दशहरे के त्योहार पर हर साल रावण के पुतले का दहन करने की सदियों पुरानी परंपरा अब एक अजीब कानूनी मोड़ ले चुकी है। इस बार एक नागरिक ने परंपरा पर ही आपत्ति जताते हुए सीधे छत्तीसगढ़ राज्य मानव अधिकार आयोग का दरवाजा खटखटा दिया। आयोग के पास पहुंची इस विचित्र अर्जी में किसी जीवित व्यक्ति की प्रताड़ना की बजाय रावण के अधिकारों के हनन की गुहार लगाई गई थी, जिसे देखकर दफ्तर के अधिकारी भी दंग रह गए।
हजारों मामलों के बीच उजागर हुआ अजीबोगरीब प्रार्थना पत्र
इस पूरे मामले का खुलासा छत्तीसगढ़ राज्य मानव अधिकार आयोग की एक आधिकारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान हुआ। संस्था के कार्यवाहक अध्यक्ष गिरिधारी नायक ने पत्रकारों को आयोग की कार्यप्रणाली और वहां दर्ज होने वाली विभिन्न शिकायतों की समीक्षा प्रस्तुत की। गिरिधारी नायक ने साझा किया कि आयोग की स्थापना से लेकर अब तक कुल मिलाकर लगभग 74 हजार शिकायतें दर्ज की जा चुकी हैं। अधिकारियों द्वारा जांच करने पर इनमें से करीब दो से तीन हजार मामले पूरी तरह फर्जी पाए गए या फिर ऐसे निकले जो सीधे तौर पर आयोग के कार्यक्षेत्र की परिधि में नहीं आते।
अधिकारों की बहस और पौराणिक पात्रों की तुलना
रिकॉर्ड में दर्ज 74 हजार शिकायतों की फेहरिस्त में इस खास आवेदन ने सभी का ध्यान खींचा। कार्यवाहक अध्यक्ष गिरिधारी नायक के अनुसार, शिकायतकर्ता ने अपने पत्र में तर्क दिया था कि हर वर्ष रावण का पुतला फूंकना उसके मानवीय अधिकारों का खुला उल्लंघन है। जब संस्था की तरफ से यह दलील दी गई कि पौराणिक संदर्भों में रावण कोई साधारण मानव नहीं था, तो अर्जीदार ने पौराणिक इतिहास का दूसरा पहलू सामने रख दिया। उसने पलटकर पूछा कि यदि रावण को जलाना जरूरी है, तो फिर दुर्योधन का पुतला क्यों नहीं फूंका जाता। उसका दावा था कि यदि कृत्यों का आकलन किया जाए तो दुर्योधन को रावण की तुलना में कहीं बड़ा पापी करार दिया जा सकता है, इसके बावजूद समाज केवल रावण का ही दहन क्यों करता है।
अधिकार क्षेत्र से बाहर बताकर याचिकाकर्ता को लौटाया
अर्जीदार के इन पौराणिक तर्कों पर आयोग ने स्पष्ट कानूनी स्थिति से अवगत कराया। कार्यवाहक अध्यक्ष गिरिधारी नायक ने जानकारी दी कि संबंधित व्यक्ति को समझाया गया कि वह अपनी बात रखने के लिए किसी उपयुक्त मंच का रुख करे। आयोग ने स्पष्ट किया कि पौराणिक गाथाओं, धार्मिक परंपराओं या प्रतीकात्मक पुतला दहन से जुड़े विषय राज्य मानव अधिकार आयोग की शक्तियों अथवा अधिकार क्षेत्र के दायरे में नहीं आते। संस्था ने सीधे शब्दों में याचिकाकर्ता को संकेत दे दिया कि वह गलत पते पर अपनी फरियाद लेकर पहुंचा है। इस तरह हजारों संजीदा मामलों के बीच यह अनोखी याचिका अपनी अनूठी मांग के कारण खासी चर्चा का केंद्र बन गई।



















