भारतीय मनोरंजन जगत में कुछ ऐसे चेहरे होते हैं जिनकी मौजूदगी पर्दे पर भले ही कुछ लम्हों की हो, मगर उनकी अदाकारी का असर दर्शकों के जेहन में हमेशा ताजा रहता है। वरिष्ठ अभिनेता अरुण बाली ऐसे ही फनकारों में शुमार रहे, जिन्होंने अपने चार दशक के लंबे सफर में अनगिनत चरित्र भूमिकाओं को यादगार बना दिया। जब भी उनके अभिनय सफर का जिक्र छिड़ता है, तो कला और जीवन के उस बेहद भावुक संयोग की बात जरूर होती है जिसने हर किसी की आंखें नम कर दी थीं। जिस रोज उनकी आखिरी फीचर फिल्म सिनेमाघरों में दर्शकों के सामने पहुंची, ठीक उसी दिन उन्होंने इस नश्वर संसार को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। किसी भी समर्पित कलाकार की विदाई के लिए इससे अधिक मर्मस्पर्शी और मार्मिक इत्तेफाक शायद ही कभी देखा गया हो।
शुरुआती जीवन और रंगमंच की डगर पर पहला कदम
अरुण बाली का जन्म 23 दिसंबर 1942 को लाहौर में हुआ था। जीवन के शुरुआती दौर में उन्होंने शायद यह कल्पना भी नहीं की होगी कि भविष्य में अभिनय ही उनकी सबसे बड़ी पहचान और जिंदगी का मकसद बन जाएगा। सिनेमाई पर्दे पर कदम रखने से पहले उनका गहरा झुकाव रंगमंच की ओर हुआ। थिएटर की दुनिया ने उन्हें अभिनय की बारीकियां सीखने, संवाद अदायगी को तराशने और इंसानी जज्बातों की गहराई समझने का ठोस आधार दिया।
हालांकि मंच की यह शुरुआती राह उनके लिए कतई आसान नहीं रही थी। अपने एक शुरुआती नाटक के मंचन के दौरान वह अचानक बेहद घबरा गए और दर्शकों के सामने अपने तय डायलॉग पूरी तरह भूल बैठे। मंच पर हुई इस चूक के कारण सामने बैठे दर्शकों की तरफ से भी कोई अच्छी प्रतिक्रिया नहीं मिली। इस कड़वे तजुर्बे ने अरुण बाली को भीतर तक झकझोर दिया था और वह इतने हताश हो गए कि उन्होंने रंगमंच को हमेशा के लिए छोड़ने का फैसला तक कर लिया था।
भाई की सीख से मिली हिम्मत और हौसला
निराशा के उस मुश्किल दौर में उनके परिवार ने उनका हाथ थामा और सहारा दिया। उस वक्त उनके बड़े भाई ने उन्हें एक बेहद अनमोल सीख दी। भाई ने समझाया कि किसी तजुर्बेकार इंसान की डांट या आलोचना को अपनी शिकस्त मानने के बजाय एक बड़ी सीख के रूप में देखना चाहिए। इस एक बात ने अरुण बाली के भीतर नई ऊर्जा भर दी, उनका टूटा हुआ आत्मविश्वास फिर से लौट आया और उन्होंने अभिनय के रास्ते पर दोबारा मजबूती से कदम बढ़ा दिए।
दूरदर्शन के दौर से घर-घर बनी पहचान
साल 1989 में अरुण बाली ने सीरियल दूसरा केवल के जरिए छोटे पर्दे पर पहली बार दस्तक दी। इसके बाद वर्ष 1991 में प्रसारित ऐतिहासिक धारावाहिक चाणक्य में उनके सशक्त अभिनय को व्यापक स्तर पर सराहा गया। इसके बाद नीम का पेड़, स्वाभिमान और कुमकुम जैसे बेहद चर्चित धारावाहिकों ने उन्हें देश के हर घर का जाना-पहचाना नाम बना दिया।
उनकी बुलंद और गंभीर आवाज, प्रभावशाली कद-काठी और बेहद स्वाभाविक अभिनय शैली ने उन्हें दर्शकों का चहेता बना दिया। वह टेलीविजन के उन चुनिंदा कलाकारों में शामिल हो गए जिन्हें देखते ही लोग उनके द्वारा निभाए गए चरित्र के साथ आत्मीयता से जुड़ जाते थे।
बड़े पर्दे पर दमदार मौजूदगी का आगाज
टेलीविजन पर अपनी अमिट छाप छोड़ने के बाद अरुण बाली ने बड़े पर्दे का रुख किया। साल 1991 में रिलीज हुई फिल्म सौगंध के साथ उनका फिल्मी सफर शुरू हुआ। इसके बाद उन्होंने यलगार, राजू बन गया जेंटलमैन, फूल और अंगारे, खलनायक, सत्या और हे राम जैसी एक से बढ़कर एक फिल्मों में विविध प्रकार के चरित्र निभाए। उन्होंने कभी भी खुद को किसी खास किस्म के बंधे-बंधाए सांचे में कैद नहीं रखा, बल्कि हर बार नए अंदाज में सामने आए।
नई पीढ़ी के सिनेमा में भी बनाए रखा अपना मुकाम
बदलते दौर के साथ उन्होंने आधुनिक सिनेमा और नई पीढ़ी के दर्शकों के बीच भी अपनी मजबूत धाक बनाए रखी। लगे रहो मुन्नाभाई, 3 इडियट्स, बर्फी, पीके, केदारनाथ, पानीपत और लाल सिंह चड्ढा जैसी लोकप्रिय फिल्मों में उनके किरदारों को दर्शकों ने खूब सराहा। उनकी सबसे बड़ी खूबी यही थी कि स्क्रीन पर उनकी मौजूदगी चाहे चंद मिनटों की रही हो, मगर उनकी अदाकारी पूरी कहानी में अपना एक अलग वजन छोड़ जाती थी।
उम्र के अंतिम पड़ाव में भी उन्होंने कभी अभिनय से दूरी नहीं बनाई। स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों के बावजूद वह लगातार काम में सक्रिय रहे क्योंकि अदाकारी उनके लिए महज रोजी-रोटी का जरिया नहीं, बल्कि सांसों की तरह जिंदगी का अटूट हिस्सा थी।
7 अक्टूबर 2022 का वह भावुक संयोग
तारीख 7 अक्टूबर 2022 उनके प्रशंसकों और सिनेमा प्रेमियों के लिए बेहद गमगीन साबित हुई। इसी दिन उनकी आखिरी फिल्म गुडबाय सिनेमाघरों में रिलीज की गई थी और इसी तारीख को अरुण बाली ने अपनी अंतिम सांस ली। एक फनकार का अंतिम काम जिस दिन दुनिया के सामने आया, उसी दिन उस फनकार की सांसों की डोर टूट गई। भले ही वह आज सशरीर मौजूद न हों, लेकिन उनके निभाए किरदार सदैव भारतीय सिनेमा के पन्नों में जीवंत रहेंगे।



















