अक्सर अभिभावक इस बात से संतुष्ट हो जाते हैं कि उनका बेटा या बेटी किताब के पन्ने बिना किसी रुकावट के सरपट पढ़ रहे हैं। हालांकि केवल गति के साथ पढ़ना ही पर्याप्त नहीं होता है, बल्कि मुख्य सवाल यह होता है कि विद्यार्थी ने पाठ से क्या ग्रहण किया है। कई बार छात्र पूरा पाठ खत्म कर लेते हैं, मगर जब उनसे उसकी विषय वस्तु के बारे में सवाल किए जाते हैं, तो वे सही उत्तर देने में असमर्थ रहते हैं।
इस स्थिति को रीडिंग कॉम्प्रिहेंशन यानी पढ़कर अर्थ ग्रहण करने की क्षमता की कमी के रूप में देखा जाता है। पठन प्रक्रिया के दौरान केवल शब्दों को देखकर उनका उच्चारण करना ही काफी नहीं होता, बल्कि उनके गहरे निहितार्थ को भी समझना जरूरी होता है। बच्चे को यह भी आंकना होता है कि विभिन्न पंक्तियां एक-दूसरे से किस प्रकार जुड़ी हैं और संपूर्ण अध्याय का केंद्रीय भाव क्या है। यदि कोई बच्चा शब्द पहचान लेता है किंतु उसका तात्पर्य नहीं समझ पाता है, तो आने वाले शैक्षणिक वर्षों में उसे कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
छात्रों के लिए एक समृद्ध शब्दावली का होना बेहद आवश्यक माना गया है। यदि पठन सामग्री में कई अपरिचित शब्द आ जाते हैं और विद्यार्थी उनसे अनजान होता है, तो उसका पूरा ध्यान केवल उन कठिन शब्दों पर अटक जाता है। ऐसी परिस्थितियों में वह पूरे वाक्य या अनुच्छेद के मूल संदेश को समझने में पिछड़ जाता है और उसकी एकाग्रता प्रभावित होती है।
इसलिए अभिभावकों को केवल पन्ने पलटने के बजाय बच्चों को हर नए शब्द का अर्थ स्पष्ट करना चाहिए। पाठन के दौरान बीच-बीच में बच्चों से यह चर्चा करनी चाहिए कि किसी विशेष पंक्ति का क्या तात्पर्य है या अब तक कथा में क्या घटनाक्रम रहा है।
एक्टिव रीडिंग से बढ़ती है समझने की क्षमता
विद्यार्थियों में पठन और बोध कौशल को बेहतर बनाने के लिए एक्टिव रीडिंग बेहद कारगर साबित हो सकती है। इसका सीधा मतलब यह है कि बच्चे को केवल मौन पाठन करने के लिए अकेला छोड़ने के बजाय उससे पाठ्य सामग्री से जुड़े विभिन्न प्रश्न किए जाएं।
उदाहरण के तौर पर, बच्चों से यह पूछा जा सकता है कि उस प्रसंग में कौन पात्र था, क्या घटना घटी, ऐसा क्यों हुआ और इसके पश्चात क्या परिणाम सामने आ सकते हैं। इस प्रकार की जिज्ञासाएं बच्चे को केवल यांत्रिक रूप से शब्द पढ़ने के बजाय उनके पीछे छिपे अर्थ पर विचार करने के लिए विवश करती हैं।
अपने शब्दों में बयां करने का अभ्यास
किसी भी कहानी या पाठ को पूरा पढ़ने के बाद बच्चे को प्रेरित करें कि वह अपनी भाषा में समझाए कि उसने क्या ज्ञान प्राप्त किया है। यदि वह संपूर्ण विवरण देने में असफल रहता है, तो उसे हतोत्साहित करने या डांटने के बजाय दोबारा पठन करने का अवसर प्रदान किया जाना चाहिए। घर पर अध्ययन के लिए प्रतिदिन एक निश्चित समय निर्धारित करना भी फायदेमंद साबित होता है। माता-पिता को स्वयं भी बच्चों के साथ बैठकर पुस्तकें पढ़नी चाहिए और उन पर संवाद करना चाहिए। इससे बच्चों का शब्द भंडार तो विस्तृत होता ही है, साथ ही पढ़ी गई सामग्री को आत्मसात करने और अपने विचार व्यक्त करने का आत्मविश्वास भी मजबूत होता है।



















