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बोधघाट बांध को लेकर बस्तर में आदिवासियों का आक्रोश, कहा: पहले गोली मारो, फिर बांध बनाओछत्तीसगढ़
2 घंटे पहले· 3

बोधघाट बांध को लेकर बस्तर में आदिवासियों का आक्रोश, कहा: पहले गोली मारो, फिर बांध बनाओ

छत्तीसगढ़ के बस्तर में बोधघाट हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट को फिर से शुरू करने की तैयारी के बीच आदिवासी समुदायों ने कड़ा विरोध किया है. ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि उनकी जमीन और जंगल छीनकर किसी भी कीमत पर बांध नहीं बनने दिया जाएगा.

Karan MalhotraKaran MalhotraCrime Correspondent 2 मिनट पढ़ें AI के लिए
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छत्तीसगढ़ के बस्तर में दशकों से विवादित बोधघाट हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट को फिर से जिंदा करने की कोशिश ने आदिवासी समुदायों को एक बार फिर सड़कों पर ला दिया है. प्रभावित गांवों के लोगों ने साफ कर दिया है कि अपनी जमीन, जंगल और घरों के बदले वे कोई भी कीमत चुकाने को तैयार नहीं हैं.

नारों में छुपी तीखी चेतावनी

विरोध प्रदर्शन के दौरान ग्रामीणों ने ऐसे नारे लगाए जो सरकार के लिए सीधी चुनौती बन गए. 'पहले हमें गोली मारो, फिर बांध बनाओ' यह नारा बस्तर के आदिवासियों के अटल इरादे को बयां करता है. प्रदर्शनकारियों ने कहा कि उनकी जमीन, उनके जंगल और उनके घरों को उजाड़कर किसी भी कीमत पर यह बांध नहीं बनाया जा सकता.

हजारों परिवारों पर विस्थापन का खतरा

बोधघाट परियोजना का प्रस्ताव कई साल पहले सामने आया था, लेकिन तब भी विरोध की वजह से यह आगे नहीं बढ़ सका था. अब इसे दोबारा शुरू करने की तैयारी हो रही है. परियोजना के दायरे में आने से बड़ी संख्या में गांव डूब क्षेत्र में आ सकते हैं. स्थानीय लोगों की चिंता है कि अगर यह बांध बनता है तो हजारों परिवारों को अपना घर-बार छोड़ना पड़ेगा. खेती की जमीन, जंगल और पारंपरिक आजीविका पर भी सीधा असर पड़ेगा.

जंगल और जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं, पहचान है

आदिवासी समुदाय का कहना है कि जंगल और जमीन उनके लिए केवल आर्थिक साधन नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति और पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि परियोजना को लेकर उनसे कोई उचित बातचीत नहीं की गई और उनकी सहमति के बिना काम आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है. उनका कहना है कि विकास के नाम पर उनके अधिकारों और जीवन को नजरअंदाज करना किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं है.

ग्राम सभाओं की राय सबसे पहले

प्रदर्शन में शामिल लोगों ने सरकार के सामने दो स्पष्ट मांगें रखी हैं. पहली, परियोजना से होने वाले सभी प्रभावों की पूरी जानकारी आम लोगों के सामने रखी जाए. दूसरी, ग्राम सभाओं की राय को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए. आदिवासी संगठनों ने कहा है कि लोगों की सहमति के बिना विकास के नाम पर उनके जीवन से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं होगा.

सरकार का पक्ष और आदिवासियों का जवाब

सरकार का तर्क है कि बोधघाट परियोजना से बस्तर में बिजली उत्पादन बढ़ेगा और पूरे क्षेत्र के विकास को गति मिलेगी. लेकिन स्थानीय आदिवासी इस तर्क को मानने से इनकार करते हैं. उनका सवाल है कि जब जिन लोगों की जमीन पर परियोजना बन रही है, उनसे ही नहीं पूछा गया, तो यह विकास किसके लिए है. आदिवासी संगठन और ग्रामीण लगातार विरोध प्रदर्शन जारी रखे हुए हैं और उन्होंने एलान किया है कि अपनी जमीन और जंगल बचाने के लिए वे हर स्तर पर संघर्ष करते रहेंगे.

इसका आप पर असर

  • भारत में: यह मामला देशभर के उन आदिवासी और ग्रामीण समुदायों के लिए अहम है जो बड़े बुनियादी ढांचे के प्रोजेक्ट्स के कारण विस्थापन का सामना करते हैं और जिनकी ग्राम सभाओं की सहमति को अक्सर अनदेखा किया जाता है.
  • बस्तर में: अगर बोधघाट परियोजना आगे बढ़ती है तो बस्तर के हजारों परिवारों को अपनी जमीन, जंगल और पारंपरिक आजीविका से हाथ धोना पड़ सकता है, जिससे उनका रोजमर्रा का जीवन बुनियादी रूप से बदल जाएगा.

सवाल-जवाब

बोधघाट हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट क्या है?
यह छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में प्रस्तावित एक जल विद्युत परियोजना है जिसका प्रस्ताव कई साल पहले रखा गया था, लेकिन विरोध के कारण यह रुकी हुई थी और अब इसे फिर से शुरू करने की तैयारी है.
इस बांध से कितने परिवार प्रभावित हो सकते हैं?
बड़ी संख्या में गांव डूब क्षेत्र में आ सकते हैं, जिससे हजारों परिवारों को अपना घर छोड़ना पड़ सकता है.
आदिवासी किस बात का विरोध कर रहे हैं?
उनका विरोध इस बात को लेकर है कि बांध से उनकी जमीन, जंगल, खेती और पारंपरिक आजीविका नष्ट होगी और उनसे बिना उचित चर्चा के काम आगे बढ़ाया जा रहा है.
प्रदर्शनकारियों ने सरकार के सामने क्या मांगें रखी हैं?
उन्होंने मांग की है कि परियोजना के सभी प्रभावों की जानकारी सार्वजनिक की जाए और ग्राम सभाओं की राय को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए.
विरोध प्रदर्शन में कौन से नारे लगाए गए?
ग्रामीणों ने 'पहले हमें गोली मारो, फिर बांध बनाओ' नारे लगाए जो उनके तीव्र विरोध और अडिग इरादे को दर्शाते हैं.
सरकार इस परियोजना के पक्ष में क्या तर्क देती है?
सरकार का कहना है कि बोधघाट परियोजना से बस्तर में बिजली उत्पादन बढ़ेगा और क्षेत्र के विकास को गति मिलेगी.
क्या आदिवासियों से परियोजना को लेकर सलाह-मशविरा किया गया?
ग्रामीणों का आरोप है कि उनसे कोई उचित चर्चा नहीं की गई और उनकी सहमति के बिना परियोजना को आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है.
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