राजस्थान में रेगिस्तान के जहाज को बचाने और डेयरी से आजीविका संवारने को दो बड़े संस्थान आए साथघर पर चांदी की पायल चमकाने के असरदार नुस्खेजापानी हॉरर एंथोलॉजी से अमेरिकी दर्शकों को डराने पहुंचे जुंजी इतो के लाइव एक्शन किस्सेकादीपुर खुर्द में मुंबई के हुनर से महका विनोद जायसवाल का देसी वड़ाएशियाई खेलों में दोहरे स्वर्ण पदक के बाद प्रधानमंत्री से मिले भारतीय क्रिकेटर, सौंपी हस्ताक्षरित जर्सीपालतू कुत्ते के कटोरे से पानी पीने के विवाद के बीच जानिए कौन हैं अवंतिका भट्ट और क्या है उनकी शैक्षिक पृष्ठभूमिअमेरिकी महंगाई में तेज उछाल से 2026 तक दरें ऊंची रहने का अंदेशा, वैश्विक बाजारों में हलचलमजबूत ब्रिटिश आर्थिक आंकड़ों से पाउंड में उछाल, बैंक ऑफ जापान के बयानों के बाद भी येन पिछड़ाअक्टूबर के त्योहारी सीजन में कई राज्यों में बंद रहेंगी बैंक शाखाएं, यहां देखें पूरी तारीखवार सूचीछह महीने बाद कोर्ट पर लौटीं सोले कार्तल ने जैस्मीन पाओलिनी को हराया, वुहान ओपन के अंतिम आठ में जगह बनाई
हिंद महासागर में घटती सबमरीन से नौसेना के सामने खड़ी हुई नई रणनीतिक चुनौतीभारत
15 अक्तू॰ 2026, 6:23 pm (2 घंटे पहले)· 1

हिंद महासागर में घटती सबमरीन से नौसेना के सामने खड़ी हुई नई रणनीतिक चुनौती

पारंपरिक पनडुब्बियों के रिटायर होने और नई खरीद में देरी से नौसेना का 30 साल का प्लान पिछड़ गया है, हालांकि न्यूक्लियर सबमरीन कार्यक्रम सुरक्षा को मजबूती दे रहा है।

हिंद महासागर के विस्तृत समुद्री क्षेत्र में देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली भारतीय नौसेना इस समय पनडुब्बियों के स्तर पर एक बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रही है। एक तरफ जहां क्षेत्रीय समुद्री सीमाओं में निगरानी और गश्त की मांग लगातार बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ नौसेना का पारंपरिक पनडुब्बी बेड़ा लगातार पुराना पड़ रहा है। सबसे गंभीर स्थिति यह है कि पुराने जहाजों के सेवामुक्त होने की रफ्तार के मुकाबले नई पनडुब्बियों के निर्माण और उन्हें बेड़े में शामिल करने की गति काफी धीमी पड़ चुकी है। साल 1998 में तैयार किए गए 30 साल के दीर्घकालिक विजन के अनुसार साल 2030 तक 24 पारंपरिक पनडुब्बियों का एक मजबूत और आधुनिक बेड़ा तैयार करने की समयसीमा निर्धारित की गई थी, परंतु मौजूदा जमीनी हकीकत इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य से काफी दूर दिखाई दे रही है।

समुद्री सुरक्षा के समीकरणों में पानी के नीचे मौजूद ताकत को सबसे निर्णायक माना जाता है। इतिहास गवाह है कि सतह पर चलने वाले विशाल युद्धपोत भी पानी के नीचे घात लगाकर बैठी एक अदृश्य पनडुब्बी के सामने लाचार हो जाते हैं। जब पुराने जहाजों को एक-एक कर सेवा से हटाया जा रहा हो और उनके विकल्प के तौर पर नए प्लेटफॉर्म तय समय पर न आ पाएं, तो नौसेना की परिचालन क्षमता में एक ऐसा तकनीकी खालीपन बन जाता है जिसे रातोंरात भरना संभव नहीं होता। यदि भविष्य के अधिग्रहण कार्यक्रमों में तेजी नहीं लाई गई, तो यह रणनीतिक अंतर आने वाले वर्षों में और अधिक गहरा हो सकता है।

ये भी पढ़ें

पुराने जहाजों की विदाई और 2030 के लक्ष्य से पिछड़ती समयसीमा

मौजूदा समय में भारतीय नौसेना कुल 16 पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक सबमरीन का संचालन कर रही है, जो मुख्य रूप से तीन अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित हैं। इनमें स्कॉर्पीन डिजाइन पर आधारित कलवरी क्लास, रूसी मूल की सिंधुघोष क्लास और जर्मन डिजाइन वाली शिशुमार क्लास शामिल हैं। इनके अलावा तीन रणनीतिक परमाणु पनडुब्बियां भी सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा हैं। अतीत के घटनाक्रम पर नजर डालें तो साल 1998 में वाइस एडमिरल एके चटर्जी द्वारा 30 साल का एक व्यापक सबमरीन निर्माण प्लान तैयार किया गया था। इस योजना का प्राथमिक उद्देश्य घरेलू शिपयार्डों में उत्पादन और चुनिंदा विदेशी सहयोग कार्यक्रमों के जरिए साल 2030 तक भारत के अंडरवाटर बेड़े को आत्मनिर्भर और अजेय बनाना था।

दुर्भाग्य से यह 30 साल की रूपरेखा तय लक्ष्यों से कई साल पीछे छूट चुकी है। सिंधुघोष श्रेणी की चार पनडुब्बियां अपनी निर्धारित सेवा अवधि पूरी करके पहले ही रिटायर हो चुकी हैं, जिनमें इस वर्ग की सबसे पहली पनडुब्बी आईएनएस सिंधुघोष भी शामिल है। इसके विपरीत, इस नुकसान की भरपाई के लिए अब तक केवल छह नई कलवरी क्लास सबमरीन ही नौसेना में शामिल की जा सकी हैं। दूसरी ओर, शिशुमार श्रेणी की पनडुब्बियों का मिड-लाइफ अपग्रेड जरूर किया गया है ताकि उनकी परिचालन क्षमता बनी रहे, लेकिन इस श्रेणी के जहाजों की औसत आयु अब 35 वर्ष के आसपास पहुंच चुकी है। आने वाले कुछ ही सालों में कई अन्य पुरानी पनडुब्बियां भी अनिवार्य रूप से रिटायर होने के कगार पर पहुंच जाएंगी, जिससे बेड़े पर तत्काल नए विकल्प उतारने का दबाव बहुत ज्यादा बढ़ गया है।

रणनीतिक संतुलन संभालता न्यूक्लियर सबमरीन प्रोग्राम

पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक बेड़े में हो रहे विलंब के बीच देश के रणनीतिक परमाणु पनडुब्बी कार्यक्रम ने नौसेना की ताकत को काफी हद तक सहारा दिया है। अरिहंत क्लास की तीसरी बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन आईएनएस अरिदमन के आने से देश का न्यूक्लियर ट्रायड पहले से कहीं अधिक परिपक्व और अभेद्य हुआ है। न्यूक्लियर ट्रायड की यह क्षमता जमीन से छोड़ी जाने वाली मिसाइलों और वायुसेना के लड़ाकू विमानों के साथ मिलकर राष्ट्रीय प्रतिरोधक क्षमता को पूर्णता प्रदान करती है।

आईएनएस अरिदमन आठ के-4 न्यूक्लियर मिसाइलों को ले जाने में पूरी तरह सक्षम है, जिनमें से प्रत्येक मिसाइल की मारक क्षमता लगभग 3500 किलोमीटर है। इसके अतिरिक्त, विशाखापट्टनम में चौथी बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन को भी जलवतर्णित यानी लॉन्च किया जा चुका है, जबकि भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ज्यादा बड़ी और संहारक एस-5 क्लास सबमरीन के निर्माण की योजना पर भी तेजी से काम चल रहा है। परमाणु ट्रायड में सबमरीन को सबसे सुरक्षित और ट्रैक करने में सबसे कठिन माना जाता है, क्योंकि ये पानी की असीम गहराइयों में महीनों तक बिना किसी रडार या उपग्रह की पकड़ में आए गुप्त रह सकती हैं। यदि सतह पर स्थित सभी सैन्य प्रतिष्ठानों पर कोई अचानक हमला भी हो जाए, तो भी गहरे समुद्र में छिपी ये पनडुब्बियां देश को घातक जवाबी प्रहार करने की पूरी क्षमता देती हैं।

अदृश्य रहने का अचूक हथियार: एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन तकनीक

आधुनिक नौसैनिक युद्ध में सबमरीन की अहमियत केवल परमाणु हथियारों तक सीमित नहीं है, बल्कि पारंपरिक लड़ाइयों में भी यह सतह के जहाजों के लिए सबसे बड़ा काल साबित होती है। हाल के दिनों में श्रीलंका के तट के पास अमेरिकी सबमरीन द्वारा ईरानी युद्धपोत आईरिस देना को ट्रैक करके जलमग्न करने की घटना ने यह साबित किया था कि विशाल सतह के युद्धपोत को पानी के नीचे छिपे खतरे की भनक तक नहीं लग पाती। इससे यह स्पष्ट संदेश जाता है कि शांत और चुपचाप काम करने वाली पनडुब्बियां किसी भी आधुनिक युद्धपोत के मुकाबले कहीं ज्यादा विनाशकारी होती हैं।

पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को लंबे समय तक पानी के नीचे छिपाए रखने के लिए एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन यानी एआईपी को सबसे महत्वपूर्ण तकनीक माना जाता है। इस अत्याधुनिक प्रणाली के लग जाने से पनडुब्बी बिना सतह पर आए लगातार दो से तीन सप्ताह तक गहराई में सक्रिय रह सकती है। इसके विपरीत, सामान्य डीजल-इलेक्ट्रिक सबमरीन को अपनी विशाल बैटरियों को चार्ज करने के लिए बार-बार पानी की सतह पर या उसके ठीक नीचे स्नोर्कलिंग मोड में आना पड़ता है। जैसे ही पनडुब्बी स्नोर्कलिंग के लिए ऊपर आती है, दुश्मन के टोही विमानों, युद्धपोतों और उपग्रहों द्वारा उसे पकड़े जाने का खतरा अत्यधिक बढ़ जाता है। वर्तमान समय में भारतीय नौसेना अपनी केवल छह कलवरी क्लास सबमरीन में डीआरडीओ द्वारा स्वदेशी रूप से विकसित एआईपी प्रणाली लगाने की तैयारी में जुटी हुई है।

70 हजार करोड़ का प्रोजेक्ट 75आई और डिलीवरी की चुनौतियां

नौसेना के घटते बेड़े को पुनर्जीवित करने के लिए सरकार की सबसे बड़ी खरीद योजना प्रोजेक्ट 75आई है। यह टेंडर लगभग 70 हजार करोड़ रुपये की विशाल लागत वाला है, जिसके अंतर्गत छह से नौ अत्याधुनिक पारंपरिक पनडुब्बियों का अधिग्रहण प्रस्तावित है। इस महत्वपूर्ण टेंडर में भारत की अग्रणी शिपबिल्डर कंपनी मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स और जर्मनी की विख्यात कंपनी टीकेएमएस ने तकनीकी मूल्यांकन का चरण सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है।

इस तकनीकी सफलता के बाद अब भारत सिद्ध एआईपी तकनीक से सुसज्जित टाइप-214 सबमरीन की खरीद के लिए अंतिम वाणिज्यिक लागत और शर्तों पर बातचीत के दौर में प्रवेश कर रहा है। हालांकि, यदि इस सौदे पर अंतिम हस्ताक्षर जल्द हो भी जाएं, तो भी वास्तविक डिलीवरी में लंबा समय लगना तय है। स्थापित रक्षा प्रक्रियाओं के अनुसार, अनुबंध पर अंतिम मुहर लगने के कम से कम सात वर्ष बाद ही पहली सबमरीन नौसेना को सौंपी जा सकेगी। इसके साथ ही रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देते हुए हथियारों के घरेलू निर्माण पर भी जोर दिया जा रहा है, जिसके तहत हैदराबाद की निजी कंपनी वीईएम टेक्नोलॉजीज ने देश के भीतर ही भारी टॉरपीडो के विनिर्माण के लिए जर्मन कंपनी टीकेएमएस के साथ एक रणनीतिक समझौता किया है।

प्रोजेक्ट 76 और 77 के जरिए दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता की राह

आने वाले दशकों की भू-रणनीतिक आवश्यकताओं को देखते हुए प्रोजेक्ट 76 की रूपरेखा भी अंतिम रूप ले रही है। यह कार्यक्रम पूरी तरह से स्वदेशी पारंपरिक पनडुब्बी डिजाइन पर आधारित होगा, जिसमें डीआरडीओ द्वारा संशोधित और परिष्कृत एआईपी सिस्टम का व्यापक उपयोग किया जाएगा। इसके समानांतर, नौसेना प्रोजेक्ट 77 के तहत शक्तिशाली न्यूक्लियर अटैक सबमरीन यानी एसएसएन तैयार करने के एक अलग और महत्वाकांक्षी मिशन पर भी आगे बढ़ रही है।

देश की सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति ने 35 हजार करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से निर्मित होने वाली ऐसी दो न्यूक्लियर अटैक सबमरीन के निर्माण प्रस्ताव को अपनी औपचारिक मंजूरी दे दी है। इस महत्वपूर्ण परियोजना के तहत पहली पनडुब्बी के वर्ष 2036-37 तक बनकर पूरी तरह तैयार होने का अनुमान है। चूंकि नई पनडुब्बियों के आने में अभी एक दशक से अधिक का लंबा समय बाकी है, इसलिए इस बीच पैदा होने वाले ऑपरेशनल खालीपन को पाटने के लिए नौसेना रूस से एक न्यूक्लियर अटैक सबमरीन लीज पर लेने की योजना पर भी समानांतर काम कर रही है। इन तमाम स्वदेशी और सहयोगी पहलों के माध्यम से भारतीय नौसेना का अंतिम लक्ष्य भविष्य में कम से कम 22 पूर्णतः मेड इन इंडिया सबमरीन को अपने बेड़े में शामिल करके समुद्री क्षेत्र में निर्णायक बढ़त बनाए रखना है।

सवाल-जवाब

भारतीय नौसेना के पास वर्तमान में कुल कितनी पारंपरिक सबमरीन हैं?
भारतीय नौसेना के पास इस समय कलवरी, सिंधुघोष और शिशुमार श्रेणी की कुल 16 पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक सबमरीन सक्रिय हैं।
1998 के सबमरीन निर्माण प्लान का मुख्य लक्ष्य क्या था?
वाइस एडमिरल एके चटर्जी द्वारा तैयार इस 30 साल के प्लान का लक्ष्य 2030 तक 24 पारंपरिक सबमरीन का बेड़ा तैयार करना था।
प्रोजेक्ट 75आई की कुल लागत कितनी है और इसमें कौन सी कंपनियां शामिल हैं?
यह टेंडर करीब 70 हजार करोड़ रुपये का है, जिसमें मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स और जर्मनी की टीकेएमएस ने तकनीकी मूल्यांकन पास किया है।
अनुबंध होने के कितने समय बाद प्रोजेक्ट 75आई की पहली सबमरीन मिलेगी?
अनुबंध पर हस्ताक्षर होने के लगभग सात साल बाद पहली सबमरीन नौसेना को मिलने की उम्मीद है।
आईएनएस अरिदमन की मारक क्षमता और मिसाइल क्षमता क्या है?
आईएनएस अरिदमन आठ के-4 न्यूक्लियर मिसाइलें ले जा सकती है, जिनमें से प्रत्येक की मारक क्षमता लगभग 3500 किलोमीटर है।
पारंपरिक सबमरीन के लिए एआईपी तकनीक क्यों जरूरी मानी जाती है?
एआईपी सिस्टम की मदद से सबमरीन बिना सतह पर आए लगातार दो से तीन हफ्ते तक पानी के नीचे छिपी रह सकती है।
प्रोजेक्ट 77 के तहत किन सबमरीन के निर्माण को मंजूरी मिली है?
सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति ने 35 हजार करोड़ रुपये की लागत से दो न्यूक्लियर अटैक सबमरीन के निर्माण को मंजूरी दी है।
नई सबमरीन के आने तक खालीपन भरने के लिए नौसेना क्या कदम उठा रही है?
नौसेना इस अंतरिम अवधि में अपनी ताकत बनाए रखने के लिए रूस से एक न्यूक्लियर अटैक सबमरीन लीज पर लेने की योजना बना रही है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp