भारतीय क्रिकेट के संचालन और व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर बड़ा कदम उठाया है। अदालत की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि देश के शीर्ष क्रिकेट बोर्ड और तमाम राज्य संघों पर नए कानून का शिकंजा क्यों नहीं कसा जाना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान सीधा सवाल उठाया कि जब नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट 2025 अस्तित्व में आ चुका है, तो फिर क्रिकेट से जुड़ी इन प्रमुख संस्थाओं को इस कानून के दायरे से छूट क्यों दी जाए। अदालत ने साफ निर्देश दिए हैं कि बीसीसीआई और विभिन्न राज्य संघों के वकील इस गंभीर विषय पर अपने मुवक्किलों से पूरी जानकारी और निर्देश प्राप्त करें।
पदाधिकारियों की सेवा शर्तों पर अदालत की सख्त नजर
शीर्ष अदालत में यह अहम सुनवाई कुछ क्रिकेट इकाइयों द्वारा दाखिल की गई याचिकाओं पर हो रही थी। मुख्य न्यायाधीश के साथ-साथ इस पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं। सुनवाई के दौरान अदालत का मुख्य फोकस बीसीसीआई और राज्य क्रिकेट संघों के तमाम पदाधिकारियों की सेवा शर्तों और उनके कार्यकाल पर था। अदालत ने जानना चाहा कि इन पदों पर बैठे लोगों के काम करने के नियम और शर्तें नए नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट के प्रावधानों के तहत क्यों नहीं संचालित होनी चाहिए। वकीलों को इस मामले में अपना पक्ष रखने और जरूरी निर्देश लेने के लिए कहा गया है ताकि अगली सुनवाई में इस पर स्पष्ट रुख सामने आ सके।
पुराना है क्रिकेट सुधारों का यह कानूनी सफर
भारतीय क्रिकेट प्रशासन में पारदर्शिता और सुधार लाने का यह कानूनी संघर्ष नया नहीं है। इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल किए जाने के साथ हुई थी। इसके बाद से लगातार अलग-अलग मौकों पर अदालत के सामने आवेदन आते रहे हैं और क्रिकेट बोर्ड के कामकाज पर नजर रखी जाती रही है। स्थिति को सुधारने के लिए अतीत में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता में एक विशेष समिति का गठन भी किया था। इस समिति का मुख्य दायित्व बोर्ड के कामकाज में पारदर्शिता लाना और एक नए संविधान का ढांचा तैयार करना था, जिसने आगे चलकर भारतीय क्रिकेट प्रशासन की रूपरेखा तय करने में अहम भूमिका निभाई।
लोढ़ा समिति की सिफारिशों और कूलिंग ऑफ पीरियड का असर
आरएम लोढ़ा समिति की तमाम सिफारिशों को सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया था, जिनका मूल उद्देश्य क्रिकेट प्रशासन में मनमाने तरीकों को रोकना था। इसके बाद सितंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई के संविधान में अहम संशोधनों को भी अपनी मंजूरी दे दी थी। तय नियमों के अनुसार, कोई भी पदाधिकारी राज्य क्रिकेट संघ में 6 साल और बीसीसीआई में 6 साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद तीन साल के अनिवार्य कूलिंग ऑफ पीरियड पर जाता है। यानी कूलिंग ऑफ से पहले कोई भी व्यक्ति लगातार 12 साल तक पदों पर रह सकता है। नियमों के तहत लगातार दो कार्यकाल पूरे होने के बाद ब्रेक लेना जरूरी होता है, और अब अदालत यह जांच रही है कि नया नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट इन व्यवस्थाओं को कैसे प्रभावित करता है।



















