राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में हवा की गुणवत्ता लगातार खतरनाक स्तर पर बनी हुई है, जिससे आम जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस मसले पर सर्वोच्च अदालत में हुई सुनवाई के दौरान प्रदूषण के असर की तुलना हर दिन 30 सिगरेट पीने से होने वाले नुकसान से की गई। दिल्ली और आसपास के इलाकों में बिगड़ते हालात पर अदालत में लंबी और गंभीर बहस देखने को मिली।
पुराने उपायों और पाबंदियों पर अदालत की नाराजगी
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने प्रदूषण से निपटने के लिए प्रशासन द्वारा अपनाए जा रहे पारंपरिक तरीकों पर कड़े सवाल खड़े किए। उन्होंने दो टूक कहा कि केवल गाड़ियों की आवाजाही पर रोक लगा देना या निर्माण कार्यों पर प्रतिबंध लगा देना पुराने और नाकाम हो चुके तरीके हैं। इस तरह के कदमों से हर साल प्रदूषण बढ़ने पर कुछ दिनों की मोहलत तो मिल जाती है, लेकिन इससे समस्या का कोई स्थायी और ठोस समाधान नहीं निकलता है। अदालत ने केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों से यह तीखा सवाल भी किया कि आखिर प्रदूषण की जड़ पर कब से काम शुरू होगा। किसानों के मुद्दों से लेकर गाड़ियों के धुएं और सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था तक कई अहम बिंदुओं पर विस्तृत सवाल-जवाब किए गए।
तीन सदस्यीय पीठ कर रही है मामलों की सुनवाई
दिल्ली-NCR में खतरनाक वायु प्रदूषण के मामलों की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की एक विशेष तीन सदस्यीय पीठ कर रही है। इस पीठ में मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के साथ-साथ जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं। अदालत की सहायता कर रही वरिष्ठ वकील और एमिकस क्यूरी अपराजिता सिंह ने अदालत को बताया कि दिल्ली की हवा इस समय गंभीर श्रेणी के आसपास बनी हुई है। हालात इतने ज्यादा बदतर हो चुके हैं कि लोगों की सेहत और उनकी आवाज तक पर इसका बुरा असर पड़ रहा है। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि मौजूदा हवा में सांस लेना ऐसा है जैसे कोई व्यक्ति हर रोज 30 सिगरेट पी रहा हो। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि हालांकि हाल ही में हुई बारिश की वजह से प्रदूषण के स्तर में कुछ हद तक गिरावट जरूर दर्ज की गई है। सुनवाई के दौरान इस बात पर भी सहमति बनी कि पराली जलाना इस संकट का एक हिस्सा जरूर है, लेकिन परिवहन और स्थानीय कारणों जैसे अन्य पहलुओं पर भी उतनी ही सख्ती और गंभीरता से काम करने की जरूरत है।
तात्कालिक पाबंदियों से नहीं निकलेगा स्थायी हल
अदालत का मुख्य जोर इस बात पर था कि केवल कागजी या फौरी पाबंदियों से काम नहीं चलने वाला है। बार-बार वही पुरानी पाबंदियां थोप देना अब कारगर साबित नहीं हो रहा है। वाहनों के पहिये थाम देना और निर्माण गतिविधियों को रातों-रात रोक देना केवल एक तात्कालिक राहत देने वाला मैकेनिज्म है। इससे लंबी अवधि में कोई स्थायी समाधान नहीं निकल सकता। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि प्रदूषण पैदा करने वाले तमाम अलग-अलग स्रोतों की सटीक पहचान की जानी चाहिए और उन पर लगातार निगरानी रखते हुए काम करना चाहिए।
पराली और अन्य प्रदूषण स्रोतों का गणित
केंद्र सरकार की तरफ से पक्ष रखते हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को आंकड़े दिए कि 5 दिसंबर को दिल्ली के कुल प्रदूषण में पराली जलाने की हिस्सेदारी करीब 14 फीसदी दर्ज की गई थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि दिल्ली का स्थानीय प्रदूषण पहले से ही बहुत ज्यादा है और पराली का धुआं इस खराब स्थिति को और अधिक गंभीर बना देता है। इस पर एमिकस क्यूरी अपराजिता सिंह ने भी अपनी बात रखते हुए कहा कि सड़कों पर दौड़ती गाड़ियां इस समस्या का सबसे बड़ा और प्रमुख कारण हैं। इसके अलावा औद्योगिक ईंधन के उत्पादन और कचरा जलाने जैसी गतिविधियों पर भी उतनी ही मुस्तैदी से ध्यान केंद्रित करना जरूरी है।
मशीनों के बावजूद किसानों के सामने व्यावहारिक मुश्किलें
सुनवाई के दौरान यह मुद्दा भी उठाया गया कि भले ही किसानों को पराली प्रबंधन के लिए तमाम मशीनें मुहैया करा दी गई हों, लेकिन जमीन स्तर पर अभी भी कई बड़ी व्यावहारिक दिक्कतें बनी हुई हैं। किसानों के पास इन भारी-भरकम मशीनों को चलाने के लिए पर्याप्त मात्रा में ईंधन उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा मौजूदा साल में ईंधन की कीमतें भी काफी ज्यादा चल रही हैं। छोटे आकार के खेतों में इन मशीनों का उपयोग करना आर्थिक रूप से किसानों के लिए फायदेमंद सौदा साबित नहीं होता है। इन तमाम दिक्कतों को देखते हुए अदालत ने एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया कि ये मशीनें व्यक्तिगत किसानों के बजाय सीधे ग्राम पंचायतों को दी जानी चाहिए ताकि गांव के कई किसान मिलकर सामूहिक रूप से इनका इस्तेमाल कर सकें।
खरीद मूल्य पहले तय करने और भंडारण का सुझाव
अदालत ने यह भी सुझाव दिया कि पराली की खरीद के लिए दरें पहले से ही तय करके सार्वजनिक रूप से घोषित की जानी चाहिए। किसानों को इस बात के लिए प्रेरित और जागरूक करना होगा कि पराली को खेतों में जलाने के बजाय उसे सही दाम पर बेचने या उसका अन्य उपयोग करने में उनका आर्थिक फायदा है। सर्वोच्च न्यायालय ने इसके भंडारण के लिए उचित व्यवस्थाएं बनाने पर भी जोर दिया। इससे पराली को सुरक्षित तरीके से जमा करने और उससे किसानों के लिए कमाई के नए रास्ते खुलने की संभावना बनेगी।
वाहनों की लंबी कतारें और टोल प्लाजा पर चिंता
मुख्य न्यायाधीश ने दिल्ली और आसपास के NCR क्षेत्रों को जोड़ने वाली प्रमुख सड़कों पर गाड़ियों की लंबी कतारों और लगने वाले भारी जाम पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की कमी भी इस संकट को और ज्यादा हवा दे रही है। अपराजिता सिंह ने अदालत को जानकारी दी कि टोल प्लाजा पर वाहनों को अपने इंजन चालू रखकर लंबी कतारों में खड़े रहने से रोकने के संबंध में पहले जो निर्देश दिए गए थे, उनका जमीन पर पूरी तरह पालन नहीं हो रहा है। NCR के विभिन्न इलाकों से आने वाली गाड़ियां अक्सर सीमाओं पर ही रुकी रहती हैं, जिससे वहां प्रदूषण का स्तर तेजी से बढ़ता है। सरकार की तरफ से भी इस बात को स्वीकार किया गया कि इन तमाम दिशा-निर्देशों को पूरी तरह से लागू करने का काम अभी तक मुकम्मल नहीं हो पाया है।



















