छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में रहने वाले विवेक वाजपेयी की गाड़ी पर आज भी मौजूद गोलियों के निशान किसी सामान्य हादसे की नहीं, बल्कि झीरम घाटी में हुए उस खूनी हमले की गवाही देते हैं, जिसमें कांग्रेस के कई बड़े नेताओं समेत 30 से ज्यादा लोगों की जान गई थी। करीब 13 साल के इंतजार के बाद इस मामले में अब अंतिम फैसला आ चुका है, और इसी के साथ उस काफिले का हिस्सा रहे विवेक वाजपेयी की आपबीती एक बार फिर सुर्खियों में है।
गोलियों की बरसात के बीच घिरा काफिला
विवेक वाजपेयी बताते हैं कि झीरम घाटी में उस दिन गोलियां किसी बरसाती मौसम की बूंदों की तरह लगातार बरस रही थीं। चारों तरफ से गोलियों की तड़तड़ाहट, हैंड ग्रेनेड के धमाके और उनसे निकलने वाले छर्रों ने पूरे इलाके को दहला दिया था। उनके मुताबिक, उस वक्त वहां मौजूद हर शख्स की जिंदगी और मौत के बीच का फासला महज किस्मत पर टिका था, जिसे ईश्वर ने बचाया, सिर्फ वही जिंदा बच सका।
हर आंकड़े के पीछे टूटा हुआ एक परिवार
विवेक वाजपेयी के मुताबिक, उस हमले का मंजर इतना डरावना था कि उसे शब्दों में पिरोना आज भी आसान नहीं है। वहां मौजूद हर व्यक्ति ने मौत को बेहद नजदीक से देखा। हमले में 30 से ज्यादा साथी मारे गए, और इन मौतों के बाद जिन परिवारों पर दुखों का पहाड़ टूटा, उनकी पीड़ा को शब्दों में बांधना मुश्किल है। किसी की गोद से पति छिन गया, किसी का भाई नहीं रहा, किसी ने बेटा खोया तो किसी की बहन हमेशा के लिए बिछड़ गई। विवेक के अनुसार, यह सिर्फ आंकड़ों में दर्ज मौतें नहीं थीं, हर मौत के पीछे एक पूरा परिवार बिखर गया था।
30 गाड़ियों का काफिला और अचानक घेराबंदी
विवेक वाजपेयी के अनुसार, परिवर्तन यात्रा के इस काफिले में 30 से ज्यादा गाड़ियां शामिल थीं। हमले के वक्त कुछ गाड़ियां आगे निकल गई थीं, जबकि कई गाड़ियां पीछे रह गईं। नक्सलियों ने ठीक इसी मौके का फायदा उठाया और पूरे काफिले को घेरकर फायरिंग शुरू कर दी। विवेक ने सुरक्षा इंतजामों पर भी तीखे सवाल खड़े किए। उनका दावा है कि हमला होने के बाद लंबे समय तक मौके पर पुलिस नहीं पहुंची। मुख्य सड़क पर हुए इस हमले के बावजूद करीब चार घंटे तक कोई मदद नहीं पहुंची, और घायलों को अपने ही संसाधनों के सहारे वहां से निकलना पड़ा।
एक ही गाड़ी में बैठे चारों को लगी गोली
विवेक वाजपेयी की गाड़ी काफिले में सबसे आगे चल रही थी। गाड़ी उनका ड्राइवर चला रहा था, ड्राइवर की बगल वाली सीट पर मौजूदा कांग्रेस सांसद फूलोदेवी नेताम बैठी थीं, जबकि पिछली सीट पर उनके मित्र डॉक्टर शिव और खुद विवेक वाजपेयी सवार थे। गाड़ी में मौजूद इन चारों में से किसी को भी गोली लगने से छूट नहीं मिली। सबसे ज्यादा चोट ड्राइवर को आई, उसके कूल्हे में गोली लगी और वह दूसरे पैर को चीरते हुए बाहर निकल गई। इस चोट के चलते ड्राइवर को महीनों अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। विवेक बताते हैं कि करीब आठ महीने तक अलग-अलग अस्पतालों में उसका इलाज चला, और इसके बाद आगे का इलाज अपोलो अस्पताल में अपने खर्च पर कराया गया।
महेंद्र कर्मा की गाड़ी के लिए अनजाने में ढाल बनी उनकी कार
विवेक वाजपेयी बताते हैं कि गोलीबारी के दौरान उनकी गाड़ी और महेंद्र कर्मा की गाड़ी के बीच अनजाने में एक तरह की सुरक्षा घेरेबंदी बन गई। जिस दिशा से नक्सली फायरिंग कर रहे थे, ठीक उसी दिशा और महेंद्र कर्मा की गाड़ी के बीच उनकी गाड़ी आ गई, जिससे वह सीधे गोलियों की जद में आ गई। विवेक के मुताबिक, उस दिन करीब 20 से 22 लोग किसी तरह बच निकलने में कामयाब रहे, और इसमें महेंद्र कर्मा की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है। उनका कहना है कि महेंद्र कर्मा ने अपनी जान की परवाह किए बगैर बाकी लोगों को बचाने की कोशिश की।
पहली ही गोली में गई थी महेंद्र कर्मा की जान
महेंद्र कर्मा की मौत को लेकर विवेक वाजपेयी का दावा है कि उन्हें कनपटी पर सीधी गोली लगी थी, और पहली ही गोली लगते ही उनका निधन हो गया था। उनके मुताबिक, इसके बाद नक्सलियों ने उनके शव के साथ बर्बरता की। घटना के बाद महेंद्र कर्मा के साथ हुई क्रूरता को लेकर समय-समय पर अलग-अलग बातें सामने आती रही हैं, लेकिन विवेक का कहना है कि हकीकत यही है कि पहली गोली लगने के साथ ही उनके प्राण निकल चुके थे।
चार घंटे तक कोई मदद को नहीं पहुंचा
हमले के बाद हुई राहत और बचाव कार्रवाई पर भी विवेक वाजपेयी ने गंभीर सवाल खड़े किए। उनका कहना है कि करीब चार घंटे तक वहां किसी ने उनकी सुध तक नहीं ली। जब हालात कुछ काबू में आए, तो वे और बाकी बचे लोग अपने दम पर वहां से निकले। न तो घायलों को अस्पताल पहुंचाने के लिए कोई एंबुलेंस मौके पर थी, न ही प्रशासन की तरफ से निकालने के लिए कोई वाहन भेजा गया था। मजबूरन घायल और बचे हुए लोग पैदल ही मुख्य सड़क की ओर बढ़े और रास्ते में मिले स्थानीय लोगों की मदद से किसी तरह सुरक्षित जगह तक पहुंच पाए।
आज भी कार पर मौजूद हैं वे घाव के निशान
झीरम घाटी हमले को बीते तेरह साल गुजर चुके हैं, लेकिन विवेक वाजपेयी की गाड़ी पर मौजूद गोलियों के निशान आज भी उस दिन की भयावहता की चुपचाप गवाही देते हैं। ये निशान बताते हैं कि किस तरह पूरा काफिला नक्सलियों की गोलियों की सीधी जद में आ गया था। विवेक वाजपेयी के लिए झीरम की वह घटना महज इतिहास के पन्नों में दर्ज एक वाकया नहीं है, बल्कि उनकी जिंदगी का वह दिन है जिसे वे आज भी अपना दूसरा जन्म मानते हैं। मामले में अंतिम फैसला आने के दिन उनकी यह आपबीती एक बार फिर उन पहलुओं को सामने ले आई है, जिन्हें प्रत्यक्षदर्शियों ने अपनी आंखों से देखा और अपनी जिंदगी में झेला।





















