।
जिलेभर में मवेशियों की कुल आबादी करीब एक लाख के आसपास है, जिसके मद्देनजर पशुपालन विभाग ने तत्परता दिखाते हुए लगभग अस्सी प्रतिशत पशुओं का टीकाकरण कार्य सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। विभाग के अधिकारी मनोज कुमार ने इस संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि इतनी बड़ी संख्या में हुए टीकाकरण का ही यह सकारात्मक परिणाम है कि इस बार बीमारी पशुओं के शरीर में गंभीर रूप धारण नहीं कर पा रही है। वैक्सीन लगने से मवेशियों के भीतर रोग प्रतिरोधक क्षमता में जबरदस्त इजाफा हुआ है, जिसके चलते मृत्यु दर में खासी गिरावट दर्ज की गई है। अब तक आठ सौ अट्ठाइस संक्रमित पशु पूरी तरह से स्वस्थ होकर अपनी सामान्य स्थिति में लौट चुके हैं, जिसे एक राहत भरा संकेत माना जा रहा है। शत-प्रतिशत गोवंश को सुरक्षित करने के उद्देश्य से टीकाकरण अभियान अभी भी मैदान में लगातार जारी है।
पशुपालकों को यह सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने पालतू पशुओं के स्वास्थ्य पर पूरी तरह से नजर बनाए रखें। लंपी वायरस से पीड़ित कोई भी मवेशी शुरुआत के दिनों में चारा और पानी खाना-पीना कम कर देता है, जो इस बीमारी का सबसे पहला और प्रमुख लक्षण हो सकता है। इसके कुछ समय बाद पशु की त्वचा, गर्दन और उसकी पीठ के हिस्से पर गांठें यानी नोड्यूल उभरने लगते हैं। इसके अलावा तेज बुखार आना, आंखों और नाक से लगातार पानी टपकना तथा दूध के उत्पादन में भारी कमी आना भी इसके मुख्य लक्षणों में शुमार है। यदि समय पर सही उपचार मिल जाए तो पशु आमतौर पर तीन से पांच दिनों के भीतर सुधार के लक्षण प्रदर्शित करने लगता है।
जिला प्रशासन और पशुपालन विभाग की तरफ से उत्पन्न हुई इस आपात स्थिति से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए जिला मुख्यालय पर एक विशेष कंट्रोल रूम की स्थापना की गई है। सभी पशुपालकों को यह हिदायत दी गई है कि यदि उनके किसी भी पशु में संक्रमण के लक्षण दिखाई दें तो वे तुरंत इसकी सूचना कंट्रोल रूम के फोन नंबर 05644-224375 पर दें। जैसे ही विभाग को इसकी सूचना मिलती है, एक विशेष रैपिड रिस्पांस टीम तुरंत घटनास्थल के लिए रवाना हो जाती है। इस दल में एक योग्य पशु चिकित्सक, एक एलएसआई और एक पशुधन परिचर शामिल होते हैं जो मौके पर पहुंचकर इलाज करते हैं। इसके अलावा विभाग ने यह एडवाइजरी भी जारी की है कि लोग संक्रमित मवेशियों को स्वस्थ पशुओं से तुरंत अलग रखें और साफ-सफाई का विशेष प्रबंध करें। मक्खी और मच्छरों के प्रकोप से पशुओं को बचाना भी इस संक्रमण की चेन को तोड़ने में बेहद मददगार साबित हो सकता है।

















