छत्तीसगढ़ के बस्तर में दशकों से विवादित बोधघाट हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट को फिर से जिंदा करने की कोशिश ने आदिवासी समुदायों को एक बार फिर सड़कों पर ला दिया है. प्रभावित गांवों के लोगों ने साफ कर दिया है कि अपनी जमीन, जंगल और घरों के बदले वे कोई भी कीमत चुकाने को तैयार नहीं हैं.
नारों में छुपी तीखी चेतावनी
विरोध प्रदर्शन के दौरान ग्रामीणों ने ऐसे नारे लगाए जो सरकार के लिए सीधी चुनौती बन गए. 'पहले हमें गोली मारो, फिर बांध बनाओ' यह नारा बस्तर के आदिवासियों के अटल इरादे को बयां करता है. प्रदर्शनकारियों ने कहा कि उनकी जमीन, उनके जंगल और उनके घरों को उजाड़कर किसी भी कीमत पर यह बांध नहीं बनाया जा सकता.
हजारों परिवारों पर विस्थापन का खतरा
बोधघाट परियोजना का प्रस्ताव कई साल पहले सामने आया था, लेकिन तब भी विरोध की वजह से यह आगे नहीं बढ़ सका था. अब इसे दोबारा शुरू करने की तैयारी हो रही है. परियोजना के दायरे में आने से बड़ी संख्या में गांव डूब क्षेत्र में आ सकते हैं. स्थानीय लोगों की चिंता है कि अगर यह बांध बनता है तो हजारों परिवारों को अपना घर-बार छोड़ना पड़ेगा. खेती की जमीन, जंगल और पारंपरिक आजीविका पर भी सीधा असर पड़ेगा.
जंगल और जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं, पहचान है
आदिवासी समुदाय का कहना है कि जंगल और जमीन उनके लिए केवल आर्थिक साधन नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति और पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि परियोजना को लेकर उनसे कोई उचित बातचीत नहीं की गई और उनकी सहमति के बिना काम आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है. उनका कहना है कि विकास के नाम पर उनके अधिकारों और जीवन को नजरअंदाज करना किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं है.
ग्राम सभाओं की राय सबसे पहले
प्रदर्शन में शामिल लोगों ने सरकार के सामने दो स्पष्ट मांगें रखी हैं. पहली, परियोजना से होने वाले सभी प्रभावों की पूरी जानकारी आम लोगों के सामने रखी जाए. दूसरी, ग्राम सभाओं की राय को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए. आदिवासी संगठनों ने कहा है कि लोगों की सहमति के बिना विकास के नाम पर उनके जीवन से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं होगा.
सरकार का पक्ष और आदिवासियों का जवाब
सरकार का तर्क है कि बोधघाट परियोजना से बस्तर में बिजली उत्पादन बढ़ेगा और पूरे क्षेत्र के विकास को गति मिलेगी. लेकिन स्थानीय आदिवासी इस तर्क को मानने से इनकार करते हैं. उनका सवाल है कि जब जिन लोगों की जमीन पर परियोजना बन रही है, उनसे ही नहीं पूछा गया, तो यह विकास किसके लिए है. आदिवासी संगठन और ग्रामीण लगातार विरोध प्रदर्शन जारी रखे हुए हैं और उन्होंने एलान किया है कि अपनी जमीन और जंगल बचाने के लिए वे हर स्तर पर संघर्ष करते रहेंगे.













