नागौर क्षेत्र में पशुपालन को व्यावसायिक रूप से लाभदायक बनाने के लिए चारे-दाने, पशु स्वास्थ्य और उनके दैनिक रखरखाव पर होने वाले खर्च को नियंत्रित करना बेहद आवश्यक है। पशुपालकों के कुल बजट में लगभग 70 प्रतिशत खर्च केवल चारे और आहार प्रबंधन पर होता है। यदि इस बुनियादी खर्च में थोड़ी सी समझदारी और सही तरीकों का इस्तेमाल किया जाए, तो डेयरी व्यवसाय से होने वाली शुद्ध कमाई को काफी हद तक बढ़ाया जा सकता है। बाजार से महंगे पैकेट वाले पशु आहार खरीदने के बजाय किसान अपने घर पर ही पौष्टिक और संतुलित दाना तैयार कर सकते हैं, जिससे लागत में भारी कटौती संभव है।
घर पर संतुलित पशु आहार तैयार करने की विधि
पशुओं को दैनिक आधार पर दिए जाने वाले आहार में आवश्यक पोषक तत्वों का सही संतुलन होना बेहद जरूरी है। इसके लिए मक्का, ज्वार और बाजरा जैसे मुख्य खाद्यान्नों को सरसों की खली, मूंगफली की खली और बिनौले की खली के साथ मिलाया जा सकता है। इसके साथ ही इसमें गेहूं का चोकर और चने का चोकर मिलाकर एक आदर्श दाना मिश्रण तैयार किया जा सकता है। हालांकि, यह ध्यान रखना अति आवश्यक है कि आहार में इन सभी सामग्रियों का अनुपात पशु की उम्र, उसके शरीर के वजन और उसके दैनिक दूध उत्पादन की मात्रा के हिसाब से ही तय किया जाना चाहिए। सही पोषण से पशु का स्वास्थ्य ठीक रहता है और उसकी दुग्ध क्षमता पूरी बनी रहती है।
हरा चारा उत्पादन और साइलेज निर्माण तकनीक
पशु चिकित्सक विशाल प्रजापति के अनुसार, पशुओं के भोजन में पर्याप्त मात्रा में हरे चारे को शामिल करने से दाने पर होने वाला खर्च काफी हद तक घट जाता है। किसान अपने खेतों में नेपियर घास, बरसीम, ज्वार और मक्का जैसी पौष्टिक चारा फसलों की खेती कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, पशुओं के नियमित आहार में पूरक के रूप में अजोला का उपयोग करना भी एक बेहतरीन विकल्प है, जो प्रोटीन का अच्छा स्रोत प्रदान करता है। जब खेतों में भरपूर मात्रा में हरा चारा उपलब्ध हो, तब अतिरिक्त चारे को संरक्षित करने के लिए साइलेज बना लेना चाहिए। यह साइलेज गर्मी के दिनों में अथवा चारे की किल्लत के समय पशुओं को पौष्टिक खुराक उपलब्ध कराने में मदद करता है। इसके साथ ही, सूखे भूसे की पौष्टिकता बढ़ाने के लिए विशेषज्ञों की देखरेख में उसका उचित उपचार भी किया जा सकता है। ध्यान रहे कि यूरिया उपचार की सटीक मात्रा और विधि का पालन केवल पशुपालन विशेषज्ञ की परामर्श के बाद ही किया जाना चाहिए। उपचारित भूसे को सही तरीके से सुरक्षित रखने और पशुओं को खिलाने से पहले उसकी उचित तैयारी करना बेहद जरूरी होता है।
पेयजल, खनिज लवण और प्रजनन प्रबंधन
दूध उत्पादन के स्तर को लगातार बनाए रखने के लिए पशुओं को हर समय साफ और ताजा पानी उपलब्ध कराया जाना चाहिए। पशु के विश्राम स्थल के पास पानी की उपलब्धता हमेशा होनी चाहिए ताकि वह अपनी आवश्यकतानुसार जब चाहे पानी पी सके। शरीर में जल की कमी होने पर पशुओं के दूध देने की क्षमता पर तुरंत विपरीत असर पड़ता है। इसके अलावा, पशुओं के शरीर में जरूरी खनिजों की पूर्ति के लिए दैनिक आहार में मिनरल मिक्सचर अवश्य मिलाना चाहिए। इससे पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है। साथ ही, पशुपालकों को अपने पशुओं के हीट में आने के लक्षणों पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए, ताकि सही समय पर कृत्रिम गर्भाधान कराया जा सके और प्रजनन प्रक्रिया का बेहतर प्रबंधन किया जा सके।
बीमारियों से बचाव, टीकाकरण और थनैला रोग रोकथाम
पशु चिकित्सक विशाल प्रजापति ने इस बात पर विशेष बल दिया है कि पशुओं को विभिन्न संक्रामक बीमारियों से बचाना भी डेयरी फार्मिंग की लागत कम करने का एक अत्यंत महत्वपूर्ण तरीका है। पशुपालकों को विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार समय-समय पर नियमित टीकाकरण करवाना चाहिए। कई प्रकार की गंभीर बीमारियों से बचाव के टीके सरकारी पशु चिकित्सालयों में आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। इसके साथ ही पशु की उम्र, वजन और उसके समग्र स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखते हुए डॉक्टर की सलाह से समय पर कृमिनाशक दवाएं दी जानी चाहिए।
दुधारू पशुओं में सबसे आम और नुकसानदेह थनैला रोग से बचाव के लिए स्वच्छता पर विशेष ध्यान देना चाहिए। दूध दुहने की प्रक्रिया शुरू करने से पहले हाथों और पशु के थनों की अच्छी तरह सफाई की जानी चाहिए। दूध निकालने के तुरंत बाद थनों को पशुओं के लिए उपयुक्त आयोडीन अथवा अन्य अनुमोदित कीटाणुनाशक घोल में डुबोने की तकनीक अपनानी चाहिए। पशुओं के बैठने और बांधने की जगह को हमेशा साफ और सूखा रखना जरूरी है। इसके अलावा, दूध निकालने के तुरंत बाद पशुओं को कुछ देर तक खड़े रखने के लिए उनके सामने थोड़ा चारा डाल देना चाहिए, ताकि जमीन पर पड़ी गंदगी या बैक्टीरिया थन के छिद्रों के माध्यम से शरीर में प्रवेश न कर सकें।



















