छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के ग्रामीण इलाके सुपलगा के रहने वाले अमिल ने पारंपरिक तौर-तरीकों और आधुनिक तकनीकों का बेहतरीन तालमेल बिठाकर कृषि के क्षेत्र में एक अलग मुकाम हासिल किया है। एक किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले अमिल का बचपन से ही खेती किसानी के माहौल से गहरा नाता रहा है। जब उन्होंने अपनी बारहवीं कक्षा की पढ़ाई पूरी की, तो उन्होंने पारंपरिक रूप से नौकरी की तलाश में भटकने के बजाय खेती को ही अपना मुख्य पेशा बनाने का फैसला किया। आज वे अपनी दो एकड़ जमीन पर जैविक खीरे की बंपर खेती कर रहे हैं और उनके खेतों में फलों की तोड़ाई का काम जोरों पर चल रहा है। इस उन्नत पैदावार के चलते उनके खीरे की मांग छत्तीसगढ़ के स्थानीय बाजारों तक सीमित न रहकर उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे पड़ोसी राज्यों के बड़े बाजारों तक पहुंच रही है। वर्तमान में नवरात्र का पावन पर्व चल रहा है, जिसके कारण बाजार में खीरे की मांग में जबरदस्त तेजी आई है। इस त्योहारी सीजन में मांग बढ़ने से उन्हें फसल का बेहतरीन भाव मिलने की पूरी उम्मीद है, जिससे उनके मुनाफे में भी काफी इजाफा होगा।
बारहवीं के बाद खेती को बनाया आजीविका का मुख्य साधन
अमिल ने साझा किया कि उन्हें खेती करते हुए लगभग दो से तीन साल का समय बीत चुका है। बारहवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा पास करने के बाद उनके पास आय का कोई निश्चित और नियमित साधन नहीं था, जिससे वे अपने भविष्य को लेकर विचार कर रहे थे। ऐसे में उन्होंने अपनी ही पुश्तैनी जमीन पर उतरकर कृषि कार्य करने का ठोस निर्णय लिया। उनके परिवार में पीढ़ियों से किसानी होती चली आ रही थी, इसलिए उन्होंने अपने बचपन के दिनों से ही खेत की जुताई, बुवाई और फसल की देखभाल के तौर-तरीकों को बेहद करीब से देखा और समझा था। परिवार से मिले इसी मिले-जुले और अमूल्य अनुभव के मजबूत आधार पर उन्होंने किसी अन्य नौकरी की तलाश करने के बजाय खेती को ही अपनी आजीविका का एकमात्र साधन बनाने की ठान ली।
प्रति एकड़ लगभग एक लाख रुपये तक आती है कुल लागत
अमिल के अनुसार, एक एकड़ भूमि पर खीरे की सफल फसल तैयार करने में कुल खर्च करीब एक लाख रुपये तक बैठता है। इस अनुमानित लागत में खेत की गहरी जुताई और तैयारी से लेकर बीज रोपण, फसल की नियमित देखभाल, निराई-गुड़ाई और अन्य सभी प्रकार के जरूरी कृषि खर्च शामिल होते हैं। हालांकि, फसल की पूरी तुड़ाई के बाद बाजार में उसे बेचकर अंततः कितनी शुद्ध कमाई होगी, यह पूरी तरह से मंडी में उस समय मिलने वाले भाव और बाजार की मांग पर निर्भर करता है। उनका स्पष्ट मानना है कि यदि समय पर सही और उचित कीमत मिल जाती है, तो इस नकदी फसल से बहुत ही शानदार आमदनी होने की पूरी संभावना बनी रहती है।
बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड तक फैली है खीरे की मांग
अमिल ने बताया कि उनके खेतों में पैदा होने वाले खीरे की मांग मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों के व्यापारियों और बाजारों में सबसे ज्यादा बनी रहती है। साल भर सामान्य मांग रहने के बावजूद विभिन्न त्योहारों और धार्मिक अवसरों के दौरान इसकी मांग कई गुना बढ़ जाती है। खासकर नवरात्र जैसे पवित्र अवसरों पर बाजार में मांग अचानक से काफी तेज हो जाती है, जिससे किसानों को उनके माल का बेहतर भाव मिलने की प्रबल संभावना रहती है। फिलहाल उनके खेतों में खीरे की ताजी फसल की तुड़ाई का कार्य जोर-शोर से शुरू हो चुका है और वे अपनी इस उच्च गुणवत्ता वाली उपज को समय पर प्रमुख बाजारों तक सुरक्षित पहुंचाने की मुकम्मल तैयारियों में पूरी तरह जुटे हुए हैं।
गोबर की खाद के इस्तेमाल से हो रही है पूरी तरह जैविक खेती
अमिल इस बात पर विशेष रूप से जोर देते हैं कि उनके खेत में उगाई जाने वाली फसल पूरी तरह से जैविक तरीकों पर आधारित होती है। उन्होंने जानकारी दी कि खीरे की फसल को सेहतमंद बनाए रखने के लिए किसी भी हानिकारक रासायनिक उर्वरक के बजाय पूरी तरह से पारंपरिक गोबर की खाद का ही प्रमुखता से इस्तेमाल किया जाता है। खेती से जुड़ी बारीक जानकारियों, खाद की मात्रा और अन्य जरूरी कृषि सामग्रियों के चयन के संबंध में वे अक्सर स्थानीय कृषि सामग्री बेचने वाले अनुभवी दुकानदारों से भी सलाह लेते रहते हैं। इसके अलावा वे अपने खुद के दो-तीन साल के व्यावहारिक अनुभव और पुस्तैनी ज्ञान को मिलाकर आधुनिक कृषि तकनीकों को मैदान में पूरी सफलता के साथ अपना रहे हैं।
मल्चिंग और ड्रिप सिंचाई तकनीक से हुआ काम बेहद आसान
खेती के शुरुआती दिनों में खीरे के पूरे खेत की सिंचाई करने में काफी लंबा समय और भारी मेहनत लगती थी, लेकिन अब अमिल ने आधुनिक तकनीक का दामन थामते हुए मल्चिंग और ड्रिप सिंचाई प्रणाली को अपने खेतों में उतार लिया है। उनके अपने अनुभव के मुताबिक, पहले पारंपरिक माध्यमों से खेत के हर कोने में पानी पहुंचाने के लिए करीब एक से डेढ़ दिन तक का लंबा समय खर्च हो जाता था, जबकि अब आधुनिक ड्रिप सिंचाई की सुविधा मिलने से वही सारा काम महज एक से दो घंटे के भीतर ही बहुत आसानी से पूरा हो जाता है। इस बेहतरीन बदलाव के कारण उनके बहुमूल्य समय और शारीरिक मेहनत दोनों की ही बड़ी बचत हो रही है, जिससे वे खेत के अन्य जरूरी कार्यों पर भी पूरा ध्यान केंद्रित कर पा रहे हैं।
पारंपरिक पुश्तैनी अनुभव और आधुनिक तकनीकों का अनूठा संगम
अमिल का यह मानना है कि खेती-किसानी के बारे में उन्होंने जो कुछ भी सीखा है, उसकी सबसे बड़ी नींव उनके परिवार का पुराना अनुभव रहा है। बचपन से ही घर-परिवार में खेती होते देखने के कारण उनके मन में यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो गई थी कि किस खास तरीके से खेत में काम करने पर सबसे बेहतरीन और संतोषजनक परिणाम हासिल हो सकते हैं। आज के समय में वे अपने उसी पुराने और पारंपरिक अनुभव के साथ-साथ नई कृषि तकनीकों को भी पूरी तन्मयता से अपना रहे हैं। उनका यह दृढ़ विश्वास है कि कृषि क्षेत्र में आधुनिक तकनीक का दायरा बढ़ने से किसानों का दैनिक जीवन काफी सुगम हो रहा है और आज का किसान बेहद कम समय में सिंचाई जैसे जरूरी और बड़े कृषि कार्य आसानी से पूरे कर सकता है।



















