बिहार का सीतामढ़ी जिला अपनी सांस्कृतिक पहचान के साथ अपनी पारंपरिक रसोई के लिए भी मशहूर है। जिले के भूतही इलाके में तैयार होने वाली रसभरी आम पकवानों से काफी अलग है। यह व्यंजन करीब 150 वर्षों से स्थानीय खान-पान की परंपरा का अटूट हिस्सा बना हुआ है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोकर रखी गई इस पारंपरिक रेसिपी को आज भी उसी सादगी से परोसा जा रहा है। वर्तमान में दुकान का संचालन कर रहे महेश कुमार का कहना है कि उनके दादा के दौर से ही यह पकवान इसी खास तरीके से बन रहा है। बदलते जमाने के बीच न तो इसकी ताजगी बदली है और न ही इसके पारंपरिक स्वाद में कोई फर्क आया है।
शुद्ध बेसन और सरसों तेल में पकती है यह खास रेसिपी
इस व्यंजन को बनाने का तरीका पूरी तरह पारंपरिक और घरेलू है। इसे बनाने के लिए शुद्ध चने के बेसन, बारीक कटी प्याज और चुनिंदा घरेलू मसालों का एक संतुलित मिश्रण तैयार किया जाता है। इसके बाद इसे शुद्ध सरसों के तेल में धीमी और मध्यम आंच पर धीरे-धीरे सेका जाता है। इस तैयारी में किसी भी बनावटी रंग या रासायनिक पदार्थ का इस्तेमाल नहीं किया जाता। बेसन और मसालों के सही मेल के कारण यह पकवान बाहर से बेहद कुरकुरा रहता है, जबकि अंदर से पूरी तरह मुलायम और रसीला बना रहता है। शुद्ध कड़वे तेल की सौंधी महक इसे दूसरे स्नैक्स से बिल्कुल अलग पहचान दिलाती है।
चूड़ा और मुढ़ी के साथ अनोखा स्वाद, दाम सिर्फ 10 रुपये
सीतामढ़ी के ग्रामीण इलाकों में इसे परोसने और खाने का ढंग भी बेहद पारंपरिक है। यहां के बाशिंदे और दूर-दराज से आने वाले मुसाफिर इसे सादा खाने के बजाय स्थानीय चूड़ा या मुढ़ी के साथ मिलाकर खाना पसंद करते हैं। कुरकुरी रसभरी और चूड़ा-मुढ़ी का यह मेल एक स्वादिष्ट और भरपेट नाश्ता बन जाता है। आधुनिक समय में बढ़ती महंगाई के बावजूद इसकी कीमत महज 10 रुपये प्रति पीस रखी गई है। सस्ता और सुलभ होने की वजह से हर वर्ग के लोग बिना किसी झिझक के इसका रोजाना आनंद ले पाते हैं।
20 से ज्यादा गांवों में फैली लोकप्रियता, रोजाना सैकड़ों की बिक्री
बोहा स्थित इस प्रतिष्ठान की शोहरत सिर्फ एक कस्बे तक सीमित नहीं है, बल्कि आसपास के 20 से अधिक गांवों के ग्रामीण इसका स्वाद लेने यहां खींचे चले आते हैं। जिले के बाहर से आने वाले लोग और दूसरे राज्यों के मुसाफिर भी जब सीतामढ़ी पहुंचते हैं, तो इस ऐतिहासिक स्वाद को चखना नहीं भूलते। एक संचालक के मुताबिक, उनकी दुकान पर हर रोज औसतन 400 से ज्यादा रसभरी के पीस बिक जाते हैं। इसके साथ ही यहां कचरी और गरमा-गरम पकौड़ों की भी लगातार भारी मांग बनी रहती है। इलाके में इस एक दुकान की बड़ी बिक्री के अलावा आसपास करीब एक दर्जन अन्य दुकानें भी मौजूद हैं, जो इस जायके की जबरदस्त दीवानगी को बयां करती हैं।

















