शाकाहारी खानपान में सोया चंक्स यानी मील मेकर का इस्तेमाल बहुत आम है। बिरयानी से लेकर मसालेदार ग्रेवी तक, कई व्यंजनों में इसका उपयोग किया जाता है। पकने के बाद इसका स्पंजी टेक्सचर और बनावट कई लोगों को मांसाहारी भोजन जैसा अहसास कराती है। इस वजह से अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या इसे बनाने में किसी नॉनवेज सामग्री का उपयोग होता है। असलियत यह है कि सामान्य सोया चंक्स पूरी तरह पौधों से मिलने वाले सोयाबीन से तैयार किए जाते हैं। साबुत सोयाबीन को सीधे काटकर यह उत्पाद नहीं बनता, बल्कि इसके पीछे एक लंबी औद्योगिक प्रक्रिया होती है।
फैक्ट्री में सोयाबीन की सफाई और नमी नियंत्रण
इस पूरी निर्माण श्रृंखला की शुरुआत कच्चे सोयाबीन से होती है। जब सोयाबीन ट्रकों या बोरियों में फैक्टरी पहुंचता है, तो उसमें धूल, मिट्टी, छोटे कंकर और अन्य प्रकार की अशुद्धियां हो सकती हैं। प्रोसेसिंग शुरू करने से पहले हाई-स्पीड मशीनों की सहायता से इस पूरी सामग्री को अच्छी तरह साफ किया जाता है। इसके बाद जरूरत के अनुसार सोयाबीन की नमी को नियंत्रित किया जाता है और उसके बाहरी छिलके को अलग कर दिया जाता है। यह प्रारंभिक चरण बहुत जरूरी माना जाता है क्योंकि अंतिम उत्पाद की गुणवत्ता काफी हद तक इस शुरुआती सफाई पर टिकी होती है।
सोयाबीन से तेल को अलग करने की प्रक्रिया
इसके बाद एक अहम चरण आता है, जहां सोयाबीन को सीधे पीसकर इस्तेमाल नहीं किया जाता है। सबसे पहले सोयाबीन के अंदर मौजूद तेल को बाहर निकाला जाता है। औद्योगिक इकाइयों में तेल निष्कर्षण के लिए विभिन्न आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जाता है। जब सोयाबीन से सारा तेल अलग हो जाता है, तो पीछे बचा हुआ हिस्सा प्रोटीन से भरपूर होता है। यही तेल रहित सोया सामग्री आगे चलकर मील मेकर और अन्य सोया उत्पादों को तैयार करने के मुख्य कच्चे माल के रूप में काम आती है।
डिफैटेड सोया फ्लोर और पानी का मिश्रण
तेल निकाल दिए जाने के बाद बची हुई ठोस सोया सामग्री को बारीक पीसकर आटे के रूप में बदल दिया जाता है। इस विशेष पाउडर को उद्योग जगत में डिफैटेड सोया फ्लोर कहा जाता है। अब इस सोया आटे को एक निश्चित अनुपात में पानी के साथ मिलाया जाता है। पानी मिलाने का मुख्य उद्देश्य इस मिश्रण में सही मात्रा में नमी लाना होता है, ताकि अगली मशीनें इसे आसानी से ढाल सकें। इस स्टेज पर यह मिश्रण उन छोटे और स्पंजी टुकड़ों जैसा बिल्कुल नजर नहीं आता जिन्हें हम बाजार से खरीदकर लाते हैं।
एक्सट्रूजन मशीन और स्पंजी टेक्सचर का राज
अब इस प्रक्रिया का सबसे अहम हिस्सा शुरू होता है, जिसे एक्सट्रूजन कहा जाता है। तैयार किए गए गीले सोया मिश्रण को एक्सट्रूडर नाम की एक भारी-भरकम मशीन से गुजारा जाता है। मशीन के भीतर इस मिश्रण को नियंत्रित तापमान, गर्मी और उच्च दबाव की स्थिति से गुजरना पड़ता है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान सोया प्रोटीन के आणविक ढांचे में बदलाव आता है, जिससे एक खास प्रकार का लचीलापन पैदा होता है। यही वह तकनीक है जो सोया चंक्स को उसका परिचित स्पंजी और चबाने योग्य रूप देती है। इसी बनावट की वजह से कई लोग इसे खाने में मीट जैसा महसूस करते हैं, हालांकि इसमें किसी भी तरह के मांसाहारी उत्पाद का इस्तेमाल नहीं होता है। फिर भी, बाजार से कोई भी पैकबंद उत्पाद खरीदते समय उसके पीछे लिखे इंग्रेडिएंट्स को जरूर पढ़ना चाहिए क्योंकि कुछ ब्रांड अतिरिक्त सामग्रियां मिला सकते हैं।
आकार देना, सुखाना और पैकिंग
एक्सट्रूजन प्रक्रिया पूरी होने के बाद गर्म सोया सामग्री को अलग-अलग सांचों से गुजारकर विभिन्न आकार दिए जाते हैं। यही कारण है कि बाजार में आपको छोटे नगेट्स, बड़े चंक्स और अन्य बनावट वाले सोया उत्पाद आसानी से मिल जाते हैं। मनचाहा आकार मिलने के बाद इन टुकड़ों को ड्रायर्स की मदद से अच्छी तरह सुखाया जाता है। नमी की मात्रा लगभग खत्म हो जाने के कारण पैकेट के अंदर मिलने वाला मील मेकर बेहद हल्का, सूखा और सख्त महसूस होता है। इसी सूखी हुई अवस्था में इसकी एयर-टाइट पैकिंग करके देश भर के बाजारों में भेजा जाता है।
घर पर पकाने का तरीका और उपयोग
रसोई घर में इस्तेमाल करने से पहले जब इन सूखे सोया चंक्स को गर्म पानी में डाला जाता है, तो कुछ ही मिनटों में इनके आकार में बड़ा बदलाव आ जाता है। कड़े और छोटे टुकड़े पानी को सोखकर काफी बड़े, स्पंजी और मुलायम हो जाते हैं। इनकी यही स्पंजी बनावट मसालों और ग्रेवी के स्वाद को अपने अंदर अच्छी तरह सोखने में मदद करती है। पानी में उबालने या भिगोने के बाद इसे हल्के हाथों से निचोड़कर अतिरिक्त पानी बाहर निकाल दिया जाता है। इसके बाद इसे मसालेदार ग्रेवी, पुलाव, बिरयानी, मंचूरियन या अन्य व्यंजनों में आसानी से पकाया जा सकता है।
सोया से बने इन उत्पादों को मुख्य रूप से उनके उच्च प्रोटीन की वजह से पसंद किया जाता है। तेल निकालने के बाद बचे हुए डिफैटेड सोया हिस्से में प्रोटीन की मात्रा बहुत अधिक होती है। इसके अलावा इसमें कार्बोहाइड्रेट, डाइटरी फाइबर, कम मात्रा में वसा और कुछ जरूरी खनिज भी मौजूद होते हैं। हालांकि यह जरूरी नहीं है कि हर ब्रांड के पैकेट में पोषण का स्तर बिल्कुल एक जैसा हो। इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री और प्रोसेसिंग के तरीकों में अंतर के कारण न्यूट्रिशन वैल्यू बदल सकती है। इसलिए केवल विज्ञापनों या सामान्य दावों पर भरोसा करने के बजाय पैकेट पर छपे पोषण चार्ट और घटकों की सूची को ध्यान से देखना बेहतर रहता है।
एक और सवाल जो अक्सर लोगों के मन में आता है कि सोयाबीन की तुलना में मील मेकर काफी सस्ता क्यों बिकता है। इसकी वजह यह है कि जब फैक्टरी में सोयाबीन को प्रोसेस किया जाता है, तो उससे केवल सोया चंक्स ही नहीं बनते। मुख्य रूप से सोयाबीन से महंगा सोया तेल निकाला जाता है, जिसे बाजार में अलग उत्पाद के रूप में बेचा जाता है। तेल निकालने के बाद जो प्रोटीन युक्त हिस्सा बच जाता है, उससे यह किफायती खाद्य उत्पाद तैयार होता है। यही कारण है कि साबुत सोयाबीन की सीधी तुलना मील मेकर के पैकेट की कीमत से नहीं की जा सकती है।



















