अंतरराष्ट्रीय व्यापार कूटनीति के मोर्चे पर वाशिंगटन की सख्त नीतियों को लेकर लगातार नई बहस छिड़ी हुई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से भारत पर आयात शुल्क को सौ फीसदी तक बढ़ाने की चेतावनियों के बीच नई दिल्ली के पास अपने आर्थिक हितों की रक्षा करने के लिए कई अहम कूटनीतिक और व्यापारिक विकल्प मौजूद हैं। दरअसल, अमेरिकी प्रशासन पहले भी रूसी संघ के साथ कारोबारी रिश्तों को लेकर भारत पर शुल्क और दंडात्मक कदम उठा चुका है। बीते वर्ष भी वाशिंगटन ने पच्चीस फीसदी पेनाल्टी लगाते हुए मास्को के साथ व्यापारिक साझेदारी खत्म करने का दबाव बनाया था। इस टकराव की मुख्य वजह ऊर्जा सुरक्षा है, क्योंकि भारत अपनी कुल घरेलू तेल जरूरतों का लगभग आधा हिस्सा रूस से आयात करता है। यह स्थिति वाशिंगटन को रास नहीं आ रही है और इसी वजह से डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर व्यापारिक दबाव बनाने की रणनीति शुरू कर दी है। ऐसे में कई ऐसे रणनीतिक रास्ते सामने आते हैं जिनके जरिए संभावित शुल्कों के असर को सीमित किया जा सकता है।
वाशिंगटन के साथ अनुकूल व्यापार समझौता
पहला संभावित रास्ता द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर सहमति बनाना है, जिसकी कोशिशों में डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से लगे हुए हैं। अमेरिकी प्रशासन की स्पष्ट मंशा रही है कि भारत पर शुल्क का दबाव डालकर अपनी शर्तों के मुताबिक एक व्यापक व्यापार समझौता किया जाए। यही कारण है कि अमेरिकी राष्ट्रपति लगातार भारी शुल्क लगाने की चेतावनियां दोहराते रहते हैं। यदि दोनों देशों के बीच औपचारिक व्यापार समझौता आकार लेता है, तो भारतीय उत्पादों को अमेरिकी बाजारों में आसान और शुल्क मुक्त पहुंच मिल सकती है। इससे सौ फीसदी शुल्क से पूरी छूट मिलने अथवा इसकी दरों में उल्लेखनीय कटौती की गुंजाइश बन जाएगी। हालांकि, इस दिशा में आगे बढ़ते समय नई दिल्ली को बेहद सतर्क रहने की जरूरत होगी, क्योंकि वाशिंगटन बदले में अपने डेयरी और कृषि उत्पादों को भारतीय बाजारों में उतारने के लिए लगातार कड़ा दबाव बना रहा है, जिससे घरेलू उत्पादकों के हितों पर असर पड़ सकता है।
रूसी कच्चे तेल पर निर्भरता घटाना
संभावित सौ फीसदी शुल्क से बचने का दूसरा तरीका वही है जिसकी मांग डोनाल्ड ट्रंप लगातार कर रहे हैं, यानी भारत मास्को के साथ अपने कारोबारी संबंध पूरी तरह समाप्त कर दे। अमेरिकी राष्ट्रपति कई बार सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं कि भारत को रूस से कच्चा तेल खरीदना तुरंत बंद कर देना चाहिए और इसके स्थान पर अमेरिका, पश्चिम एशिया तथा अफ्रीकी देशों से आपूर्ति लेनी चाहिए। यदि भारत इस मांग को स्वीकार करता है तो वाशिंगटन का शुल्क संबंधी दबाव काफी हद तक घट जाएगा। लेकिन इस फैसले से भारत के लिए ऊर्जा आयात काफी महंगा हो सकता है। वर्तमान में भारत लगभग बयालीस देशों से कच्चे तेल की खरीद कर रहा है, मगर रियायती दरों के चलते कुल आयात में सबसे बड़ी हिस्सेदारी रूस की ही बनी हुई है, जिसे अचानक छोड़ना आर्थिक दृष्टि से नुकसानदेह हो सकता है।
संवेदनशील उत्पादों पर शुल्क छूट की मांग
असर को कम करने का एक अन्य व्यावहारिक उपाय यह है कि भारत चुनिंदा जरूरी सामानों पर विशेष छूट की औपचारिक अपील करे। इस सूची में जीवनरक्षक दवाएं, इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पाद और आवश्यक औद्योगिक उपकरण शामिल हो सकते हैं। चूंकि इन वस्तुओं की भारी आवश्यकता स्वयं अमेरिकी अर्थव्यवस्था और वहां के नागरिकों को भी है, इसलिए जनहित और मुद्रास्फीति को ध्यान में रखते हुए वाशिंगटन इन आयातों पर राहत देने पर विचार कर सकता है। अमेरिका आज भी सस्ती जेनेरिक दवाओं के लिए बहुत बड़े पैमाने पर भारत की आपूर्ति पर निर्भर है। यही प्रमुख कारण था कि जब पूर्व में भी डोनाल्ड ट्रंप ने दंडात्मक शुल्क लगाए थे, तब फार्मास्युटिकल क्षेत्र को इन पाबंदियों से पूरी तरह बाहर रखा गया था।
अमेरिकी निगमों के लिए निवेश नियमों में ढील
भारत अपने यहां अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए प्रत्यक्ष निवेश के नियमों को और अधिक सरल बनाकर भी इस दबाव को हल्का कर सकता है। उदाहरण के तौर पर, भारत को ऐपल जैसी प्रमुख तकनीकी कंपनियों के स्थानीय विनिर्माण और वहां से अमेरिका को होने वाले निर्यात के बीच एक मजबूत संतुलन बनाकर चलना होगा। यदि अमेरिकी दिग्गजों की विनिर्माण निर्भरता भारत पर बढ़ती है, तो वाशिंगटन पर भी कारोबारी संबंध सामान्य बनाए रखने का दबाव बनेगा। हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप के रुख को देखते हुए यह कदम भी चुनौतियों से भरा है, क्योंकि वे अक्सर इस बात पर नाराजगी जताते रहे हैं कि अमेरिकी कंपनियां अपने देश के बजाय भारत में निवेश कर रही हैं। उन्होंने हाल के दिनों में अपनी घरेलू कंपनियों को भी इस बारे में चेताया था, इसलिए इस रास्ते पर बहुत सूझबूझ से आगे बढ़ना होगा।
द्विपक्षीय व्यापार घाटे को कम करना
अमेरिकी प्रशासन द्वारा शुल्क का पूरा चक्रव्यूह तैयार करने के पीछे एक बड़ा कारण यह है कि भारत अन्य देशों के बजाय अमेरिकी वस्तुओं की अधिक खरीद करे। वर्तमान समय में अमेरिका को भारत के साथ लगभग नब्बे अरब डॉलर के भारी व्यापार घाटे का सामना करना पड़ रहा है, जिसे डोनाल्ड ट्रंप किसी भी कीमत पर कम करना चाहते हैं। उनकी मांग है कि भारत वाशिंगटन से तरल प्राकृतिक गैस यानी एलएनजी, कच्चा तेल, वाणिज्यिक व सैन्य विमान, आधुनिक रक्षा उपकरण, औद्योगिक मशीनरी और कृषि उत्पादों का आयात बढ़ाए। यदि भारत इन क्षेत्रों में अमेरिकी खरीद को गति देता है, तो व्यापार संतुलन सुधरने से वाशिंगटन की ओर से शुल्कों में राहत मिलने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।
वैश्विक व्यापार का विविधीकरण
छठा महत्वपूर्ण विकल्प यह है कि भारत वाशिंगटन पर अपनी निर्भरता घटाते हुए अपने व्यापार का व्यापक विविधीकरण करे और दुनिया के अन्य प्रमुख आर्थिक केंद्रों के साथ रिश्ते मजबूत करे। भारत पहले से ही मुक्त व्यापार समझौतों के माध्यम से कई क्षेत्रों के साथ अपने संबंधों का विस्तार कर रहा है। इनमें यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, कनाडा, पश्चिम एशिया और प्रमुख एशियाई देश शामिल हैं। इन वैकल्पिक बाजारों के विस्तार से भारतीय निर्यातकों की केवल अमेरिका पर निर्भर रहने की मजबूरी समाप्त होगी और शुल्क का झटका काफी हद तक निष्प्रभावी हो जाएगा। भारत तेजी से इस विकल्प पर आगे बढ़ रहा है, लेकिन हकीकत यह भी है कि अमेरिका वर्तमान में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना हुआ है, इसलिए रातोंरात उसका पूर्ण विकल्प तैयार करना संभव नहीं है और इसमें काफी समय लग सकता है।
विश्व व्यापार संगठन का दरवाजा खटखटाना
अंत में, भारत के पास कानूनी और बहुपक्षीय मंचों का सहारा लेने का विकल्प भी मौजूद है। भारत चाहे तो अमेरिकी शुल्कों की वैधता को सीधे विश्व व्यापार संगठन यानी डब्ल्यूटीओ में चुनौती दे सकता है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरणों में कानूनी प्रक्रिया बेहद धीमी और जटिल होती है, जिसके चलते फैसले आने में वर्षों लग जाते हैं। यह कानूनी रास्ता मौजूदा संकट और व्यापारिक नुकसान से फौरी तौर पर कोई राहत नहीं दिला सकता। यही व्यावहारिक कारण है कि नई दिल्ली ने अब तक अमेरिकी शुल्कों के खिलाफ डब्ल्यूटीओ में सीधी औपचारिक शिकायत दर्ज कराने से परहेज किया है।


















