भारत की आजादी और उससे जुड़े क्रिकेट इतिहास की बात करें तो कई ऐसे दिग्गज खिलाड़ी रहे हैं जिन्होंने खेल की दुनिया में अपनी एक अलग छाप छोड़ी है। भारत ने अपना पहला आधिकारिक मैच 1948 में इंग्लैंड दौरे पर खेला था, जबकि आधिकारिक तौर पर भारतीय टीम 1932 से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सक्रिय रही थी। हालांकि, इससे भी बहुत पहले एक ऐसा भारतीय खिलाड़ी था जिसने अंग्रेजी सरजमीं पर अपनी खेल कला का लोहा मनवाया था। यह कहानी भारतीय क्रिकेट के पितामह कहे जाने वाले महाराजा कुमार रणजीतसिंह की है, जिन्हें उस दौर में अंग्रेज अपनी टीम में शामिल करने के लिए आपस में भिड़ जाते थे।
शाही परिवार से ताल्लुक और शुरुआती जीवन
आजादी से पहले के दौर में हिन्दुस्तान के भीतर क्रिकेट मुख्य रूप से राजघरानों, नवाबों और रईसों के बीच ही लोकप्रिय था। इसी रईस पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखने वाले जामनगर के महाराजा कुमार रणजीतसिंह का जन्म 10 सितंबर 1872 को गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र के सरोदर गांव में हुआ था। यदि आज वह जीवित होते तो अपना 154वां जन्मदिन मना रहे होते। उस समय शाही परिवारों के युवाओं को उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेजना एक आम परंपरा थी और इसी सिलसिले में रणजीतसिंह भी मात्र 16 साल की उम्र में इंग्लैंड चले गए थे।
इंग्लैंड में पढ़ाई और क्रिकेट की शुरुआत
इंग्लैंड पहुंचकर अपनी पढ़ाई पूरी करने के दौरान ही रणजीतसिंह का रुझान क्रिकेट की तरफ तेजी से बढ़ा। वह पहले स्कूल और फिर कॉलेज स्तर पर नियमित रूप से क्रिकेट खेलने लगे। यद्यपि उनके माता-पिता ने उनका नाम रणजीतसिंह रखा था, लेकिन इंग्लैंड में उनके खेल कौशल और शैली के कारण उन्हें रणजी और स्मिथ जैसे निकनेम दिए गए। अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर उन्होंने आगे चलकर ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मैनचेस्टर के ऐतिहासिक ओल्ड ट्रेफ्फोर्ड मैदान पर अपने अंतरराष्ट्रीय करियर का पहला टेस्ट मैच खेला।
गुलाम भारत के खिलाड़ी का अंग्रेजी टीम में चयन और विवाद
रणजीतसिंह के भारतीय मूल के होने के बावजूद साल 1896 में इंग्लैंड ने उन्हें अपनी राष्ट्रीय टीम में जगह दी, जिससे वह इंग्लैंड की तरफ से खेलने वाले एशियाई मूल के पहले क्रिकेटर बन गए। उनके इस चयन को लेकर उस समय जमकर विवाद हुआ था। मेरिलबोन क्रिकेट क्लब यानी MCC के तत्कालीन चेयरमैन लॉर्ड हारिस ने आपत्ति जताते हुए कहा था कि रणजीत भले ही शाही परिवार से आते हों, लेकिन हैं तो हमारे गुलाम ही, इसलिए उनका चयन इंग्लैंड टीम में कैसे हो सकता है और अंग्रेज किसी काले खिलाड़ी के लिए फील्डिंग क्यों करेंगे? हालांकि, रणजीतसिंह ने इन सभी नस्लीय और तीखी आलोचनाओं का मुंहतोड़ जवाब देते हुए अपने डेब्यू टेस्ट मैच की पहली पारी में 62 और दूसरी पारी में नाबाद 154 रन यानी 154* रनों की दो शानदार पारियां खेल डालीं। वह टेस्ट क्रिकेट इतिहास के ऐसे पहले खिलाड़ी बने जिन्होंने अपने पदार्पण टेस्ट की पहली पारी में अर्धशतक और दूसरी पारी में शतक जड़ने का अनूठा कारनामा किया।
जब रणजी को मैदान पर उतारने के लिए भिड़ गए अंग्रेज
उनके शानदार प्रदर्शन का सिलसिला यहीं नहीं थमा। इसके अगले ही साल यानी 1897 में जब इंग्लैंड की टीम ने ऑस्ट्रेलिया का दौरा किया, तब सिडनी में खेले गए पहले टेस्ट मैच में रणजीतसिंह को सातवें नंबर पर बल्लेबाजी करने का मौका मिला। क्रम में इतना नीचे उतरने के बावजूद उन्होंने अपनी आक्रामक बल्लेबाजी से 175 रनों की विशाल पारी खेल डाली। दिलचस्प बात यह है कि उस मुकाबले से ठीक पहले वह बीमार महसूस कर रहे थे और उनके शरीर में काफी कमजोरी थी, इसके बावजूद इंग्लैंड की टीम उन्हें किसी भी कीमत पर प्लेइंग इलेवन से बाहर नहीं रखना चाहती थी। अपने छोटे से 15 टेस्ट मैचों के करियर में उन्होंने 44.95 की बेहतरीन औसत से कुल 989 रन बनाए। इसके अलावा उनके नाम 307 प्रथम श्रेणी मैचों में 72 शतकों और 109 अर्धशतकों का एक विशाल रिकॉर्ड भी दर्ज है।
निधन और भारतीय क्रिकेट पर अमिट छाप
खेल के मैदान पर अपनी असाधारण उपलब्धियां हासिल करने के बाद रणजीतसिंह वर्ष 1904 में वापस भारत लौट आए। इसके बाद साल 1907 में उन्होंने नवानगर के महाराजा के रूप में कमान संभाली। आगे चलकर 2 अप्रैल 1933 को 60 वर्ष की आयु में उनका जामनगर में निधन हो गया। भारतीय क्रिकेट में उनके अभूतपूर्व योगदान को हमेशा याद रखने के लिए साल 1934 में उनके नाम पर देश की सबसे बड़ी घरेलू प्रतियोगिता रणजी ट्रॉफी की शुरुआत की गई। इसके अतिरिक्त, रणजी ने साल 1897 में द जुबली बुक ऑफ क्रिकेट नामक एक प्रसिद्ध पुस्तक भी लिखी थी, जिसे आज भी इस खेल पर लिखी गई सर्वश्रेष्ठ पुस्तकों में गिना जाता है। उनके भतीजे दलीप सिंह ने भी इंग्लैंड के लिए टेस्ट क्रिकेट खेला था, और उन्हीं के नाम पर देश में प्रतिष्ठित दलीप ट्रॉफी का आयोजन किया जाता है।



















