भारतीय इतिहास को देखने और समझने के पारंपरिक दृष्टिकोण में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाले देश के शीर्ष इतिहासकार प्रोफेसर सुमित सरकार का निधन हो गया है। वे 87 वर्ष के थे और बीते कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उनके निधन की खबर से शैक्षणिक जगत, ऐतिहासिक शोधकर्ताओं और संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) तथा राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (NET) जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे लाखों अभ्यर्थियों में शोक की लहर दौड़ गई है। दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में तीन दशकों तक अपनी सेवाएं देने वाले प्रोफेसर सरकार को एक ऐसे विद्वान के रूप में याद किया जाएगा, जिन्होंने इतिहास की किताबों को राजा-महाराजाओं के दरबारों से निकालकर खेत-खलिहानों और आम जनता के संघर्षों तक पहुँचाया।
इतिहास लेखन का पारंपरिक ढांचा बदलने वाला योगदान
प्रोफेसर सुमित सरकार केवल विश्वविद्यालय के कमरे तक सीमित रहने वाले शिक्षक नहीं थे, बल्कि उन्होंने इतिहास शोध की दिशा ही बदल दी। उनके आने से पहले भारतीय इतिहास का बड़ा हिस्सा केवल ब्रिटिश वायसरायों, शाही राजाओं, औपनिवेशिक नीतियों और प्रमुख युद्धों के इर्द-गिर्द लिखा जाता था। प्रोफेसर सरकार ने शोध के जरिए यह स्थापित किया कि देश का वास्तविक इतिहास आम नागरिकों, किसानों, कारखानों के मजदूरों, महिलाओं और स्थानीय जनआंदोलनों के योगदान के बिना अधूरा है। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में देश के दूर-दराज ग्रामीण क्षेत्रों के आम लोगों के पसीने और बलिदान को केंद्रीय स्थान दिलाया। उनके इस सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण ने भारतीय इतिहास लेखन को नया आयाम प्रदान किया।
प्रेसिडेंसी कॉलेज से शुरू होकर अंतरराष्ट्रीय ख्याति तक पहुँचा शैक्षणिक सफर
प्रोफेसर सुमित सरकार का जन्म इतिहासकारों से समृद्ध पारिवारिक पृष्ठभूमि में हुआ था। उनकी प्रारंभिक और उच्च शिक्षा कोलकाता में हुई, जहाँ उन्होंने प्रतिष्ठित प्रेसिडेंसी कॉलेज से इतिहास विषय में बीए (ऑनर्स) की उपाधि प्राप्त की। इसके पश्चात उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर (मास्टर्स) और पीएचडी की डिग्री हासिल की। अध्यापन के क्षेत्र में उन्होंने अपने करियर की शुरुआत वर्धवान विश्वविद्यालय (Burdwan University) और कोलकाता विश्वविद्यालय में व्याख्याता के पद से की। अपनी बौद्धिक क्षमता और मौलिक शोध के कारण वे जल्द ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचाने जाने लगे। वे ब्रिटेन की प्रसिद्ध ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के वोल्फसन कॉलेज में फेलो रहे और दुनिया भर के कई प्रमुख विश्वविद्यालयों में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में आमंत्रित किए गए।
दिल्ली विश्वविद्यालय में 30 वर्षों का यादगार अध्यापन
वर्ष 1974 में प्रोफेसर सुमित सरकार दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग से जुड़े और वर्ष 2004 तक लगातार तीन दशकों तक अपनी सेवाएँ देते रहे। दिल्ली विश्वविद्यालय में उनका कार्यकाल बेहद यादगार माना जाता है। उनके पूर्व छात्रों के अनुसार, जब प्रोफेसर सरकार का लेक्चर होता था, तब पूरा हॉल छात्रों से खचाखच भरा रहता था। गूढ़ से गूढ़ ऐतिहासिक सिद्धांतों और जटिल सामाजिक प्रक्रियाओं को वे इतने सरल, सुव्यवस्थित और रोचक ढंग से प्रस्तुत करते थे कि छात्र पूरी तरह एकाग्र होकर उन्हें सुनते थे। उनके पढ़ाने की शैली में एक सहजता थी, जो छात्रों को ऐतिहासिक घटनाओं के सामाजिक कारणों को समझने के लिए प्रेरित करती थी।
UPSC और प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थियों के लिए मार्गदर्शक पुस्तकें
उच्च शिक्षा और सिविल सर्विसेज की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के बीच प्रोफेसर सुमित सरकार की पुस्तकें अत्यंत लोकप्रिय और प्रामाणिक मानी जाती हैं। उनकी कालजयी रचना ‘Modern India: 1885-1947’ को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का सबसे भरोसेमंद और व्यापक ग्रंथ माना जाता है। सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करने वाला लगभग हर छात्र अपनी अध्ययन सामग्री में इस पुस्तक को प्रमुखता से शामिल करता है। इसके अतिरिक्त, उनकी अन्य प्रमुख कृतियों में 'The Swadeshi Movement in Bengal (1903-1908)' शामिल है, जिसने बंगाल के स्वदेशी आंदोलन के सामाजिक आधार का गहराई से विश्लेषण किया। उन्होंने अपनी पत्नी तनिका सरकार के साथ मिलकर 'Women and Social Reform in Modern India' नामक पुस्तक की भी रचना की, जिसने आधुनिक भारत में महिला अधिकारों और सामाजिक सुधारों के मुद्दों को रेखांकित किया।
शोध की नई पीढ़ियों के लिए अमर रहेगा उनका योगदान
प्रोफेसर सुमित सरकार अपने जीवन के अंतिम दिनों तक युवा शोधकर्ताओं, अध्यापकों और छात्रों के साथ संवाद में बने रहे। वे नए विचारों का स्वागत करते थे और हमेशा युवा विद्वानों को जमीनी हकीकत पर आधारित शोध के लिए प्रोत्साहित करते थे। उनके जाने से भारतीय आधुनिक इतिहास लेखन का एक बेहद समृद्ध और स्वर्णिम अध्याय समाप्त हो गया है। यद्यपि वे अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके ऐतिहासिक सिद्धांत, उनकी कालजयी पुस्तकें और आम जनता के नजरिए से इतिहास को समझने की उनकी दृष्टि आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहेगी।



















