लौकी और तोरई की खेती
लौकी एक ऐसी नकदी फसल है जो साल भर मांग में रहती है। जून-जुलाई में बोने पर नमी के कारण इसकी बेलें तेजी से बढ़ती हैं। दोमट मिट्टी इसके लिए आदर्श है और 55 से 70 दिनों में फसल कटाई के लिए तैयार हो जाती है। मचान विधि का उपयोग करने से गुणवत्ता और पैदावार दोनों बढ़ते हैं। वहीं, तोरई कम लागत में तैयार होने वाली मानसून की एक प्रमुख फसल है। यह 45 से 60 दिनों में तैयार हो जाती है। नियमित तुड़ाई करने से पौधों में लगातार फल आते हैं, जिससे शहरी और ग्रामीण दोनों बाजारों में अच्छा मुनाफा मिलता है।
भिंडी और करेले का महत्व
भिंडी किसानों के बीच काफी लोकप्रिय है। जून-जुलाई में लगाई गई भिंडी तेजी से विकसित होती है और रोपाई के करीब 45 दिन बाद ही फल देना शुरू कर देती है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि एक बार उत्पादन शुरू होने के बाद यह लंबे समय तक फल देती रहती है। करेला अपनी औषधीय खूबियों के कारण सदाबहार मांग में रहता है, खासकर मधुमेह के मरीजों के लिए। बारिश के मौसम में करेले की बेलें बहुत तेजी से फैलती हैं। मचान या जाल का उपयोग करने से किसान बंपर पैदावार प्राप्त कर सकते हैं।
खीरा और कद्दू से बेहतर आय
खीरे की बाजार में मांग साल भर बनी रहती है। जून-जुलाई की बुवाई से इसे पर्याप्त नमी मिलती है, जिससे फल बड़े और अच्छे आकार के बनते हैं। यह फसल केवल 40 से 50 दिनों में तैयार होकर जल्दी आय का स्रोत बन जाती है। कद्दू भी बारिश के मौसम में आसानी से उगाया जा सकता है। यह लंबी अवधि तक उत्पादन देता है और कम लागत में किसानों को काफी लाभ दिलाता है, क्योंकि इसकी बाजार में मांग बहुत अधिक रहती है।
सेम और मिर्च का विकल्प
सेम एक पौष्टिक सब्जी है जो जून-जुलाई के दौरान अच्छी बढ़वार करती है, बस खेत में जलभराव नहीं होना चाहिए। पौधों को सहारा देने से अधिक फलियां प्राप्त होती हैं। अंत में, मिर्च की खेती एक बेहद लाभदायक विकल्प है। इसकी पौध तैयार करके जुलाई तक रोपाई की जा सकती है। यदि कीटों पर नियंत्रण रखा जाए, तो किसान हरी और सूखी दोनों प्रकार की मिर्च बेचकर अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।













