प्रदर्शनों के दौरान दिल्ली पुलिस के व्यवहार और जांच में ढिलाई को लेकर उच्चतम न्यायालय ने सख्त रुख अपनाया है। मामले की सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने साफ कहा कि शिकायतों की प्रतीक्षा में अनिश्चितकाल तक मामला नहीं लटकाया जा सकता। अदालत ने पुलिस पर लगे बर्बरता और ज्यादती के आरोपों के संबंध में बनाई गई हाई-पावर्ड कमेटी को स्पष्ट निर्देश देते हुए किसी भी तरह की देरी से इनकार कर दिया है।
एक महीने की समयसीमा और रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश
अदालत ने उच्चस्तरीय समिति को निर्देश दिया है कि वह एक महीने की समयसीमा के भीतर अपनी पहली फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट तैयार करके सौंपे। पीठ ने कहा कि अब तक जो भी सामग्री या साक्ष्य सामने आए हैं, उनकी गहनता से जांच की जाए। इसके साथ ही संबंधित पुलिस अधिकारियों से उनका पक्ष भी मांगा जाना आवश्यक है। अदालत ने समिति को निर्देश दिया है कि वह प्राथमिकता पर रखे गए दो मुख्य मुद्दों पर अपनी रिपोर्टिंग तुरंत शुरू करे।
पीड़ितों का व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना अनिवार्य नहीं
इस सुनवाई का एक प्रमुख पहलू यह रहा कि पीड़ितों पर समिति के सामने व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का कोई दबाव नहीं रहेगा। यदि अधिवक्ताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं या आम नागरिकों द्वारा कोई दस्तावेज, याचिकाएं, वीडियो या डिजिटल साक्ष्य जमा कराए गए हैं, तो समिति को उन्हें अपनी जांच में शामिल करना होगा। इसका अर्थ यह है कि भौतिक उपस्थिति के बिना भी साक्ष्यों के आधार पर जांच आगे बढ़ाई जाएगी।
अक्टूबर की रिपोर्ट पर नाराजगी और अगली सुनवाई
शीर्ष अदालत ने 31 अक्टूबर को सौंपी गई कमेटी की रिपोर्ट पर अपनी टिप्पणी में कहा कि वह केवल एक स्टेटस रिपोर्ट मात्र थी। उसमें पुलिस ज्यादती के गंभीर आरोपों पर कोई ठोस या अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला गया था। सीजेआई ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच के दौरान सामने आए निष्कर्षों को आम तौर पर सभी पक्षों के साथ साझा किया जाना चाहिए, हालांकि असाधारण परिस्थितियों में गोपनीयता बनाई रखी जा सकती है। शीर्ष अदालत इस पूरे मामले पर दो हफ्ते बाद पुनः सुनवाई करेगी, जबकि समिति को अपनी पहली विस्तृत रिपोर्ट एक महीने में दाखिल करनी होगी।























