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दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ से संसद तक, छात्र राजनीति की वह नर्सरी जिसने देश को दिए दिग्गज राजनेतादिल्ली
19 सित॰ 2026, 12:33 pm (2 घंटे पहले)· 1

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ से संसद तक, छात्र राजनीति की वह नर्सरी जिसने देश को दिए दिग्गज राजनेता

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव केवल कॉलेज स्तर का मुकाबला नहीं बल्कि भारतीय मुख्यधारा की राजनीति की प्रभावी नर्सरी रहा है, जिसने अरुण जेटली और अजय माकन जैसे राष्ट्रीय नेता गढ़े।

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (DUSU) के चुनावों की अपनी एक समृद्ध और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि रही है, जिसकी चर्चा केवल राष्ट्रीय राजधानी तक सीमित न रहकर पूरे देश के राजनीतिक गलियारों में सुनाई देती है। इसे भारतीय राजनीति की सबसे उर्वर नर्सरी माना जाता है, क्योंकि यह महज कुछ महाविद्यालयों के प्रतिनिधियों के चयन का वार्षिक उत्सव भर नहीं है। दिल्ली विश्वविद्यालय का यह चुनावी मंच वास्तव में देश की राजनीति का वह पहला मजबूत पायदान साबित हुआ है, जिसने राष्ट्रीय परिदृश्य पर नीति और दिशा तय करने वाले कई प्रभावशाली व्यक्तित्व दिए हैं। यहां होने वाले मतदान केवल छात्रसंघ के पदाधिकारियों का चुनाव नहीं करते, बल्कि भविष्य के केंद्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और संसद के प्रमुख रणनीतिकारों के राजनीतिक जीवन की आधारशिला रखते हैं।

डीयू के नॉर्थ और साउथ कैंपस के रास्तों पर कभी पैम्फलेट बांटने वाले, नारों से माहौल गरमाने वाले और नुक्कड़ सभाओं में घंटों भाषण देने वाले कई साधारण युवा आगे चलकर राष्ट्रीय सत्ता के शीर्ष पदों पर आसीन हुए हैं। चुनावी इतिहास इस बात का प्रमाण है कि दिल्ली विश्वविद्यालय का यह अखाड़ा भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक व्यावहारिक प्रशिक्षण केंद्र बनकर उभरा है। चाहे केंद्र सरकार में वित्त मंत्रालय जैसे विशाल विभाग की जिम्मेदारी संभालना हो, देश के खेल तंत्र का नेतृत्व करना हो या फिर विभिन्न राज्यों के प्रशासन का संचालन करना हो, इस संस्थान की राजनीतिक प्रयोगशाला ने समय-समय पर देश को सशक्त नेतृत्व प्रदान किया है।

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राष्ट्रीय राजनीति को दिशा देने वाले प्रमुख चेहरे

दिल्ली विश्वविद्यालय के क्लासरूम और हॉस्टलों से निकलकर देश की संसद के उच्च और निम्न सदन तक पहुंचने वाले नेताओं की फेहरिस्त अत्यंत प्रभावशाली है। इनमें अरुण जेटली, अजय माकन, विजय गोयल, अलका लांबा और रेखा गुप्ता जैसे नाम प्रमुखता से शामिल हैं। इन सभी नेताओं ने अपने सार्वजनिक जीवन के बुनियादी सबक विश्वविद्यालय की इसी सक्रिय राजनीति के बीच सीखे और आगे चलकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की।

अरुण जेटली से लेकर अजय माकन की शुरुआती यात्रा

जब भी डीयू की छात्र राजनीति के इतिहास की समीक्षा की जाती है, तो उसमें सबसे पहला और सम्मानित नाम दिवंगत अरुण जेटली का उभरता है। उन्होंने प्रतिष्ठित श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) में अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त करते हुए साल 1974 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के उम्मीदवार के तौर पर छात्रसंघ अध्यक्ष पद का चुनाव जीता था। देश में आपातकाल के दौर में विभिन्न छात्र आंदोलनों के बीच अपने नेतृत्व को धार देने वाले जेटली ने बाद के वर्षों में भारत सरकार के वित्त मंत्री, रक्षा मंत्री और राज्यसभा में सदन के नेता जैसे अत्यंत गरिमामय और नीतिगत पदों का कार्यभार संभाला।

इसी प्रकार हंसराज कॉलेज के पूर्व छात्र अजय माकन ने साल 1985 में केवल 21 वर्ष की युवावस्था में नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) के बैनर तले छात्रसंघ अध्यक्ष पद जीतकर एक नया रिकॉर्ड बनाया था। छात्र राजनीति से शुरुआत करने वाले माकन बाद में दिल्ली सरकार में कैबिनेट मंत्री बने और केंद्र की यूपीए सरकार के कार्यकाल में केंद्रीय खेल मंत्री तथा आवास एवं शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्री जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार संभाला।

विजय गोयल और अलका लांबा के संघर्ष और उपलब्धियां

साल 1977-78 के दौरान एबीवीपी के प्रत्याशी के रूप में छात्रसंघ अध्यक्ष चुने गए विजय गोयल ने भी अपने व्यापक राजनीतिक जीवन की नींव इसी परिसर में रखी थी। दिल्ली विश्वविद्यालय के गलियारों से निकले विजय गोयल ने आगे चलकर केंद्र की वाजपेयी सरकार और उसके बाद मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री के रूप में कई प्रशासनिक दायित्वों का निर्वहन किया।

दूसरी ओर साल 1995 में एनएसयूआई की ओर से भारी जनसमर्थन के साथ छात्रसंघ अध्यक्ष निर्वाचित हुईं अलका लांबा अपने ओजस्वी और मुखर भाषणों के चलते पूरे विश्वविद्यालय में खासी लोकप्रिय महिला नेता बनीं। परिसर के मुद्दों पर आवाज उठाने वाली अलका लांबा ने बाद में विधायी राजनीति में कदम रखते हुए विधायक का चुनाव जीता और ऑल इंडिया महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद तक का सफर तय किया।

रेखा गुप्ता और परिसर से उभरे अन्य चर्चित व्यक्तित्व

दौलत राम कॉलेज की पूर्व छात्रा रेखा गुप्ता ने साल 1996-97 में एबीवीपी के टिकट पर छात्रसंघ अध्यक्ष का चुनाव अपने नाम किया था। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने महिला छात्राओं की सुरक्षा, परिसर की सुविधाओं और छात्रावास आवंटन जैसे जमीनी मुद्दों को प्रमुखता के साथ उठाया था। उन्होंने आगे चलकर मुख्यधारा की सक्रिय राजनीति में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई और महत्वपूर्ण संगठनात्मक दायित्व संभाले।

इसके अतिरिक्त साल 1991 के ऐतिहासिक मंडल आयोग विरोध प्रदर्शनों का प्रमुख चेहरा रहे राजीव गोस्वामी, नूपुर शर्मा, रागिनी नायक और छात्रसंघ के सबसे पहले अध्यक्ष रहे गजराज बहादुर नागर (जिन्होंने आगे चलकर हरियाणा सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में कार्य किया) जैसे कई प्रमुख नाम इसी प्रतिष्ठित संस्थान की छात्र राजनीति की देन हैं।

परिसर की चुनावी चमक और लोकतांत्रिक सार्थकता

डीयू में जब युवा छात्र लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं, तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि यह चुनाव केवल प्रचार सामग्री, पोस्टरबाजी या बड़े दावों का प्रदर्शन नहीं है। यह मंच युवाओं के भीतर नीतिगत समझ, संवाद कौशल और नेतृत्व क्षमता विकसित करने का एक वास्तविक अवसर प्रदान करता है, जिससे वे देश के समक्ष मौजूद बड़ी सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हो सकें। विश्वविद्यालय के इन खुले मैदानों और नुक्कड़ों से शुरू हुआ यह सफर रेखांकित करता है कि जो छात्र आज चाय की टपरी पर किसी विचार या मुद्दे पर गहन विमर्श कर रहा है, वह कल संसद में देश की जनता के लिए कानून और नीतियां तैयार कर सकता है।

सवाल-जवाब

डूसू (DUSU) को भारतीय राजनीति की नर्सरी क्यों कहा जाता है?
डूसू से निकले कई छात्र नेता आगे चलकर देश के केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री और सांसद बने, इसलिए इसे राजनीति की नर्सरी कहा जाता है।
अरुण जेटली ने डूसू अध्यक्ष का चुनाव कब और किस पार्टी से जीता था?
अरुण जेटली ने साल 1974 में एबीवीपी (ABVP) के टिकट पर डूसू अध्यक्ष पद का चुनाव जीता था।
अजय माकन ने किस उम्र में डूसू अध्यक्ष बनकर रिकॉर्ड बनाया था?
अजय माकन ने साल 1985 में केवल 21 साल की उम्र में एनएसयूआई (NSUI) के बैनर तले डूसू अध्यक्ष का चुनाव जीता था।
डूसू के पहले अध्यक्ष कौन थे और उन्होंने बाद में क्या पद संभाला?
गजराज बहादुर नागर डूसू के पहले अध्यक्ष थे और वे आगे चलकर हरियाणा सरकार में कैबिनेट मंत्री बने।
रेखा गुप्ता ने डूसू में किस वर्ष जीत हासिल की और उनके मुख्य मुद्दे क्या थे?
रेखा गुप्ता ने 1996-97 में एबीवीपी से जीत दर्ज की थी और उन्होंने छात्राओं की सुरक्षा तथा हॉस्टल के मुद्दों को उठाया था।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·1 घंटे पहले

दिल्ली विश्वविद्यालय के ये छात्र चुनाव महज परिसर की राजनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह राष्ट्रीय नेतृत्व तैयार करने की एक ऐसी प्रयोगशाला हैं जिसका प्रभाव सीधे देश की संसद और शासन व्यवस्था पर दिखता है। आपातकाल जैसे दौर से लेकर आज के राजनीतिक परिदृश्य तक, परिसरों से निकले इन युवा चेहरों ने नीति निर्माण और प्रशासनिक संचालन में अपनी एक विशिष्ट छाप छोड़ी है, जो यह साबित करती है कि जमीनी स्तर की यह सक्रियता भविष्य के बड़े रणनीतिकार गढ़ने में सबसे अहम भूमिका निभाती है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

अपराध और न्याय व्यवस्था की बीट पर काम करते हुए यह स्पष्ट होता है कि परिसरों की यह राजनीति केवल वैचारिक बहस तक सीमित नहीं है, बल्कि विधि और व्यवस्था, सार्वजनिक सुरक्षा तथा चुनावी विधिक मामलों की भी पहली पाठशाला है। आपातकाल से लेकर वर्तमान चुनावी विवादों तक, परिसरों के ये संघर्ष भविष्य के उन नीति-निर्माताओं को गढ़ते हैं जिन्हें आगे चलकर देश के आपराधिक कानूनों, संवैधानिक मामलों और जटिल प्रशासनिक चुनौतियों से निपटना होता है।

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