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टाटा समूह में नियंत्रण की खींचतान अब कोर्ट में, आमने-सामने होंगे दो दिग्गज वकीलव्यापार
20 सित॰ 2026, 4:36 pm (20 मिनट पहले)· 2

टाटा समूह में नियंत्रण की खींचतान अब कोर्ट में, आमने-सामने होंगे दो दिग्गज वकील

टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच अधिकारों को लेकर उपजा टकराव अब देश की शीर्ष अदालतों में बड़ी कानूनी लड़ाई का रूप लेने जा रहा है, जिसमें सिंघवी और साल्वे मुख्य भूमिकाओं में होंगे।

भारतीय उद्योग जगत के सबसे बड़े कारोबारी साम्राज्यों में शुमार टाटा समूह के भीतर प्रशासनिक अधिकारों और नियंत्रण को लेकर चल रहा आंतरिक तनाव अब अदालती दहलीज तक पहुंच चुका है। इस गंभीर कानूनी टकराव में दोनों पक्षों ने देश की दो सबसे दिग्गज कानूनी हस्तियों को कमान सौंपी है। दानार्थ संस्थाओं के समूह टाटा ट्रस्ट्स की ओर से अदालत में दलीलें पेश करने के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता और कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी को मुख्य वकील नियुक्त किया गया है। दूसरी ओर, समूह की मूल संचालक इकाई टाटा संस की तरफ से जाने-माने विधिवेत्ता हरीश साल्वे कमान संभालेंगे। इस हाईप्रोफाइल मुकाबले के केंद्र में प्रमुख संस्थागत शेयरधारकों के अधिकार, बोर्ड के फैसले और विनियामक दखलंदाजी से जुड़े पेचीदा सवाल खड़े हैं।

शेयरधारकों के मूल अधिकारों और विरासत पर सिंघवी का रुख

टाटा समूह तथा दिवंगत उद्योगपति रतन टाटा के साथ अपने लंबे पेशेवर व व्यक्तिगत जुड़ाव की चर्चा करते हुए अभिषेक मनु सिंघवी ने इस पूरे घटनाक्रम पर दुख व्यक्त किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि समूह के दोनों पक्षों के शीर्ष नेतृत्व से उनके हमेशा आत्मीय संबंध रहे हैं। उनका मानना है कि इतने बड़े और गरिमामयी औद्योगिक घराने के विवाद को यदि बातचीत से हल कर लिया जाता तो यह सबसे बेहतर होता। सिंघवी के अनुसार, अब जब उन्हें कानूनी रूप से एक पक्ष का नेतृत्व सौंपा गया है, तो वे संस्थागत अंशधारकों के मूल अधिकारों की मजबूती से रक्षा करेंगे। उनका तर्क है कि यदि किसी प्राथमिक शेयरधारक के मौलिक अधिकारों को छीना गया या कमजोर किया गया, तो इसका पूरे भारतीय कॉर्पोरेट जगत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और कंपनियों के संचालन नियमों के लिए एक खतरनाक स्थिति पैदा हो जाएगी।

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नियंत्रण और वीटो पावर से जुड़े बुनियादी विवाद के कारण

टाटा संस और ट्रस्ट्स के बीच मतभेद केवल रोजमर्रा के कामकाज तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह मालिकाना हक और नियंत्रण की शक्तियों का मामला है। टाटा संस में टाटा ट्रस्ट्स की कुल इक्विटी हिस्सेदारी करीब 66 प्रतिशत है, जो इसे सबसे प्रभावशाली इकाई बनाती है। ऐतिहासिक परंपराओं के अनुसार, समूह से जुड़े किसी भी बड़े और रणनीतिक फैसले में ट्रस्ट्स की भूमिका निर्णायक मानी जाती रही है। विवाद की मुख्य जड़ यह तय करना है कि ट्रस्ट की वीटो पावर और उसके नियंत्रण की सीमाएं क्या हैं। हाल ही में यह तनाव उस समय चरम पर पहुंच गया जब चैरिटी कमिश्नर की ओर से ट्रस्ट के आंतरिक संचालन और निर्णय लेने की स्वायत्तता पर अचानक कई तरह के प्रशासनिक प्रतिबंध और नई शर्तें थोप दी गईं। ट्रस्ट प्रबंधन का मानना है कि इस तरह की विनियामक शर्तें उनकी एक सदी पुरानी निर्णय प्रणाली और प्रशासनिक ढांचे पर सीधा प्रहार हैं।

आंतरिक सर्वसम्मति की अनदेखी और वार्ता की विफलता

ट्रस्ट के संवैधानिक नियमों के तहत यह अनिवार्य किया गया है कि किसी भी महत्वपूर्ण एजेंडे पर फैसला करते समय ट्रस्टियों के बीच आपसी सहमति बने या विशेष वीटो नियमों का पूरी तरह अनुपालन हो। आरोप यह लगाया गया है कि हालिया प्रशासनिक प्रक्रियाओं में इन स्थापित नियमों की उपेक्षा की गई। कानूनी जानकारों के मुताबिक, जब तक सबसे बड़े इक्विटी धारक के बुनियादी विशेषाधिकार सुरक्षित नहीं रहेंगे, तब तक कॉर्पोरेट गवर्नेंस का संतुलन बनाए रखना संभव नहीं होगा। मामले के न्यायालय तक खिंचने की दो बड़ी वजहें स्पष्ट रूप से सामने आई हैं। पहली वजह यह रही कि दोनों पक्षों के शीर्ष स्तर पर आंतरिक बातचीत, समन्वय और सुलह-सफाई के सारे प्रयास नाकाम साबित हुए। जब संवाद का रास्ता पूरी तरह बंद हो गया, तब अधिकारों की बहाली के लिए केवल विधिक रास्ता ही शेष बचा। दूसरी बड़ी वजह चैरिटी कमिश्नर द्वारा थोपे गए वे कड़े निर्देश बने, जिन्हें ट्रस्ट कानूनी रूप से अनुचित मानते हुए चुनौती देने को बाध्य हुआ।

चैरिटी कमिश्नर के आदेशों पर सवाल और 100 साल पुराना संबंध

विनियामक संस्था द्वारा ट्रस्ट के अंदरूनी अधिकार क्षेत्र पर लगाए गए प्रतिबंधों को अभिषेक मनु सिंघवी ने पूरी तरह अनुचित करार दिया है। उन्होंने रेखांकित किया कि दोनों निकायों के बीच एक सदी से भी ज्यादा पुराना संवैधानिक और ऐतिहासिक रिश्ता रहा है। इतने दशकों के सुदृढ़ रिश्ते को प्रशासनिक निर्देशों के जरिए अचानक अलग-थलग कर देना किसी भी दृष्टि से तर्कसंगत नहीं ठहराया जा सकता। ट्रस्ट के पुराने नियमों, जिनमें सर्वसम्मति और वीटो पावर शामिल हैं, उन्हें दरकिनार करने की किसी भी कोशिश को कानूनी रूप से सही नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट की पुरानी नज़ीर और भावी कानूनी दिशा

अभिषेक मनु सिंघवी ने पूर्व में हुए चर्चित टाटा बनाम मिस्त्री मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले की भी याद दिलाई, जिसमें उन्होंने स्वयं पैरवी की थी। उनका तर्क है कि शीर्ष अदालत ने अपने उस निर्णय में टाटा संस के साथ संबंधों में टाटा ट्रस्ट्स की सर्वोच्चता और उसकी प्रधानता को पूरी स्पष्टता से स्वीकार किया था। उनका आरोप है कि आज उन कानूनी नज़ीरों को चुनिंदा तरीके से भुलाने का प्रयास किया जा रहा है। सिंघवी का कहना है कि जब आपसी सामंजस्य के सारे विकल्प खत्म हो जाते हैं, तो फिर संविधान और न्यायालय ही अंतिम मार्ग बचते हैं। अब यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि नियंत्रण, शेयरधारक अधिकारों और विनियामक दखल के खिलाफ यह लड़ाई देश की सर्वोच्च अदालत तक लड़ी जाएगी।

सवाल-जवाब

टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच मुख्य विवाद क्या है?
यह विवाद मुख्य रूप से टाटा संस में टाटा ट्रस्ट्स की 66 प्रतिशत हिस्सेदारी, उसके वीटो अधिकारों, प्रशासनिक नियंत्रण और चैरिटी कमिश्नर द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों से जुड़ा है।
इस मामले में कौन से प्रमुख वकील अदालत में पेश हो रहे हैं?
टाटा ट्रस्ट्स की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी मुख्य वकील होंगे, जबकि टाटा संस का पक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे रखेंगे।
अभिषेक मनु सिंघवी ने इस विवाद को लेकर क्या चिंता जताई?
सिंघवी ने विवाद के सौहार्दपूर्ण समाधान न होने पर दुख जताया और कहा कि प्रमुख शेयरधारकों के मौलिक अधिकारों को दबाना कॉर्पोरेट जगत के लिए विनाशकारी मिसाल बनेगा।
विवाद सुलझाने के लिए पहले क्या कदम उठाए गए थे?
दोनों पक्षों के बीच आपसी बातचीत और मध्यस्थता के जरिए मामला सुलझाने के प्रयास किए गए थे, लेकिन सहमति न बनने के बाद मामला अदालत तक पहुंचा।
सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट के किस फैसले का हवाला दिया?
सिंघवी ने ऐतिहासिक टाटा बनाम मिस्त्री मामले के फैसले का हवाला दिया, जिसमें शीर्ष अदालत ने टाटा संस के साथ रिश्तों में टाटा ट्रस्ट्स की प्रधानता को मान्यता दी थी।
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