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फलस्तीनी अस्मिता को कला देने वाले मशहूर चित्रकार स्लीमान मंसूर का 79 साल की उम्र में निधन, बीरज़ीत में अंतिम विदाईकल्चर
26 अग॰ 2026, 10:57 pm (63 दिन पहले)· 3

फलस्तीनी अस्मिता को कला देने वाले मशहूर चित्रकार स्लीमान मंसूर का 79 साल की उम्र में निधन, बीरज़ीत में अंतिम विदाई

मशहूर फलस्तीनी चित्रकार स्लीमान मंसूर का 79 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। कब्जे वाले वेस्ट बैंक के बीरज़ीत शहर में स्थित एक चर्च में आयोजित अंतिम संस्कार में सैकड़ों लोग उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचे।

कब्जे वाले वेस्ट बैंक में रामल्लाह के पास स्थित बीरज़ीत शहर का एक चर्च शोक संतप्त लोगों से पटा हुआ था, जब फलस्तीनी कला जगत के पुरोधा स्लीमान मंसूर को अंतिम विदाई दी गई। 79 वर्ष की आयु में इस दुनिया से रुखसत होने वाले मंसूर को उनकी उस चित्रकारी के लिए हमेशा याद किया जाएगा, जिसने फलस्तीनी राष्ट्रीय चेतना और अपनी मिट्टी से जुड़ाव को नए मायने दिए। उनके अंतिम संस्कार में कला, साहित्य और नागरिक समाज से जुड़ी तमाम हस्तियां उन्हें श्रद्धांजलि देने एकत्र हुईं।

मंसूर की चित्रकारी में फलस्तीन के प्राकृतिक सौंदर्य और संघर्षरत जीवन का गहरा समागम दिखता है। उनके कैनवास पर जैतून के बगीचे, संतरे के बाग और पारंपरिक वस्त्रों में सजे स्थानीय लोग अक्सर नजर आते थे। उनकी रचनाओं ने दुनिया भर में फैले फलस्तीनी समुदाय को एकजुट करने और अपनी जमीन से अपनी जड़ों के अटूट रिश्ते को दर्ज करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।

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कैनवास पर उकेरा गया संघर्ष और सांस्कृतिक प्रतीक

स्लीमान मंसूर की सबसे ऐतिहासिक कलाकृतियों में से एक 1973 में बनाई गई 'कैमल ऑफ हार्डशिप' है। इस मशहूर पेंटिंग में एक बुजुर्ग कुली को दिखाया गया है, जो अपनी पीठ पर येरुशलम शहर और सुनहरे गुंबद वाले 'डोम ऑफ द रॉक' के विशाल बोझ को उठाए हुए है। यह पेंटिंग फलस्तीनी विस्थापन और अपनी जड़ों को थामे रखने की जिजीविषा का वैश्विक प्रतीक बन गई। इसके अलावा, 1987 में तैयार की गई उनकी रचना 'वुमन फ्रॉम बेथलेहम' में उनकी अपनी पत्नी की झलक दिखाई देती है, जो पारंपरिक परिधान में सजगता और स्वाभिमान का संदेश देती है।

उनकी एक और चर्चित कृति 2014 की 'ऑरेंज फील्ड्स' नामक तीन हिस्सों वाली पेंटिंग है। इसमें जाफ़ा के समुद्र तट की पृष्ठभूमि में संतरे की टोकरी उठाए दो फलस्तीनी महिलाओं और पेड़ों से फल चुनती अन्य महिलाओं को दर्शाया गया है। यह रचना न केवल कृषि जीवन का उत्सव मनाती है, बल्कि उस खोए हुए भूभाग की याद भी दिलाती है जो फलस्तीनियों की ऐतिहासिक स्मृति में रसा-बसा है।

उनकी सहयोगी और साथी कलाकार वेरा तमारी ने उनके योगदान को याद करते हुए कहा, "वह वास्तव में मुख्य फलस्तीनी कलाकार थे, जो स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे अधिक जाने जाते थे।" तमारी के अनुसार, मंसूर का लक्ष्य दुनिया को यह संदेश देना था कि फलस्तीनी लोग अपनी सरजमीं में बेहद गहराई से रचे-बसे हैं। उन्होंने पारंपरिक कसीदाकारी वाले 'सोब' पोशाक में सजी महिलाओं को चित्रित कर सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत बनाए रखा।

1947 की त्रासदी और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का सफर

स्लीमान मंसूर का जन्म 1947 में ब्रिटिश मैंडेट फलस्तीन के बीरज़ीत गांव में हुआ था। यह वह दौर था जब इजराइल राज्य की स्थापना और पहला अरब-इजराइल युद्ध बेहद करीब था। 1948 के इस संघर्ष के दौरान 7 लाख से अधिक फलस्तीनियों को उनके घरों से बेदखल कर दिया गया या उन्हें भागने पर मजबूर होना पड़ा, जिसे फलस्तीनी इतिहास में 'नकबा' यानी महाविपत्ति कहा जाता है। इस विस्थापन और तबाही के माहौल ने युवा मंसूर के मन पर गहरी छाप छोड़ी।

आगे चलकर मंसूर ने येरुशलम में ललित कला (फाइन आर्ट्स) की पढ़ाई की। पढ़ाई के दौरान उन्हें अहसास हुआ कि फलस्तीनी कलाकार एक तरह की सांस्कृतिक अलगाव की स्थिति में जी रहे हैं। इस दौरान मैक्सिकन भित्ति चित्रकार डिएगो रिवेरा की कृतियों पर आधारित एक किताब ने उनके नजरिए को काफी प्रभावित किया। उन्होंने कला को केवल दीवानों तक सीमित रखने के बजाय आम जनता के अधिकार का जरिया बनाने का फैसला किया।

मंसूर ने फलस्तीन में एक स्थानीय कला आंदोलन की नींव रखी। उन्होंने 'लीग ऑफ फलस्तीनियन आर्टिस्ट्स' और 'इंटरनेशनल एकेडमी ऑफ आर्ट' की सह-स्थापना की, साथ ही स्थानीय आर्ट गैलरी खोलने में मदद की। कैनवास पेंटिंग के अलावा उन्होंने कार्टून बनाए, बच्चों की किताबों के लिए चित्र उकेरे और कई पुस्तकें भी लिखीं। एक शिक्षक के रूप में उन्होंने नई पीढ़ी के दर्जनों कलाकारों को प्रेरित किया।

इजराइली सेंसरशिप और प्राकृतिक सामग्रियों से कला की क्रांति

फलस्तीनी कला का राजनीतिक संदेश अक्सर कब्जे वाले वेस्ट बैंक में इजराइली सुरक्षा बलों की आंखों में खटकता था। 1970 और 1980 के दशकों के दौरान इजराइली सैनिक मंसूर की पेंटिंग्स के पोस्टरों और पोस्टकार्डों को जब्त कर लेते थे और उन्हें बेचने वाले दुकानदारों को गिरफ्तार कर लिया करते थे। जब रामल्लाह में 'गैलरी 79' नाम से एक नया कला केंद्र खोला गया, तो सैनिक हर नई प्रदर्शनी के उद्घाटन पर पहुंच जाते थे और जो भी चित्र उन्हें नापसंद आता, उसे उठाकर ले जाते थे।

इस दमन का सामना करने के लिए मंसूर और उनके साथियों ने प्रतीकात्मक कला शैली विकसित की, ताकि आम लोग तो उसका संदेश समझ सकें लेकिन गश्त लगा रहे सैनिक उसे भांप न पाएं। 1987 में जब पहला 'इंतिफादा' या जनआंदोलन शुरू हुआ, तो मंसूर ने वेरा तमारी और अन्य कलाकारों के साथ मिलकर 'न्यू विजन' नाम से एक नया कला समूह बनाया।

इस समूह ने इजराइल में बने तेल और एक्रिलिक रंगों जैसी सामग्रियों का पूरी तरह बहिष्कार करने का निर्णय लिया। इसके बजाय उन्होंने अपनी धरती से जुड़ते हुए मिट्टी, पुआल और मेंहदी जैसे प्राकृतिक तत्वों को कला का माध्यम बनाया। मंसूर ने मिट्टी और पुआल को मिलाकर दरारों वाली सतहों का निर्माण करने की तकनीक में महारत हासिल की। यह दरारें इतिहास, समय के थपेड़ों और फलस्तीन की जमीन में जमी हुई पुरानी जड़ों की याद दिलाती थीं।

वैश्विक पहचान, सादगी और विचारों की विरासत

अक्सर देखा जाता है कि बड़े कलाकारों की कृतियां केवल अमीर खरीदारों के घरों तक सीमित रह जाती हैं, लेकिन मंसूर ने हमेशा अपनी पेंटिंग्स को प्रिंट्स के रूप में भारी संख्या में छापने का समर्थन किया। वह चाहते थे कि उनकी कला आम फलस्तीनियों के घरों और शरणार्थी शिविरों की दीवारों तक पहुंचे। फलस्तीनी संग्रहालय के महानिदेशक और दृश्य कलाकार आमेर शोमाली ने उन्हें याद करते हुए कहा, "वह एक ऐसे फलस्तीन का निर्माण करने वाले मास्टरमाइंड थे जो हम सभी फलस्तीनियों को एकजुट करता है, जिसकी हम लालसा रखते हैं और जिसमें जीने के लिए हम काम करते हैं।"

सीरिया के एक शरणार्थी शिविर में पले-बढ़े शोमाली ने बताया कि बचपन में उनके कमरे की दीवार पर मंसूर के दो पोस्टर लगे हुए थे। मंसूर की यही सोच थी कि कला हर उस व्यक्ति तक पहुंचे जो उसे अपनी भावना का हिस्सा मानता है। आज उनकी मूल कलाकृतियां दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रदर्शित हैं, जिनमें अबू धाबी का गुगेनहाइम म्यूजियम, दोहा का मथाफ: अरब म्यूजियम ऑफ मॉडर्न आर्ट, पेरिस का इंस्टीट्यूट दू मोंडे अराबे और लंदन का ब्रिटिश म्यूजियम शामिल हैं।

मंसूर की सादगी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके कैनवास भले ही अंतरराष्ट्रीय नीलामियों में लाखों डॉलर में बिकते थे, लेकिन जब उन्होंने फलस्तीनी संग्रहालय के लिए एक विशाल भित्तिचित्र (म्यूरल) तैयार किया, तो उन्होंने पारिश्रमिक के तौर पर केवल एक अंजीर का पेड़ मांगा ताकि उसे संग्रहालय के बगीचे में लगाया जा सके। उनके निधन के साथ ही फलस्तीनी कला के एक सुनहरे युग का अंत हो गया है, लेकिन उनके बनाए चित्र और विचार भावी पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे।

सवाल-जवाब

स्लीमान मंसूर कौन थे?
स्लीमान मंसूर एक प्रसिद्ध फलस्तीनी दृश्य कलाकार और चित्रकार थे, जिन्हें फलस्तीनी संस्कृति, परिदृश्य और राष्ट्रीय पहचान को अपने कैनवास पर उकेरने के लिए जाना जाता था।
स्लीमान मंसूर का निधन किस उम्र में हुआ?
स्लीमान मंसूर का निधन 79 वर्ष की आयु में हुआ, और उनका अंतिम संस्कार वेस्ट बैंक के बीरज़ीत में संपन्न हुआ।
उनकी सबसे प्रसिद्ध पेंटिंग कौन सी है?
उनकी सबसे मशहूर पेंटिंग 1973 में बनाई गई 'कैमल ऑफ हार्डशिप' है, जिसमें एक कुली अपनी पीठ पर येरुशलम और डोम ऑफ द रॉक को उठाए हुए दिखता है।
पहला इंतिफादा के दौरान उन्होंने किस नई कला शैली को अपनाया?
1987 के पहले इंतिफादा के दौरान उन्होंने इजराइली सामानों के बहिष्कार के तहत पेंट की जगह स्थानीय मिट्टी, पुआल और मेंहदी जैसी प्राकृतिक सामग्रियों से पेंटिंग्स बनाना शुरू किया।
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