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बिलासपुर में कॉटन कैंडी बेचकर नंद कुमार ने संवारी जिंदगी, बनाई अपनी जमीन और आशियानाछत्तीसगढ़
5 अक्तू॰ 2026, 11:35 am (52 मिनट पहले)· 0

बिलासपुर में कॉटन कैंडी बेचकर नंद कुमार ने संवारी जिंदगी, बनाई अपनी जमीन और आशियाना

बिलासपुर के कंपनी गार्डन में साइकिल पर कॉटन कैंडी बेचने वाले नंद कुमार निर्मलकर ने बचपन की मेहनत के दम पर न केवल अपना घर बनाया, बल्कि जमीन खरीदकर खेती भी शुरू की।

बिलासपुर शहर के कंपनी गार्डन इलाके में शाम ढलते ही साइकिल पर सजे रंग-बिरंगे डिब्बे राहगीरों और बच्चों को बरबस अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं। इस साइकिल के साथ खड़े नंद कुमार निर्मलकर शक्कर, विभिन्न फ्लेवर और रंगों से तैयार होने वाली पारंपरिक बंबई मिठाई यानी कॉटन कैंडी बेचते हैं। बोलचाल की भाषा में लोग इसे हवाई मिठाई या गुलाब लच्छी भी कहते हैं। नंद कुमार के लिए यह काम सिर्फ रोजमर्रा की बिक्री नहीं है, बल्कि इसी हुनर और लगन ने उनके पूरे परिवार का जीवन संवारा है और उन्हें रोजी-रोटी का मजबूत सहारा दिया है।

बचपन के संघर्ष से खड़ा किया परिवार का सहारा

नंद कुमार ने बताया कि जब उनकी उम्र केवल 10 से 11 साल थी, तभी उन्होंने इस काम को अपना लिया था। बचपन के शुरुआती दिनों से ही उन्होंने साइकिल पर घूमकर मिठाई बेचने का यह छोटा व्यवसाय शुरू किया था। लगातार की गई मेहनत की बदौलत उन्होंने अपने पूरे परिवार का भरण-पोषण किया। इसी व्यवसाय से होने वाली बचत के जरिए उन्होंने अपना पक्का मकान बनवाया, खुद की जमीन खरीदी और आगे चलकर खेती-किसानी भी शुरू की। आज भी वह हर दिन अपनी पुरानी दिनचर्या के तहत शाम होते ही साइकिल लेकर कंपनी गार्डन के नजदीक पहुंचते हैं और ग्राहकों को ताजी मिठाई उपलब्ध कराते हैं।

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चिमनी वाली मशीन और तैयार करने की प्रक्रिया

इस मिठाई को बनाने की विधि के बारे में नंद कुमार बताते हैं कि इसमें मुख्य रूप से सफेद शक्कर, अलग-अलग प्रकार के फ्लेवर और खाद्य रंगों का प्रयोग किया जाता है। इन सामग्रियों को सही अनुपात में मिलाकर खास बनावट दी जाती है। मिठाई तैयार करने के लिए वह चिमनी वाली पारंपरिक मशीन का इस्तेमाल करते हैं। उनका कहना है कि हालांकि आधुनिक दौर में बिजली से चलने वाली इलेक्ट्रिक मशीनें भी बाजार में उपलब्ध हैं, लेकिन चिमनी वाली मशीन से काम करना उनके अनुभव के अनुसार कहीं अधिक सुविधाजनक और भरोसेमंद साबित होता है।

लागत, समय और दैनिक कमाई का गणित

व्यापार के वित्तीय पहलू पर बात करते हुए नंद कुमार ने जानकारी दी कि लगभग एक किलो शक्कर से बंबई मिठाई तैयार करने में करीब एक से सवा घंटे का वक्त लगता है। इस एक किलो शक्कर से लगभग 650 से 700 रुपये मूल्य की मिठाई बनकर तैयार हो जाती है। बिक्री के लिए वह रोजाना 10 रुपये की कीमत वाले करीब 100 से 120 पीस लेकर बाजार में आते हैं। इसके अलावा 20 रुपये मूल्य वाले बड़े पैकेट भी पर्याप्त संख्या में तैयार रखे जाते हैं। नियमित ग्राहकी के चलते रोजाना लगभग 1000 रुपये तक की कुल बिक्री आसानी से हो जाती है।

कम पूंजी में स्वरोजगार और बच्चों में आत्मनिर्भरता

नंद कुमार का मानना है कि इस प्रकार का काम शुरू करने के लिए किसी भारी-भरकम पूंजी या बड़े निवेश की कतई आवश्यकता नहीं होती है। सीमित संसाधनों वाला कोई भी व्यक्ति बेहद कम लागत में इसे शुरू करके अपने परिवार के लिए आत्मनिर्भर रोजगार तैयार कर सकता है। इसके साथ ही उन्होंने अपने बच्चों को भी इस काम के हुनर से जोड़ा है। स्कूल की कक्षाएं पूरी होने के बाद उनके दो बच्चे खाली समय में करीब एक से दो घंटे दुकानदारी और बिक्री में अपने पिता का हाथ बंटाते हैं।

उनका बड़ा बेटा वर्तमान में 12वीं कक्षा में अध्ययनरत है, जबकि बाकी बच्चे भी नियमित रूप से स्कूल जा रहे हैं। नंद कुमार का कहना है कि बच्चे पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ व्यवहारिक काम सीख रहे हैं और अपना जेब खर्च भी खुद निकाल लेते हैं। वह चाहते हैं कि उनकी आने वाली पीढ़ी औपचारिक शिक्षा हासिल करने के साथ ही परिश्रम, आत्मनिर्भरता और स्वरोजगार के असली महत्व को भी भली-भांति समझे।

सवाल-जवाब

नंद कुमार बिलासपुर में किस स्थान पर कॉटन कैंडी बेचते हैं?
वह बिलासपुर शहर के कंपनी गार्डन के नजदीक शाम के समय अपनी साइकिल लगाकर कॉटन कैंडी बेचते हैं।
उन्होंने यह काम किस उम्र में शुरू किया था?
नंद कुमार ने महज 10 से 11 साल की छोटी उम्र से ही इस काम की शुरुआत कर दी थी।
एक किलो शक्कर से कितने रुपये की बंबई मिठाई तैयार होती है?
एक किलो शक्कर से करीब एक से सवा घंटे में लगभग 650 से 700 रुपये की मिठाई तैयार हो जाती है।
वह रोजाना किस मूल्य वर्ग के पैकेट बेचते हैं और दैनिक कारोबार कितना है?
वह 10 रुपये वाले 100 से 120 पीस और 20 रुपये वाले पैकेट बेचते हैं, जिससे रोजाना करीब 1000 रुपये तक की बिक्री होती है।
मिठाई बनाने के लिए वह किस तरह की मशीन का उपयोग करते हैं?
वह चिमनी वाली पारंपरिक मशीन का उपयोग करते हैं क्योंकि यह उनके काम के लिए अधिक सुविधाजनक रहती है।
इस व्यवसाय की कमाई से उन्होंने क्या-क्या हासिल किया?
इसी काम की कमाई से उन्होंने अपना मकान बनाया, जमीन खरीदी और खेती भी शुरू की।
उनके बच्चे पढ़ाई के साथ इस काम में कैसे सहयोग करते हैं?
उनके बच्चे स्कूल के बाद शाम को एक-दो घंटे मिठाई बेचने में मदद करते हैं, जिससे वे काम सीखने के साथ जेब खर्च भी जुटा लेते हैं।
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टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 मिनट पहले

दस साल की उम्र से काम संभालना वाकई बड़ी बात है, आज के बच्चे तो सोच भी नहीं सकते।

Rohan Verma@rohan-verma·1 मिनट पहले

अरे करण भाई, बिल्कुल सही कहा आपने। पर क्या उनके बच्चे भी आगे चलकर यही काम संभाल रहे हैं या उन्होंने कुछ और किया?

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