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शाही महिलाओं की सैरगाह से मुगल फौज के पड़ाव तक, यह है हैदराबाद के गोशामहल की चार सौ साल पुरानी दास्तानकल्चर
8 सित॰ 2026, 1:27 pm (50 दिन पहले)· 2

शाही महिलाओं की सैरगाह से मुगल फौज के पड़ाव तक, यह है हैदराबाद के गोशामहल की चार सौ साल पुरानी दास्तान

हैदराबाद के गोशामहल इलाके में कभी करीब 1,000 हॉल वाला एक शाही परिसर हुआ करता था, जो कुतुबशाही दौर में शाही महिलाओं के लिए बनाया गया था। सल्तनत बदलने के साथ यह महल खंडहर में तब्दील हो गया, मगर इसकी बारादरी आज भी हैदराबाद के गौरवशाली अतीत की गवाह बनकर खड़ी है।

हैदराबाद में चारमीनार और गोलकुंडा किले की चर्चा तो खूब होती है, लेकिन शहर के बीचोंबीच बसा गोशामहल इलाका अपने भीतर सत्ता के उतार-चढ़ाव की एक अलग ही कहानी छुपाए बैठा है। आज यहां भीड़भाड़ वाली सड़कें और ट्रैफिक नजर आता है, मगर करीब चार सौ साल पहले इसी जगह एक शानदार शाही महल खड़ा था, जिसने कई सल्तनतों का उदय और पतन अपनी आंखों से देखा। यह कहानी उसी गुमनाम हो चुके महल की है और उसके उस हिस्से की, जो आज भी बचा हुआ है।

नाम के पीछे की वजह

उर्दू और फारसी भाषा में गोशा शब्द का अर्थ एकांत या पर्दे में रहना बताया जाता है। कुतुबशाही शासन के दौरान यह परिसर खासतौर पर शाही परिवार की महिलाओं के आराम और निजी समय बिताने के लिए बनवाया गया था, ताकि वे बिना किसी रोकटोक के यहां वक्त गुजार सकें। उस दौर के शाही रीति-रिवाजों को देखते हुए महिलाओं का इलाका आम नजरों से दूर और सुरक्षित रखा जाता था। यही वजह रही कि पूरे परिसर के साथ-साथ आसपास का इलाका भी गोशामहल के नाम से पहचाना जाने लगा।

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करीब 1000 हॉल वाला शाही परिसर

इतिहास से जुड़े दस्तावेज बताते हैं कि यह कोई मामूली इमारत नहीं थी। महल के अंदर लगभग एक हजार हॉल, हरे-भरे बगीचे और बीचोबीच एक बड़ा तालाब हुआ करता था। इसका निर्माण सुल्तान अब्दुल्लाह कुतुब शाह के कार्यकाल में शुरू हुआ और कुतुबशाही खानदान के आखिरी हुक्मरान अबुल हसन तानाशाह के दौर में जाकर यह इमारत पूरी तरह तैयार हुई। यानी एक ही सल्तनत के कई शासकों के कार्यकाल में इसका निर्माण चलता रहा, जो इस प्रोजेक्ट की अहमियत खुद बयां करता है।

औरंगजेब की फौज और सल्तनत का अंत

साल 1687 में मुगल बादशाह औरंगजेब की सेना ने गोलकुंडा किले पर कब्जा जमा लिया, जिसके साथ ही कुतुबशाही सल्तनत हमेशा के लिए खत्म हो गई। सत्ता बदलने का सीधा असर गोशामहल पर भी दिखा। दक्कन में मुहिम चलाते समय औरंगजेब के बेटे शाह आलम ने इसी परिसर में अपना डेरा जमाया था, जिसके बाद यह जगह सैनिक कामकाज और मुगल दरबार की गतिविधियों से जुड़ गई। इस तरह महिलाओं के लिए बनी एक निजी सैरगाह मुगल सल्तनत के सैन्य ढांचे का हिस्सा बन गई।

खंडहर से बारादरी तक का सफर

मुगलों के बाद हैदराबाद में निज़ामों की हुकूमत आई, तब तक इस भव्य महल का ज्यादातर हिस्सा खंडहर बन चुका था, सिर्फ इसकी बारादरी सलामत बची रह गई। 1931 में शहर के फ्रीमेसंस संगठन ने निज़ाम सरकार के सामने इस बारादरी का इस्तेमाल करने की मांग रखी। इसके बाद इमारत की मरम्मत का काम हुआ और 8 फरवरी 1933 को इसे विधिवत रूप से सामाजिक व जनकल्याण से जुड़ी गतिविधियों के लिए खोल दिया गया। इस तरह गोलकुंडा की फतह के करीब ढाई सौ साल बाद यह जगह शाही सैरगाह से खंडहर होते हुए सार्वजनिक इस्तेमाल की इमारत बन गई। वक्त ने भले ही इस विशाल महल के बड़े हिस्से को मिटा दिया हो, लेकिन बची हुई बारादरी आज भी हैदराबाद के गौरवशाली अतीत की गवाह बनकर खड़ी है।

सवाल-जवाब

गोशामहल नाम का मतलब क्या है?
उर्दू-फारसी में गोशा का मतलब एकांत या पर्दे में रहना है, यह परिसर शाही महिलाओं के लिए निजी सैरगाह के तौर पर बनाया गया था।
महल में कितने हॉल थे?
ऐतिहासिक दस्तावेजों के मुताबिक महल में करीब 1,000 हॉल, बगीचे और एक बड़ा तालाब हुआ करता था।
महल का निर्माण किसके समय शुरू और पूरा हुआ?
निर्माण सुल्तान अब्दुल्लाह कुतुब शाह के कार्यकाल में शुरू हुआ और कुतुबशाही खानदान के आखिरी शासक अबुल हसन तानाशाह के दौर में पूरा हुआ।
कुतुबशाही सल्तनत का अंत कब और कैसे हुआ?
साल 1687 में औरंगजेब की सेना ने गोलकुंडा किले पर कब्जा कर लिया, जिससे कुतुबशाही सल्तनत खत्म हो गई।
मुगल दौर में गोशामहल का इस्तेमाल किसलिए हुआ?
दक्कन अभियान के दौरान औरंगजेब के बेटे शाह आलम ने यहां डेरा डाला था, जिसके बाद यह सैनिक कामकाज और मुगल दरबार की गतिविधियों से जुड़ गया।
आज गोशामहल परिसर की क्या स्थिति है?
महल का ज्यादातर हिस्सा खंडहर बन चुका है, लेकिन इसकी बारादरी आज भी मौजूद है।
बारादरी को नया जीवन कैसे मिला?
1931 में फ्रीमेसंस संगठन ने निज़ाम सरकार से इजाजत मांगी और मरम्मत के बाद 8 फरवरी 1933 को इसे सामाजिक गतिविधियों के लिए खोल दिया गया।
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