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असम की खास बाँस कोंपल से गाजीपुर के मेले में बनी शहद वाली अनोखी मिठाईखानपान
5 जुल॰ 2026, 6:37 am (25 दिन पहले)· 2

असम की खास बाँस कोंपल से गाजीपुर के मेले में बनी शहद वाली अनोखी मिठाई

गाजीपुर मेले में असम से आए विक्रेता संतोष कुमार गुप्ता बाँस की कोमल कोंपलों से बना और शहद में पका मुरब्बा बेच रहे हैं, जिसे देखकर लोग हैरान होकर इसकी बनावट के बारे में पूछ रहे हैं।

गाजीपुर के मेले में इन दिनों एक ऐसी मिठास चर्चा में है, जिसे देखकर लोग रुक जाते हैं। असम से आए विक्रेता संतोष कुमार गुप्ता अपनी दुकान पर बाँस की कोमल कोंपलों से बना मुरब्बा बेच रहे हैं, वो भी चीनी की जगह शुद्ध शहद में तैयार करके। आम, आंवला और बेल के मुरब्बे तो अक्सर दिखते हैं, लेकिन बाँस से बना मुरब्बा पहली बार देखने वाले हर किसी की जिज्ञासा जगा रहा है।

किस बाँस से बनता है यह मुरब्बा

संतोष कुमार गुप्ता के मुताबिक इसमें आम तौर पर मिलने वाला स्थानीय बाँस काम नहीं आता। इसके लिए असम और नागालैंड के आसपास पाई जाने वाली एक खास प्रजाति के बाँस की मुलायम कोंपलें चुनी जाती हैं। बाँस जब करीब 8 से 10 फीट ऊंचा हो जाता है, तभी उसकी वे कोंपलें मुरब्बे के लायक मानी जाती हैं।

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कोंपलों से मुरब्बे तक का सफर

तैयारी की शुरुआत बाँस की नई और नरम कोंपलों को छीलकर छोटे टुकड़ों में काटने से होती है। इसके बाद इन टुकड़ों को कई बार पानी से धोया जाता है, ताकि उनकी प्राकृतिक कड़वाहट कम हो सके। फिर इन्हें 20 से 30 मिनट तक उबाला जाता है, और कई परंपरागत तरीकों में यह उबालने की प्रक्रिया 2 से 3 बार दोहराई जाती है। संतोष कुमार गुप्ता बताते हैं कि प्रोसेसिंग के दौरान कोंपलों को साफ करने के साथ-साथ उनका रेशा भी अलग किया जाता है, तभी जाकर उन्हें दोबारा उबालकर आगे की तैयारी की जाती है।

चाशनी की जगह शहद क्यों

इसके बाद अलग से शहद और पानी मिलाकर चाशनी तैयार की जाती है। उबली हुई बाँस की कोंपलों को इस चाशनी में डालकर धीमी आंच पर तब तक पकाया जाता है, जब तक चाशनी कोंपलों के भीतर तक न समा जाए। अंत में चीनी की जगह शहद ही मिलाया जाता है। विक्रेता का कहना है कि शहद न सिर्फ मुरब्बे का स्वाद बढ़ाता है, बल्कि उसकी शेल्फ लाइफ यानी सुरक्षित रखने की अवधि भी बढ़ा देता है।

सेहत को लेकर दावा, लेकिन पुष्टि नहीं

संतोष कुमार गुप्ता का कहना है कि असम में यह मुरब्बा बरसों से खाया जाता रहा है और वहां के लोग इसे अपने पारंपरिक खान-पान का हिस्सा मानते हैं। उनका यह भी दावा है कि इसे नियमित खाने से शरीर को फायदा होता है, और लंबे समय तक सेवन करने पर कद यानी हाइट में भी फर्क महसूस हो सकता है। हालांकि इस दावे की कोई वैज्ञानिक पुष्टि सामने नहीं आई है, इसलिए इसे फिलहाल विक्रेता का अपना निजी अनुभव और दावा ही माना जाना चाहिए।

मेले में जिज्ञासा का केंद्र बना मुरब्बा

गाजीपुर मेले में घूमने आए ज्यादातर लोगों ने बाँस का मुरब्बा पहली बार देखा है, इसलिए यह स्टॉल उत्सुकता का बड़ा केंद्र बना हुआ है। कई लोग रुककर इसकी बनावट और स्वाद के बारे में पूछताछ कर रहे हैं, तो कुछ इसे खरीदकर चखने में भी दिलचस्पी दिखा रहे हैं।

सवाल-जवाब

बाँस का यह मुरब्बा किसने और कहां बनाया है?
असम से आए विक्रेता संतोष कुमार गुप्ता गाजीपुर मेले में इसे बना और बेच रहे हैं।
इसमें चीनी की जगह क्या इस्तेमाल होता है?
चीनी की जगह शहद और पानी से चाशनी तैयार की जाती है।
किस तरह के बाँस का इस्तेमाल होता है?
असम और नागालैंड के आसपास मिलने वाली खास प्रजाति के बाँस की कोमल कोंपलें, जब बाँस 8 से 10 फीट ऊंचा हो जाता है।
क्या इसे खाने से सच में कद बढ़ता है?
विक्रेता का यह दावा है, लेकिन इसकी कोई वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
बाँस की कड़वाहट कैसे दूर की जाती है?
कोंपलों को कई बार पानी से धोकर 20-30 मिनट तक उबाला जाता है, और यह प्रक्रिया कई बार 2-3 बार दोहराई जाती है।
शहद मिलाने का क्या फायदा बताया गया है?
विक्रेता के मुताबिक शहद स्वाद बढ़ाने के साथ मुरब्बे की शेल्फ लाइफ भी बढ़ाता है।
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