उत्तर प्रदेश के मेरठ में सामने आए चर्चित नीला ड्रम हत्याकांड में अदालत ने मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मृत्युदंड की सजा सुनाई है. सौरभ राजपूत की हत्या से जुड़े इस सनसनीखेज मामले में न्यायालय ने लगभग 13 महीने तक चली न्यायिक सुनवाई पूरी होने के पश्चात अपना अंतिम निर्णय सुनाया. हमारे देश में मौत की सजा का प्रावधान केवल अत्यंत दुर्लभ और जघन्य अपराधों के मामलों में ही लागू किया जाता है, जिसके कारण यह न्यायिक फैसला पूरे देश में व्यापक चर्चा का केंद्र बन गया है. इस महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम के परिप्रेक्ष्य में यह समझना बेहद प्रासंगिक हो जाता है कि भारत के अलावा विश्व के अन्य प्रमुख राष्ट्रों में गंभीर अपराधों के दोषियों को मृत्युदंड देने के लिए कौन से कानूनी तौर-तरीके अपनाए जाते हैं.
भारतीय कानूनी व्यवस्था में मृत्युदंड की रूपरेखा
भारत में सामान्य आपराधिक न्याय प्रणाली के अंतर्गत मृत्युदंड के क्रियान्वयन के लिए फांसी पर लटकाने का वैधानिक नियम है. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 393(5) के कानूनी प्रावधानों के मुताबिक, अदालत द्वारा जब किसी दोषी को मौत की सजा सुनाई जाती है, तो औपचारिक आदेश में यह स्पष्ट निर्देश दर्ज होता है कि दोषी को तब तक गले के फंदे से लटका कर रखा जाए जब तक कि उसकी सांसें पूरी तरह थम न जाएं. देश के कानून के तहत मृत्युदंड की व्यवस्था केवल असाधारण और बेहद संगीन अपराधों तक ही सीमित रखी गई है. ऐतिहासिक आंकड़ों के संदर्भ में देखें तो स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से अब तक भारत में 720 अपराधियों को फांसी के फंदे पर लटकाया जा चुका है. देश में फांसी की सबसे अंतिम तामील वर्ष 2020 में हुई थी, जब निर्भया मामले में संलिप्त पाए गए 4 दोषियों को फांसी दी गई थी.
अमेरिका में राज्यों के अनुसार निर्धारित कानूनी तरीके
संयुक्त राज्य अमेरिका में दोषियों को मौत की सजा देने की प्रक्रिया वहां के अलग-अलग राज्यों के स्थानीय कानूनों और नियमों पर निर्भर करती है. अमेरिकी व्यवस्था में सभी राज्यों के भीतर मृत्युदंड का प्रावधान लागू नहीं है और जिन राज्यों में यह वैधानिक रूप से मान्य है, वहां भी प्रक्रियाएं भिन्न हैं. वहां सबसे अधिक प्रचलित और प्रमुख तरीका लीथल इंजेक्शन यानी जानलेवा रासायनिक सुई का माना जाता है. इसके अतिरिक्त कई राज्यों के कानूनी प्रावधानों में बिजली की कुर्सी, गोलियां दागने वाले फायरिंग स्क्वॉड, प्राणघातक गैस चैंबर और हाल के समय में नाइट्रोजन गैस के जरिए दम घोंटने जैसी प्रणालियां भी शामिल की गई हैं.
चीन में मृत्युदंड के तरीके और गोपनीय आंकड़े
चीन में गंभीर अपराधों के मामलों में दोषियों को मृत्युदंड देने के लिए मुख्य रूप से दो प्रक्रियाओं का इस्तेमाल किया जाता है, जिनमें जानलेवा इंजेक्शन लगाना और गोली मारना शामिल हैं. हालांकि, चीनी शासन व्यवस्था में मृत्युदंड की सजा और उसके क्रियान्वयन से जुड़े आधिकारिक आंकड़े कभी भी सार्वजनिक मंचों पर उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं. इस गोपनीयता के कारण वहां हर वर्ष कितने अपराधियों को मौत की सजा सुनाई जाती है और दोनों में से किस तरीके को कितनी बार अपनाया गया, इसका कोई सटीक या निष्पक्ष मूल्यांकन करना हमेशा से एक कठिन चुनौती बना रहता है.
जापान में फांसी की परंपरा और पारदर्शिता का मुद्दा
दुनिया के अत्यंत विकसित देशों की सूची में शामिल जापान उन चुनिंदा उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है जहां आज भी मृत्युदंड की कानूनी व्यवस्था को बरकरार रखा गया है. जापानी न्याय प्रणाली में दोषियों को मृत्युदंड देने के लिए फांसी पर लटकाने का ही नियम अपनाया जाता है. हालांकि, वहां इस पूरी प्रक्रिया के संचालन, उसमें पारदर्शिता के स्तर और सजा दिए जाने से पहले कैदियों को दी जाने वाली पूर्व सूचना के तौर-तरीकों को लेकर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समूहों द्वारा समय-समय पर गंभीर आपत्तियां उठाई जाती रही हैं.
सऊदी अरब में सिर कलम करने की सजा
सऊदी अरब में मृत्युदंड की सजा देने के लिए ऐतिहासिक रूप से सिर कलम करने की प्रथा लंबे समय से अमल में लाई जाती रही है. एमनेस्टी इंटरनेशनल के 2025 के ताजा विवरणों के अनुसार, वहां सिर कलम करने के अलावा गोली मारकर मौत की सजा दिए जाने की घटनाओं का भी उल्लेख मिलता है. सऊदी अरब में मृत्युदंड के व्यापक प्रयोग तथा जिन विभिन्न अपराध श्रेणियों के लिए यह कठोर सजा मुकर्रर की जाती है, उन पर वैश्विक मानवाधिकार संस्थाएं निरंतर अपनी गहरी चिंता व्यक्त करती आई हैं.
ईरान में फांसी और सार्वजनिक दंड का चलन
ईरान की कानूनी व्यवस्था में मृत्युदंड के तहत दोषियों को फांसी के फंदे पर लटकाने का नियम प्रचलित है. एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा वर्ष 2025 में दर्ज किए गए रिकॉर्ड के मुताबिक, ईरान में कुछ मामलों में सार्वजनिक रूप से लोगों के सामने मृत्युदंड दिए जाने के उदाहरण भी सामने आए हैं. विश्व भर के मानवाधिकार संगठन वहां मृत्युदंड की संख्या में लगातार हो रही वृद्धि, मुकदमों के दौरान निष्पक्ष सुनवाई से जुड़ी कमियों और पूरी न्यायिक प्रक्रिया में स्पष्टता तथा पारदर्शिता के अभाव पर निरंतर सवाल उठाते रहे हैं.



















