झुंझुनूं जिले के सूरजगढ़ में समय पर चिकित्सा सहायता के अभाव में होने वाली मौतों को रोकने के लिए एक बड़ी मानवीय पहल शुरू की गई है। सड़क दुर्घटनाओं के दौरान कई बार घायलों को तुरंत मदद नहीं मिल पाती, जिससे उनकी स्थिति और गंभीर हो जाती है। इसी दर्दनाक अनुभव से प्रेरित होकर झुंझुनूं के एक व्यक्ति ने सड़क पर तड़पते पीड़ितों की सहायता करने का आजीवन संकल्प लिया। आज उनका यह व्यक्तिगत निर्णय सैकड़ों परिवारों के जीवन की रक्षा का मुख्य आधार बन चुका है।
जीवन ज्योति रक्षा समिति का गठन और कार्य
सूरजगढ़ में सक्रिय जीवन ज्योति रक्षा समिति पिछले 17 वर्षों से सड़क हादसों में घायल होने वाले लोगों को समय पर नजदीकी अस्पताल पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य कर रही है। समिति के आंकड़ों के अनुसार, इस लंबी अवधि में करीब 8 हजार 942 सड़क दुर्घटनाओं के दौरान लगभग 17 हजार 540 घायलों को सुरक्षित चिकित्सा केंद्रों तक पहुंचाया गया है। इनमें से 16 हजार से अधिक लोगों की अमूल्य जान बचाने में सफलता मिली है। वर्तमान में इस समिति के साथ तीन दर्जन से ज्यादा समर्पित लोग जुड़े हुए हैं, जो किसी भी प्रकार के शुल्क के बिना पूरी निष्ठा से घायलों की मदद करने में जुटे रहते हैं।
दो एंबुलेंस का संचालन और वित्तीय व्यवस्था
इस समिति का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी घायल व्यक्ति की मौत केवल इलाज न मिलने की वजह से न हो। इसी लक्ष्य को पूरा करने के लिए समिति के सदस्य चौबीसों घंटे जरूरतमंदों की सहायता के लिए मुस्तैद रहते हैं। घायलों को अस्पताल ले जाने के लिए संगठन के पास दो एंबुलेंस उपलब्ध हैं, जिनका संचालन भी समिति के सदस्य स्वयं ही करते हैं। इस पूरी आपातकालीन सेवा के बदले पीड़ितों या उनके परिजनों से एक भी रुपया नहीं लिया जाता है। एंबुलेंस के रखरखाव, ईंधन और अन्य आवश्यक खर्चों को पूरा करने के लिए समिति के सभी सदस्य हर महीने 200-200 रुपए का सदस्यता शुल्क जमा करते हैं। इसके अतिरिक्त, आवश्यकता पड़ने पर स्थानीय भामाशाहों का आर्थिक सहयोग भी प्राप्त किया जाता है। पहले यह समिति केवल सूरजगढ़ क्षेत्र तक ही सीमित थी, लेकिन अब सूरजगढ़ से अन्य बड़े अस्पतालों में रेफर किए जाने वाले मरीजों को झुंझुनूं तक निःशुल्क पहुंचाने की जिम्मेदारी भी पूरी निष्ठा से निभाई जा रही है।
गंभीर चोटों के कारण जान न बचा पाने का मलाल
जीवन ज्योति रक्षा समिति के डायरेक्टर अशोक जांगिड़ बताते हैं कि बीते 11 वर्षों के दौरान उन्होंने हजारों सड़क दुर्घटना पीड़ितों को अस्पताल पहुंचाया है, जहां समय पर इलाज मिलने से कई लोगों की जिंदगी बचाई जा सकी। हालांकि, इस पूरे सफर के दौरान लगभग 416 ऐसे लोग भी रहे जिन्हें तमाम कोशिशों के बावजूद बचाया नहीं जा सका, जिसका गहरा दुख आज भी उन्हें और समिति के सदस्यों को है। अशोक का कहना है कि हर एक घायल की जान बचाने के लिए पूरी ताकत लगा दी जाती है, लेकिन कई बार दुर्घटना में चोटें इतनी ज्यादा गंभीर होती हैं कि लाख प्रयासों के बावजूद मरीज को नहीं बचाया जा पाता। इन दुखद पलों के बावजूद समिति के सदस्यों ने कभी हार नहीं मानी है और उनका प्रयास लगातार यही रहता है कि सड़क पर पड़े किसी भी जरूरतमंद को समय रहते चिकित्सीय सहायता मिल सके।
चाचा की दुखद मौत से मिली इस सेवा की प्रेरणा
अशोक जांगिड़ के इस प्रेरणादायक सेवा कार्य के पीछे करीब 17 साल पुरानी एक बेहद दर्दनाक घटना जुड़ी हुई है। उस समय उनके चाचा ओमप्रकाश जांगिड़ लोहारू के पास एक सड़क हादसे का शिकार हो गए थे। अशोक बताते हैं कि उनके चाचा लगभग डेढ़ घंटे तक सड़क पर पड़े तड़पते रहे, लेकिन उस दौरान उन्हें अस्पताल पहुंचाने के लिए कोई भी आगे नहीं आया और अंततः उनकी मृत्यु हो गई। इस हृदय विदारक घटना ने अशोक को भीतर तक हिलाकर रख दिया। अपने चाचा को खोने के इस गहरे दर्द ने उनके जीवन की दिशा बदल दी और उन्होंने दूसरों की जिंदगी बचाने का बीड़ा उठाया। उन्होंने उसी दिन यह कड़ा संकल्प लिया कि वे पूरी कोशिश करेंगे कि किसी अन्य परिवार को इस तरह अपनों को न खोना पड़े। शुरुआत में अशोक ने अपनी निजी गाड़ी से ही सड़क दुर्घटनाओं में घायल लोगों को अस्पताल ले जाना शुरू किया। धीरे-धीरे जब लोगों ने उनके इस समर्पण को देखा, तो क्षेत्र के अन्य लोग भी इस नेक काम में हाथ बंटाने के लिए आगे आने लगे। किसी ने अपना समय दिया, किसी ने आर्थिक मदद पहुंचाई तो किसी ने अन्य संसाधन उपलब्ध कराए। इस तरह एक व्यक्ति का छोटा सा प्रयास धीरे-धीरे एक बड़े सामूहिक अभियान में बदल गया और जीवन ज्योति रक्षा समिति की नींव रखी गई।
भामाशाहों के सहयोग से मजबूत हुआ एंबुलेंस का दायरा
इस संस्था के सेवा कार्यों को निरंतर आगे बढ़ाने में स्थानीय भामाशाहों का भी बहुत बड़ा योगदान रहा है। समिति को सबसे पहली एंबुलेंस भामाशाह दरिया सिंह तेतरवाल ने प्रदान की थी। लगभग छह वर्षों तक निरंतर संचालन के बाद जब वह एंबुलेंस पुरानी और खराब हो गई, तब उन्होंने समिति को दूसरी गाड़ी भी उपलब्ध करवाई। इसके बाद संगठन ने अन्य भामाशाहों से सहायता जुटाकर एक बोलेरो गाड़ी खरीदी और उसे पूरी तरह से एंबुलेंस के रूप में तैयार करवाया। इन वाहनों के मिलने से सड़क हादसों के पीड़ितों को तुरंत अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था और अधिक मजबूत हो गई।
मानवता और निस्वार्थ सेवा की मिसाल
आज जीवन ज्योति रक्षा समिति के सभी सदस्य किसी भी तरह के आर्थिक लाभ या अपनी पहचान बनाने के लिए यह कार्य नहीं कर रहे हैं, बल्कि पूरी तरह से इंसानियत के नाते इस सेवा में जुटे हुए हैं। उनके लिए सड़क पर घायल अवस्था में पड़ा हर अजनबी व्यक्ति किसी अपने की तरह है, जिसे उस समय मदद की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। अशोक जांगिड़ का संकल्प आज भी उतना ही मजबूत है जितना कि अपने चाचा को खोने के बाद के शुरुआती दिनों में था। सूरजगढ़ में जीवन ज्योति रक्षा समिति इसी मूल सोच के साथ हर जरूरतमंद की सहायता के लिए हमेशा तैयार खड़ी रहती है।


















