जामिया मिल्लिया इस्लामिया में इस साल से शुरू हो रहे मास्टर ऑफ डेंटल सर्जरी (MDS) के पहले बैच के छात्रों को दाखिले के समय नए और कड़े नियमों के सेट का सामना करना पड़ रहा है। देश के जाने-माने शिक्षण संस्थानों में गिने जाने वाले इस विश्वविद्यालय ने अपने इतिहास में पहली बार डेंटिस्ट्री के इस पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स की शुरुआत की है। हालांकि, परीक्षा पास कर काउंसलिंग के जरिए यहां सीट हासिल करने वाले नव-नियुक्त डॉक्टरों को एडमिशन लेने के लिए कई तरह के शपथ पत्र और कानूनी दस्तावेज सौंपने पड़ रहे हैं। इन नियमों में सबसे ज्यादा चर्चा उस अंडरटेकिंग की हो रही है जिसमें छात्रों से लिखित में यह लिया जा रहा है कि वे कैंपस के अंदर या बाहर किसी भी विरोध प्रदर्शन या हड़ताल में शामिल नहीं होंगे। इस नए नियम के सामने आते ही शैक्षणिक और चिकित्सा जगत में एक बड़ी बहस छिड़ गई है कि क्या भविष्य के इन डॉक्टरों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया जा रहा है।
आंदोलन पर रोक लगाने वाले नियम की कानूनी स्थिति
इस नए नियम के लागू होने के बाद छात्रों के बीच काफी अनिश्चितता का माहौल है। जामिया की मुख्य जनसंपर्क अधिकारी सायमा सईद ने इस बारे में स्पष्टीकरण देते हुए कहा है कि इस अंडरटेकिंग पर तुरंत दस्तखत न करने से किसी भी छात्र का एडमिशन प्रभावित नहीं होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि यूनिवर्सिटी में सीटें Medical Counselling Committee (MCC) द्वारा आयोजित की जाने वाली NEET MDS परीक्षा की मेरिट सूची के अनुसार ही बांटी जाती हैं। ऐसे में अगर कोई छात्र शुरुआत में इस शपथ पत्र पर हस्ताक्षर करने में संकोच करता है, तो भी उसकी आवंटित सीट को रद्द नहीं किया जाएगा। प्रशासन का कहना है कि यह एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है जिसका उद्देश्य परिसर में शिक्षा का अनुकूल और अनुशासित माहौल बनाए रखना है।
यूनिवर्सिटी के अधिकारियों का तर्क है कि डेंटल सर्जरी का यह कोर्स बेहद जटिल है, जिसमें गहन अनुसंधान और व्यावहारिक काम शामिल होता है। इस कोर्स में छात्रों की उपस्थिति यानी अटेंडेंस सबसे महत्वपूर्ण होती है। यदि छात्र विरोध-प्रदर्शनों, हड़तालों या कैंपस आंदोलनों में अपना समय गंवाएंगे, तो उनकी व्यावहारिक शिक्षा और प्रशिक्षण पर इसका बुरा असर पड़ेगा। इसी शैक्षणिक नुकसान को रोकने के लिए विश्वविद्यालय ने इस बार नो-स्ट्राइक का कड़ा नियम अपनी नियमावली में जोड़ा है। इसके तहत छात्रों से शांति व्यवस्था बनाए रखने और शैक्षणिक गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाने में सहयोग करने का वचन लिया जा रहा है।
बीच में कोर्स छोड़ने पर दस लाख का भारी-भरकम जुर्माना
आंदोलन विरोधी बॉन्ड के अलावा, एक और नियम ने नए छात्रों की चिंता को बहुत बढ़ा दिया है। यह नियम है 'डिस्कॉन्टिन्यूएशन बॉन्ड'। इसके तहत यदि कोई छात्र दाखिला लेने के बाद किसी भी वजह से इस MDS कोर्स को बीच में ही छोड़ने का फैसला करता है, तो उसे और उसके परिवार या गारंटर को विश्वविद्यालय को 10 लाख रुपये की बड़ी रकम जुर्माने के तौर पर चुकानी होगी। सिर्फ इतना ही नहीं, अगर इस जुर्माने की राशि का भुगतान करने में देरी होती है, तो उस पर 15 प्रतिशत की वार्षिक दर से तब तक ब्याज वसूला जाएगा जब तक कि पूरी राशि का भुगतान नहीं हो जाता।
इस बेहद सख्त वित्तीय नियम के पीछे यूनिवर्सिटी प्रशासन ने देश के संसाधनों के संरक्षण का तर्क दिया है। प्रशासन का कहना है कि डेंटल सर्जरी जैसे सुपर-स्पेशलिटी कोर्स की प्रत्येक सीट को तैयार करने में सरकार और विश्वविद्यालय की तरफ से भारी सार्वजनिक निवेश किया जाता है। छात्रों के प्रशिक्षण के लिए आधुनिक प्रयोगशालाएं, बेहद महंगे चिकित्सा उपकरण, विशेषज्ञ फैकल्टी और क्लीनिकल रिसोर्स की व्यवस्था की जाती है। यदि कोई छात्र पढ़ाई के बीच में ही सीट छोड़कर चला जाता है, तो वह सीट पूरी तरह खाली रह जाती है। इसका मतलब है कि देश को मिलने वाला एक संभावित स्पेशलिस्ट डेंटिस्ट तैयार नहीं हो पाता और जनता के पैसे का भी नुकसान होता है। प्रशासन चाहता है कि इस बॉन्ड के जरिए छात्रों को अपनी सीट के प्रति जिम्मेदारी का पूरा अहसास हो और वे गंभीरता से अपनी पढ़ाई पूरी करें।
देश के अन्य बड़े संस्थानों में क्या हैं नियम
हालांकि जामिया मिल्लिया इस्लामिया में इस तरह के सख्त नियम पहली बार MDS कोर्स के साथ पेश किए गए हैं, लेकिन देश के अन्य बड़े और प्रतिष्ठित सरकारी चिकित्सा संस्थानों में इस प्रकार के बॉन्ड काफी समय से लागू हैं। उदाहरण के तौर पर, दिल्ली के प्रसिद्ध मौलाना आजाद डेंटल कॉलेज में भी छात्रों से दाखिले के समय 10 लाख रुपये तक का डिस्कॉन्टिन्यूएशन बॉन्ड भरवाया जाता है ताकि छात्र बीच में सीट खाली न छोड़ें। इसी तरह, उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) में छात्रों को 8 लाख रुपये का बॉन्ड देना पड़ता है, जबकि बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) में एडमिशन के समय 5 लाख रुपये तक का डिफेक्शन बॉन्ड जमा करने का नियम पहले से ही चल रहा है।
हड़ताल विरोधी क्लॉज का गहराता विवाद
चिकित्सा शिक्षा के जानकारों के अनुसार, डॉक्टरों के काम का सीधा संबंध इंसानी जान की सुरक्षा से होता है। जब भी अस्पतालों में रेजिडेंट डॉक्टर हड़ताल पर जाते हैं, तो वहां की आपातकालीन सेवाएं बुरी तरह प्रभावित होती हैं और मरीजों की जान पर बन आती है। इसी संकट को ध्यान में रखकर कई बड़े संस्थान अपनी आंतरिक नीतियों में इस तरह के सुरक्षात्मक कदम उठाते हैं। हालांकि, National Dental Commission (NDC) के केंद्रीय नियमों में इस तरह के नो-स्ट्राइक बॉन्ड की कोई अनिवार्य शर्त नहीं है। इसके बावजूद जामिया ने अपनी कार्यकारी परिषद द्वारा इसी साल जून में पारित किए गए नए अध्यादेश (ऑर्डिनेंस) के तहत इस कड़े नियम को अपनी प्रवेश प्रक्रिया में शामिल किया है। अब यह देखना काफी महत्वपूर्ण होगा कि देश के कोने-कोने से आने वाले नव-नियुक्त डेंटल डॉक्टर इन कड़े नियमों के साए में अपनी उच्च शिक्षा के सफर को कैसे आगे बढ़ाते हैं।



















