सर्दियों की शुरुआत के साथ ही खेतों में रबी फसलों की तैयारी तेज हो गई है। पारपंरिक फसलों में लंबा वक्त और भारी लागत लगने के कारण कई बार किसानों का शुद्ध मुनाफा सीमित रह जाता है। ऐसे में कंद वाली सब्जियों की खेती एक बेहद व्यावहारिक और फायदेमंद विकल्प बनकर उभरती है। कृषि जानकारों का मानना है कि यदि रबी के इस दौर में कंद फसलों की आधुनिक प्रजातियों और वैज्ञानिक रोपाई तकनीकों का सहारा लिया जाए, तो किसान कम रकबे में भी शानदार उत्पादन हासिल कर सकते हैं। मिट्टी के भीतर तैयार होने वाली ये फसलें न केवल कम समय में कटाई के लिए तैयार होती हैं, बल्कि स्थानीय मंडियों में इनकी लगातार मांग बनी रहने से किसानों को नियमित नकदी प्रवाह भी मिलता है।
चुकंदर की उन्नत किस्में और वैज्ञानिक बुवाई तकनीक
स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के दौर में चुकंदर की मांग बाजारों में काफी बढ़ी है, जिससे किसानों के लिए इसका उत्पादन आर्थिक रूप से बेहद लाभकारी बन चुका है। जो किसान इसकी बुवाई की योजना बना रहे हैं, उनके लिए क्रिमसन ग्लोब और डेट्रॉइट डार्क रेड जैसी किस्में सबसे मुफीद मानी जाती हैं। चुकंदर के लिए नवंबर के पहले सप्ताह तक का समय बुवाई की दृष्टि से सर्वोत्तम रहता है। खेत तैयार करते वक्त इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि मिट्टी में पर्याप्त भुरभुरापन हो ताकि कंद बिना किसी रुकावट के बढ़ सकें।
बुवाई की प्रक्रिया में छिद्र रोपण विधि अपनाना सबसे उपयुक्त रहता है। इस विधि के तहत प्रति एकड़ 2 से 4 किग्रा बीज की जरूरत पड़ती है। पौधों के समुचित विकास के लिए पंक्ति से पंक्ति के बीच 30 से 70 सेमी का फासला तय करना चाहिए, जबकि एक पौधे से दूसरे पौधे की दूरी 10 सेमी रखी जानी चाहिए। पैदावार के आंकड़ों पर नजर डालें तो सामान्य किस्मों से प्रति एकड़ करीब 80 क्विंटल की उपज मिलती है। वहीं यदि हाइब्रिड किस्मों का चयन किया गया हो, तो उत्पादन का यह आंकड़ा 200 क्विंटल प्रति एकड़ तक पहुंच जाता है।
गाजर की खेती से पाएं भारी उत्पादन
सर्दियों के दिनों में गाजर हर रसोई का अहम हिस्सा बन जाती है, जिससे मंडियों में इसकी आवक तेजी से खपती है। बेहतर गुणवत्ता और लाल रंग की जड़ें पाने के लिए किसान पूसा केसर, पूसा रुधिरा, पूसा वसुधा और पूसा वृष्टि जैसी प्रजातियां लगा सकते हैं। इन किस्मों की रोपाई के लिए अक्टूबर के अंतिम दिनों से लेकर नवंबर के पहले हफ्ते तक का समय सबसे अनुकूल बैठता है। समय पर की गई बुवाई से पौधों को ठंडक का पूरा लाभ मिलता है और कंद लंबे व सुडौल बनते हैं।
संकर किस्मों के मामले में प्रति एकड़ 2 से 3 किग्रा बीज दर की सिफारिश की जाती है। खेत में कतारें बनाते समय पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 सेमी और पौधे से पौधे का फासला 60 सेमी रखना चाहिए, जिससे पौधों को धूप और पोषक तत्व भरपूर मिलें। इस फसल की कटाई का दौर दिसंबर से शुरू होकर मार्च तक चलता रहता है। सही देखभाल और पोषण प्रबंधन से किसान प्रति एकड़ 80 से 120 क्विंटल या उससे भी ज्यादा पैदावार अपने खेत से निकाल सकते हैं।
मूली से हासिल करें त्वरित नकद आमदनी
कम से कम समय में तैयार होकर तुरंत मुनाफा देने वाली फसलों में मूली सबसे आगे मानी जाती है। जो किसान जल्दी नकदी चाहते हैं, वे पूसा चेतकी, पूसा रेशमी, चाइनीज पिंक और काशी हंस जैसी किस्मों का चुनाव कर सकते हैं। इस फसल के लिए नवंबर का महीना बुवाई के लिए सबसे मुफीद माना गया है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें बीज का खर्च बेहद कम आता है, क्योंकि प्रति एकड़ केवल 1 किग्रा बीज ही पर्याप्त होता है।
मूली के बीजों को कतारों में बोते वक्त दो पंक्तियों के बीच 30 सेमी का अंतर रखें और पौधों के बीच 10 से 15 सेमी की जगह छोड़ें। उचित दूरी मिलने पर जड़ें सीधी और मोटी होती हैं, जिससे बाजार में उनका बेहतर भाव मिलता है। जनवरी से लेकर अप्रैल तक मंडियों में पहुंचने वाली मूली की इस फसल से किसानों को औसतन 120 क्विंटल प्रति एकड़ तक की जोरदार पैदावार मिलती है।
सब्जियों का राजा आलू देगा ठोस मुनाफा
रबी फसलों के प्रमुख केंद्र में हमेशा से आलू रहा है, जिसे सब्जियों का राजा भी कहा जाता है। बड़े पैमाने पर आलू उगाने वाले उत्पादकों के लिए कुफरी चंद्रमुखी, कुफरी ज्योति, कुफरी बहार और कुफरी चिप्सोना जैसी उन्नत प्रजातियां सबसे भरोसेमंद विकल्प हैं। आलू लगाने का कार्य सितंबर से लेकर दिसंबर के महीनों तक चरणबद्ध तरीके से किया जा सकता है। इसमें प्रति एकड़ 12 क्विंटल बीज कंदों की दरकार होती है।
खेत में रोपाई करते समय बीजों को 8 से 10 सेमी की गहराई में दबाया जाना चाहिए ताकि आलू धूप के संपर्क में आकर हरे न पड़ें। इसके साथ ही पंक्तियों के बीच 45 सेमी और कंदों के बीच 25 सेमी की दूरी निर्धारित करनी चाहिए। जनवरी से मार्च के बीच जब फसल की खुदाई पूरी होती है, तब प्रति एकड़ 80 क्विंटल से अधिक की पैदावार प्राप्त की जा सकती है, जो भंडारण और सीधी बिक्री दोनों के लिए उत्तम रहती है।
शलजम की कम लागत वाली खेती
कम खर्च में तैयार होने और बाजार में अच्छी मांग के चलते शलजम की खेती छोटे किसानों के लिए काफी सुलभ सौदा है। इसके लिए पर्पल टॉप व्हाइट ग्लोब किस्म का चयन करना सबसे उत्तम माना गया है। शलजम लगाने के लिए नवंबर का महीना सबसे आदर्श अवधि है। इसमें प्रति एकड़ केवल 1 से 1.5 किग्रा बीज की आवश्यकता पड़ती है, जिससे शुरुआती लागत न्यूनतम रहती है।
खेत में पंक्तियों की दूरी 30 सेमी और पौधों के बीच की दूरी 15 सेमी बनाकर रखनी चाहिए। दिसंबर से मार्च के दौरान जब फसल की तुड़ाई होती है, तो किसानों को प्रति एकड़ 120 क्विंटल तक का उत्पादन हाथ लगता है। सीमित सिंचाई और सामान्य देखभाल में यह फसल बहुत बढ़िया परिणाम देती है।
बुवाई के दौरान ध्यान रखने योग्य सावधानियां
बहराइच कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर शैलेंद्र सिंह के मुताबिक कंद वाली फसलों से भरपूर उपज हासिल करने के लिए जमीन की तैयारी सबसे आधारभूत कदम है। बुवाई से पूर्व खेत की गहरी जुताई की जानी चाहिए ताकि मिट्टी में वायु संचार सुधरे और कंदों को नीचे गहराई तक फैलने की जगह मिल सके। इसके अलावा खेत में उचित जल निकासी की व्यवस्था होना अनिवार्य है, क्योंकि रुका हुआ पानी कंदों को सड़ा सकता है। डॉक्टर शैलेंद्र सिंह यह भी बताते हैं कि बीजों को 1 से 2 सेमी की गहराई पर ही बोना चाहिए, जिससे अंकुरण सहजता से हो और पौधे अपनी शुरुआती अवस्था में मजबूत जड़ें विकसित कर सकें।















