फ्रांस में शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़े वित्तीय संकट और आगामी राष्ट्रीय बजट में भारी कटौतियों के प्रस्ताव ने देश भर के किशोरों को सड़कों पर ला खड़ा किया है। लगभग दो सप्ताह पहले उत्तरी पेरिस के कम आय वाले इलाके सीन-सेंट-डेनिस से भड़की यह चिंगारी अब पूरे देश में फैल चुकी है। सैकड़ों हाई स्कूलों में तालाबंदी और नाकेबंदी के कारण सार्वजनिक जीवन पर गहरा असर पड़ा है, जबकि सरकार इसे केवल एक शैक्षणिक विवाद न मानकर एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक संकट के रूप में देख रही है। इस छात्र आंदोलन ने राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के प्रशासन को गहरी असहज स्थिति में डाल दिया है, खासकर तब जब देश में राष्ट्रपति चुनाव केवल कुछ महीने दूर हैं।
सड़कों पर छात्र और ऐतिहासिक संदर्भ
फ्रांसीसी राजनीति के आधुनिक इतिहास में युवाओं का सड़कों पर उतरना हमेशा से सत्तानशीनों के लिए खतरे की घंटी रहा है। मई 1968 के ऐतिहासिक छात्र प्रदर्शनों के दौर से ही हर फ्रांसीसी नेतृत्व युवा शक्ति के तेवर से वाकिफ रहा है। उस समय राष्ट्रपति चार्ल्स डी गॉल ने इस अराजक स्थिति को 'शियांली' कहकर संबोधित किया था, जिसका आशय पूरी तरह से फैली अव्यवस्था से था। तब से लेकर आज तक हर सरकार युवाओं के आक्रोश से भयभीत रहती है, क्योंकि छात्र आंदोलन प्रायः अप्रत्याशित और बिना किसी तय ढांचे के होते हैं, जिससे सीधे तौर पर बातचीत की कोई निश्चित रूपरेखा नहीं बन पाती। इसके अलावा जब युवा विरोध में उतरते हैं, तो समाज के अन्य असंतुष्ट तबके भी उनके साथ जुड़ने लगते हैं। आम जनता का झुकाव भी अक्सर प्रदर्शनकारी युवाओं की ओर सहानुभूतिपूर्ण रहता है। यदि पुलिस कार्रवाई के दौरान किसी युवा को गंभीर चोट लग जाए या हालात बिगड़ जाएं, तो उसके परिणाम असीमित और बेहद विस्फोटक हो सकते हैं। मौजूदा परिदृश्य में जब राष्ट्रपति पद के चुनाव सिर पर हैं, तो बैरिकेड्स पर खड़े ये किशोर सरकार की नींद उड़ा रहे हैं।
हिंसा का दायरा, आगजनी और भारी नुकसान
शुरुआती दिनों में माहौल में सिर्फ उत्साह और रोष दिखाई दे रहा था, लेकिन पिछले कुछ दिनों में यह विरोध कई जगहों पर हिंसक झड़पों में तब्दील हो गया। गुरुवार को इस आंदोलन का सबसे उग्र रूप सामने आया, जब देश भर के सैकड़ों लीसी (जहां 15 से 18 वर्ष की आयु के किशोर अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करते हैं) पर नाकेबंदी कर दी गई। शुक्रवार को हालात में थोड़ा सुधार दर्ज किया गया, फिर भी छात्रों और स्टाफ की सुरक्षा के मद्देनजर लगभग 400 लीसी को बंद रखना पड़ा। अब इस आंदोलन में विश्वविद्यालयों के छात्र भी शामिल होने लगे हैं, जिससे इसका दायरा और विस्तृत हो गया है।
हिंसक घटनाओं के चलते करोड़ों यूरो की संपत्ति का नुकसान हुआ है। नांत शहर में एक लीसी का मुख्य हॉल आग लगने के कारण पूरी तरह तबाह हो गया। देश भर में अनगिनत स्कूलों के मुख्य द्वारों पर आगजनी की घटनाएं हुईं, जहां कचरे और टायरों को जलाकर प्रवेश द्वार बंद कर दिए गए। शिक्षा मंत्री एडुआर्ड जेफ्रे के अनुसार, इस हिंसा में 40 स्कूल प्रमुखों समेत 65 शिक्षण कर्मचारी घायल हुए हैं। उन्होंने बताया कि घायल हुए अधिकांश कर्मियों का कहना था कि जिनका वे सामना कर रहे थे, वे उनके अपने छात्र नहीं थे बल्कि बाहरी तत्व थे।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस दौरान करीब 300 पुलिसकर्मियों और अग्निशामकों को चोटों के इलाज के लिए अस्पताल ले जाना पड़ा। अब तक लगभग 2,000 लोगों को हिरासत में लिया गया है, जिनमें अधिकांश नाबालिग हैं। दूसरी ओर, छात्र संगठनों का दावा है कि पुलिसिया कार्रवाई में भी प्रदर्शनकारियों की एक लंबी फेहरिस्त घायल हुई है। छात्र प्रतिनिधियों के अनुसार, दो किशोरों की आंखों में बेहद गंभीर चोटें आई हैं और एक अन्य छात्र के कई दांत टूट गए हैं।
वित्तीय तंगी और शिक्षा बजट में भारी कटौती की योजना
यह संकट केवल छात्रों की मांगों को पूरा करने तक सीमित होता तो शायद समाधान आसान होता, लेकिन इसका सामाजिक और आर्थिक पहलू स्थिति को कहीं अधिक पेचीदा बना रहा है। यद्यपि छात्रों की मांगें काफी हद तक अस्पष्ट हैं, लेकिन उनकी मुख्य चिंता धन की भारी कमी को लेकर है। वे अधिक शिक्षकों की भर्ती, कक्षाओं में छात्रों की सीमित संख्या और स्कूल भवनों की बेहतर मरम्मत व रखरखाव की मांग कर रहे हैं। फ्रांस के आम नागरिक भी इस बात से काफी हद तक सहमत हैं कि शिक्षा प्रणाली में हालात लगातार बदतर होते जा रहे हैं क्योंकि सरकारी खजाने में पैसों की बेहद कमी है। सरकार से बजट बढ़ाने के लिए प्रदर्शन करना फ्रांस की एक पुरानी संस्कृति रही है और सत्ताधारी दल भी इसे अमूमन जायज मानते हैं।
हालांकि, इस बार सरकार की वित्तीय स्थिति अत्यधिक गंभीर है। प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने आगामी वर्ष के लिए अपने बजट का मसौदा सार्वजनिक किया है, जिसका स्पष्ट संकेत सरकारी खर्चों में सख्त कटौती करना है। इस मसौदे में उन्होंने सरकारी व्यय से 54 अरब यूरो (लगभग 46 अरब पाउंड) कम करने का वादा किया है। यह अलग बात है कि वे इस विशाल कटौती को व्यावहारिक रूप से लागू कर पाएंगे या नहीं, लेकिन यह साफ हो चुका है कि सामाजिक असंतोष को शांत करने के लिए अंधाधुंध पैसा बांटने का दौर अब फ्रांस में खत्म हो रहा है। ऐसे में भोजन कक्ष में बेहतर इन्सुलेशन या स्कूल में अतिरिक्त नर्स की मांग कर रहे छात्रों को शायद निराशा ही हाथ लगेगी।
वामपंथी राजनीति और चुनावी समीकरणों का तनाव
फ्रांसीसी प्रशासन और दक्षिणपंथी खेमे में सबसे बड़ा डर यह है कि इन छात्र प्रदर्शनों को कट्टर वामपंथी ताकतों द्वारा अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी दलों का सीधा आरोप है कि इस छात्र उपद्रव के पीछे ला फ्रांस इंसोमिज यानी एलएफआई पार्टी और उसके प्रमुख राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार ज्यां-ल्यूक मेलेंशों का हाथ है। एलएफआई के नेता अक्सर प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच नजर आए हैं। विशेष रूप से पेरिस के उपनगर सेंट-डेनिस के मेयर बल्ली बागायोको की कड़ी आलोचना हुई, जब उन्होंने बयान दिया कि हिंसा कभी-कभी वैध हो सकती है।
पेरिस पुलिस विभाग की एक लीक हुई आंतरिक रिपोर्ट ने सीन-सेंट-डेनिस में शुरू हुए इस आंदोलन की पड़ताल की है। रिपोर्ट के निष्कर्ष के अनुसार, छात्रों को छात्र संघों के धुर वामपंथी तत्वों और एलएफआई जैसे राजनीतिक संगठनों द्वारा उकसाया जा रहा है। रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया कि यह तनाव राष्ट्रीय चुनावों से पहले अपने वैचारिक एजेंडे को थोपने की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। इस निष्कर्ष के समर्थन में रिपोर्ट ने उल्लेख किया कि प्रदर्शनों में ऐसे लोग मौजूद थे जो स्वयं लीसी के छात्र नहीं थे, मांगों में स्पष्टता का अभाव था, और वहां फलस्तीनी तथा अल्जीरियाई झंडे लहराए जा रहे थे। इसके अलावा पुलिस थानों के बाहर अतिरिक्त विरोध प्रदर्शन करने की रणनीति भी धुर वामपंथी तौर-तरीकों से मेल खाती है।
युवा मतदाताओं का झुकाव और आगामी चुनावी परिदृश्य
एलएफआई ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि वह केवल एक जायज जनआंदोलन को स्वाभाविक समर्थन दे रही है। खुद 75 वर्षीय वरिष्ठ नेता मेलेंशों ने गुरुवार को छात्रों से हिंसा से दूर रहने की अपील करते हुए कहा कि हिंसा केवल हमारे दुश्मनों के हितों की पूर्ति करती है। बहरहाल, राजनीतिक विश्लेषकों और विरोधियों का मानना है कि मेलेंशों बहुत सोच-समझकर अपनी राजनीतिक बिसात बिछा रहे हैं। मई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के दूसरे दौर में उनकी टक्कर कट्टर दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन से होने की प्रबल संभावना जताई जा रही है।
जनमत सर्वेक्षणों के अनुसार, फ्रांस में 18 से 24 वर्ष के युवाओं में मेलेंशों को लगभग 40 प्रतिशत का भारी समर्थन प्राप्त है। यह समर्थन विशेष रूप से उन घनी आबादी वाले उपनगरों में केंद्रित है जहां प्रवासियों की तादाद अधिक है और जहां मेलेंशों की 'नए फ्रांस' तथा सांस्कृतिक मिश्रण की भाषा को खूब सराहा जाता है। इसके बावजूद, एक कड़वी हकीकत यह भी है कि फ्रांसीसी चुनावों में युवा वर्ग सबसे ज्यादा मतदान से दूर रहता है। ऐसे में चुनाव नजदीक आने पर एलएफआई की रणनीति यह दिखाने की है कि वह लगातार युवाओं के हक में खड़ी है, ताकि वे मतदान केंद्रों तक पहुंचें।
दूसरी ओर, सभी प्रमुख चुनावी सर्वेक्षण यह भी संकेत दे रहे हैं कि यदि दूसरे दौर के सीधे मुकाबले में मेलेंशों का सामना ले पेन से होता है, तो उन्हें भारी अंतर से हार का सामना करना पड़ सकता है। यदि ऐसा राजनीतिक परिदृश्य बनता है, तो फ्रांस गहरे राजनीतिक अस्थिरता के दौर में प्रवेश कर सकता है, और स्कूलों से शुरू हुए हालिया हिंसक प्रदर्शन उसी आने वाले तूफान की पूर्व चेतावनी साबित हो सकते हैं।


















