हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के एक छोटे से गांव किहरी से एक प्रेरणादायक खबर सामने आई है। यहां की बेटी प्रियंका ने NEET की परीक्षा पास कर ली है और अब वह अपने गांव की पहली डॉक्टर बनने की दिशा में बढ़ चुकी हैं, वह भी तब जब घर की माली हालत बेहद कमजोर है और मां महज 6000 रुपये महीना कमाकर परिवार चला रही हैं।
किहरी गांव की बेटी की बड़ी उपलब्धि
प्रियंका थियोग से करीब 8 किलोमीटर दूर बसे किहरी गांव की रहने वाली हैं। हाल ही में उन्होंने NEET का एग्जाम दिया था और इसमें 533 अंक हासिल किए। SC कैटेगिरी में उनकी ऑल इंडिया रैंक 1608 आई है। इसी उपलब्धि के साथ प्रियंका अपने गांव की पहली ऐसी बेटी बन गई हैं, जो डॉक्टर बनने की राह पर निकल पड़ी हैं।
स्कूल में टॉपर से लेकर मेडिकल की राह तक
प्रियंका ने अपनी दसवीं की पढ़ाई किहरी के इसी सरकारी स्कूल से पूरी की थी, जहां उनकी मां काम करती हैं। इसके बाद उन्होंने थियोग के गर्ल्स स्कूल में दाखिला लिया। बायोलॉजी विषय में उन्होंने 12वीं में 100 में से पूरे 100 अंक हासिल किए और थियोग स्कूल के मेडिकल स्ट्रीम में टॉप किया। इस बार उन्होंने पहली ही कोशिश में NEET पास किया है, लेकिन इससे पहले लीक हो चुके एक और NEET एग्जाम में भी वह सफल रही थीं, जिसमें उन्होंने 612 अंक हासिल किए थे, जो मौजूदा स्कोर से भी बेहतर था।
पिता का साया नहीं, मां के भरोसे परवरिश
प्रियंका के पिता संजीव का करीब पांच साल पहले निधन हो गया था। उसके बाद से घर की जिम्मेदारी मां रेखा के कंधों पर आ गई। रेखा थियोग के सरकारी स्कूल किहरी में मल्टी टास्क वर्कर के तौर पर काम करती हैं और इसी नौकरी से महीने के 6000 रुपये कमाती हैं। प्रियंका के दो भाई हैं और दोनों उनसे बड़े हैं। इतनी कम कमाई में तीन बच्चों की पढ़ाई और घर चलाना आसान नहीं था, लेकिन मां ने हार नहीं मानी।
दो टीचरों ने बदल दी बेटी की किस्मत
प्रियंका की इस कामयाबी के पीछे मां के अलावा दो टीचरों की मेहनत का भी बड़ा हाथ है। स्कूल के हेडमास्टर रमेश नेगी और लेक्चरर प्रकाश शर्मा ने आर्थिक तंगी को उनकी पढ़ाई के आड़े नहीं आने दिया। प्रकाश शर्मा बताते हैं कि प्रियंका पढ़ाई में बेहद तेज थी, लेकिन घर के हालात ठीक नहीं थे। इसके बाद उन्होंने हेडमास्टर नेगी के साथ मिलकर शिमला के निजी कोचिंग संस्थान एस्पायर से बात की और संस्थान ने बेटी को मुफ्त कोचिंग देना मंजूर किया। इतना ही नहीं, रमेश नेगी और प्रकाश शर्मा ने प्रियंका के हॉस्टल में रहने का करीब 9 हजार रुपये का खर्च भी खुद उठाया। प्रियंका ने शिमला में मीडिया से बातचीत में कहा, "अगर ये टीचर न होते, तो मैं आज इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाती।"
एक साल जो जानकारी के अभाव में यूं ही निकल गया
प्रकाश शर्मा फिलहाल शिमला के लालपानी स्कूल में बायोलॉजी पढ़ाते हैं, लेकिन पिछले साल तक वह थियोग स्कूल में ही तैनात थे, जहां प्रियंका पढ़ती थीं। वह बताते हैं कि पिछले साल जानकारी न होने की वजह से प्रियंका NEET का एग्जाम ही नहीं दे पाई थीं। जब यह बात टीचरों को पता चली, तो उन्होंने प्रियंका से एक साल ड्रॉप करने और फिर कोचिंग के लिए तैयारी करने पर बातचीत की। इसके बाद शिमला के एस्पायर कोचिंग संस्थान ने मुफ्त कोचिंग देने की हामी भरी और एक महीने की हॉस्टल फीस भी माफ कर दी। प्रकाश शर्मा यह भी बताते हैं कि परिवार शुरुआत में बेटी को बीएससी करवाना चाहता था, क्योंकि उनके पास इतनी जानकारी और संसाधन नहीं थे कि उसे डॉक्टर बनाने की राह दिखा सकें।
आगे की पढ़ाई के लिए भी बना इंतजाम
प्रियंका ने NEET तो पास कर लिया, लेकिन आगे एमबीबीएस की पढ़ाई की फीस को लेकर पूछे जाने पर प्रकाश शर्मा कहते हैं कि इसका भी रास्ता निकाल लिया गया है। वह "उड़ान" नाम से एक ग्रुप चलाते हैं, जिससे कई सदस्य जुड़े हुए हैं। इस ग्रुप में कोई सदस्य फीस का जिम्मा उठाता है, तो कोई हॉस्टल का खर्च, और बाकी लोग थोड़ी-थोड़ी मदद करते रहते हैं। इसी सामूहिक मदद के भरोसे प्रियंका की आगे की पढ़ाई का रास्ता भी खुल गया है।
मां की आंखों में खुशी के आंसू
शिमला में मीडिया से बातचीत करते हुए प्रियंका की मां रेखा ने बताया कि उनके तीन बच्चे हैं और तीनों ही होशियार हैं और उनकी बात मानते हैं। बेटी की इस कामयाबी को देखकर मां काफी भावुक नजर आईं। एक सरकारी स्कूल की मामूली तनख्वाह वाली नौकरी करने वाली मां के लिए बेटी का डॉक्टर बनने की दहलीज तक पहुंचना किसी सपने के सच होने जैसा है।




















