अंतरराष्ट्रीय मंच पर लाल गेंद की क्रिकेट न केवल खिलाड़ियों के हुनर की परख करती है, बल्कि इसमें शारीरिक मजबूती और मानसिक एकाग्रता का भी कड़ा इम्तिहान होता है। सामान्य तौर पर खिलाड़ी पैंतीस या छत्तीस की उम्र छूते ही खेल के इस लंबे प्रारूप से किनारा करने लगते हैं, क्योंकि मैदान पर लगातार पांच दिन तक सक्रिय रहना आसान नहीं होता। ऐसे थका देने वाले खेल में कप्तानी की अतिरिक्त जिम्मेदारी संभालना और भी पेचीदा काम माना जाता है। इसके बावजूद टेस्ट क्रिकेट के पन्नों में ऐसे दुर्लभ नायक दर्ज हैं, जिन्होंने बढ़ती उम्र को दरकिनार करते हुए चालीस और पचास की दहलीज़ पर भी राष्ट्रीय टीमों की बागडोर अपने हाथों में थामे रखी।
डब्ल्यू. जी. ग्रेस का वह जादुई कीर्तिमान जो आज तक सुरक्षित है
इस अनूठी फेहरिस्त में सबसे शीर्ष पायदान पर इंग्लैंड के मशहूर खिलाड़ी डब्ल्यू. जी. ग्रेस विराजमान हैं। उन्नीसवीं सदी के अंतिम दौर में जब क्रिकेट अपनी शुरुआती पहचान गढ़ रहा था, तब 1 जून 1899 को नॉटिंघम में इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के बीच एक ऐतिहासिक भिड़ंत शुरू हुई। उस मुकाबले के दौरान ग्रेस की उम्र 50 साल और 320 दिन दर्ज की गई थी। सफेद घनी दाढ़ी और बुलंद कद-काठी वाले इस दिग्गज ने टॉस के लिए कदम बढ़ाते ही ऐसा कीर्तिमान रच दिया, जिसे बीते 127 वर्षों में कोई भी दूसरा कप्तान तोड़ नहीं सका है। वह टेस्ट इतिहास का 60वां मुकाबला था और आज तक ग्रेस दुनिया के एकमात्र ऐसे अगुआ हैं, जिन्होंने पचास वर्ष से अधिक की आयु में किसी टेस्ट टीम की कमान संभाली।
युद्ध के सन्नाटे के बाद गबी एलन का दृढ़ नेतृत्व
ग्रेस द्वारा स्थापित उस शिखर के लगभग पचास बरस बीत जाने के बाद इंग्लैंड के एक अन्य जांबाज ने इस गौरवशाली सूची में अपना नाम दर्ज कराया। यह कारनामा गबी एलन के नाम दर्ज है, जिन्होंने दूसरे विश्वयुद्ध की विभीषिका के बाद बिखरी हुई इंग्लिश टीम को संभालने का बीड़ा उठाया था। 27 मार्च 1948 को किंग्स्टन के मैदान पर वेस्टइंडीज के खिलाफ खेले गए टेस्ट मैच में जब एलन अपनी टीम की अगुआई करने उतरे, तब उनकी आयु 45 साल 245 दिन थी। खेल इतिहास का यह 298वां टेस्ट मैच था, जिसमें युवा खिलाड़ियों को सही दिशा दिखाने और टीम में स्थिरता लाने के लिए एलन के अपार अनुभव का सहारा लिया गया था।
वॉली हैमंड का बल्ला और चालीस पार की कप्तानी
एलन के इस मैच से ठीक एक वर्ष पूर्व भी इंग्लैंड की कमान एक वरिष्ठ बल्लेबाज के ही कंधों पर थी। महान क्रिकेटर वैली हैमंड ने 21 मार्च 1947 को क्राइस्टचर्च में न्यूजीलैंड के खिलाफ खेले गए मुकाबले में कप्तानी की बागडोर संभाली थी। उस मैच के समय हैमंड की आयु 43 वर्ष 279 दिन की थी। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार यह टेस्ट क्रिकेट का 284वां मुकाबला था। हैमंड ने अपने शानदार बल्ले और परिपक्व फैसलों से साबित किया था कि अगर खेल के प्रति निष्ठा और भूख बरकरार रहे, तो जन्मतिथि केवल कागजों तक ही सीमित रह जाती है।
वारेन बार्ड्सले और एशेज के मैदान पर कंगारू चुनौती
ब्रिटिश खिलाड़ियों के इस एकाधिकार के बीच ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट का परचम वारेन बार्ड्सले ने लहराया। साल 1926 में 24 जुलाई के दिन मैनचेस्टर के प्रसिद्ध मैदान पर इंग्लैंड के विरुद्ध खेले गए 166वें टेस्ट मैच में ऑस्ट्रेलिया की कप्तानी बार्ड्सले को सौंपी गई। उस दिन मैदान पर उतरते वक्त इस ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी की उम्र 43 साल 233 दिन पहुंच चुकी थी। एशेज जैसी बेहद तनावपूर्ण और प्रतिष्ठा की जंग में इतनी परिपक्व उम्र के भीतर टीम को संभालना मानसिक मजबूती का बेमिसाल उदाहरण माना जाता है।
आधुनिक युग में मिस्बाह-उल-हक की अनुशासित मिसाल
सफेद कपड़ों की क्रिकेट में जहां पुराने दौर के खिलाड़ी छाए रहे, वहीं इक्कीसवीं सदी के आधुनिक और तेज-तर्रार क्रिकेट में पाकिस्तान के पूर्व कप्तान मिस्बाह-उल-हक ने खुद को इस विशिष्ट कतार में शामिल कराया। मिस्बाह ने अपने पूरे अंतरराष्ट्रीय सफर में अनुशासन और शांत दिमाग से पाकिस्तान को कई नाजुक मोड़ों से उबारा। 10 मई 2017 को रोज़ो के मैदान पर वेस्टइंडीज के खिलाफ जब वे अंतिम बार बतौर कप्तान उतरे, तब उनकी उम्र 42 साल 351 दिन थी। यह टेस्ट इतिहास का 2261वां मैच था, जिसमें मिस्बाह ने युवा साथियों को यह सिखाया कि फिटनेस और समर्पण के सहारे किसी भी उम्र में शीर्ष स्तर पर नेतृत्व किया जा सकता है।



















