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शुद्ध घी की महक और चाशनी का जादू, मिर्जापुर के बेलतर में खिंचे चले आते हैं स्वाद के शौकीनखानपान
6 अक्तू॰ 2026, 1:37 pm (14 मिनट पहले)· 0

शुद्ध घी की महक और चाशनी का जादू, मिर्जापुर के बेलतर में खिंचे चले आते हैं स्वाद के शौकीन

मिर्जापुर के बेलतर इलाके में शुद्ध घी में तली कुरकुरी जलेबी लोगों की पहली पसंद बन चुकी है, जिसे चखने दूर-दूर से खरीदार पहुंच रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में शाम ढलते ही मिठास के शौकीनों की कदमताल एक खास ठिकाने की ओर बढ़ने लगती है। बेलतर इलाके में मिलने वाली जलेबी ने अपने अनोखे जायके से स्थानीय लोगों के दिलों में खास जगह बना ली है। नाम में भले ही जोधपुर का जिक्र हो, लेकिन इसकी खुशबू और कुरकुरापन मिर्जापुर के खानपान का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। स्वाद ऐसा है कि जो कोई भी एक मर्तबा यहां का रुख करता है, वह बार-बार इसी दुकान पर खिंचा चला आता है।

मैदे, इलायची और शुद्ध घी का लाजवाब संगम

दुकानदार अर्जुन के अनुसार, इस लजीज मिठाई को तैयार करने की प्रक्रिया बेहद पारदर्शी और पारंपरिक है। इसमें किसी भी तरह की दिखावटी या असामान्य सामग्री का इस्तेमाल नहीं किया जाता। जलेबी का घोल शुद्ध मैदे से बनाया जाता है, जिसमें खुशबू और स्वाद को निखारने के लिए बारीक पिसी इलायची और अन्य जरूरी चीजें मिलाई जाती हैं। इसके बाद कारीगर सधे हुए हाथों से इसे खौलते हुए शुद्ध घी में गोल-गोल आकार देकर तलते हैं। घी में अच्छी तरह सिकने के बाद जब इसका रंग सुनहरा और बनावट कुरकुरी हो जाती है, तब इसे चीनी से तैयार किए गए गाढ़े सीरे में डुबोया जाता है।

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दस से पंद्रह मिनट में तैयार होती है गरमा-गरम मिठास

कारीगरी और समय के तालमेल को लेकर अर्जुन बताते हैं कि जलेबी को पूरी तरह तैयार करने में महज 10 से 15 मिनट का वक्त लगता है। चाशनी को अपने भीतर अच्छी तरह सोखने के बाद जब गरमा-गरम और खस्ता जलेबी कड़ाही से निकलती है, तो सीधे ग्राहकों की प्लेट में परोसी जाती है। इसका कुरकुरापन मुंह में घुलते ही चाशनी की मिठास बिखेर देता है। यही वजह है कि शाम होते ही गरमा-गरम जलेबी का लुत्फ उठाने वालों की कतारें लग जाती हैं।

चार घंटे की दुकानदारी और रोजाना का मुनाफा

दुकान के आर्थिक पहलू और समय सारिणी का ब्योरा देते हुए अर्जुन बताते हैं कि इसे तैयार करने में प्रतिदिन लगभग 1000 से 1500 रुपये की लागत आती है। दुकान रोजाना शाम 3 बजे खुलती है और शाम 7 बजे तक चलती है। यदि तैयार माल बच जाता है, तो दुकान को रात 8 बजे तक खुला रखा जाता है। महज चार से पांच घंटों के इस छोटे से अंतराल में ही करीब 4000 रुपये की दैनिक बिक्री दर्ज की जाती है। सारे खर्च निकालने के बाद प्रतिदिन लगभग 1570 रुपये का शुद्ध मुनाफा होने का दावा किया गया है।

स्वाद के दीवानों की जुबानी

यहां नियमित तौर पर पहुंचने वाले ग्राहक लक्ष्मीकांत राय का कहना है कि इस जलेबी का जायका एकदम लाजवाब और बेमिसाल है। उन्होंने जब पहली दफा इसे चखा था, तभी इसके मुरीद हो गए थे और उसके बाद से लगातार यहां चले आ रहे हैं। उनके मुताबिक, इस मिठास का स्वाद बिल्कुल राजस्थान के पारंपरिक मिष्ठानों जैसा अहसास कराता है। यही कारण है कि दूर-दराज के इलाकों से भी लोग बेलतर पहुंचकर इस गरमा-गरम जायके का आनंद लेते हैं।

सवाल-जवाब

मिर्जापुर में यह जलेबी की दुकान किस जगह स्थित है?
यह दुकान उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के बेलतर इलाके में स्थित है।
दुकानदार का क्या नाम है?
इस जलेबी की दुकान के संचालक और दुकानदार का नाम अर्जुन है।
जलेबी बनाने में किन मुख्य सामग्रियों का इस्तेमाल होता है?
इसे मैदे, इलायची और अन्य जरूरी सामग्री के घोल से तैयार कर शुद्ध घी में तला जाता है और फिर चीनी की चाशनी में डुबोया जाता है।
जलेबी तैयार होने में कितना समय लगता है?
दुकानदार के अनुसार जलेबी को तैयार होकर ग्राहकों तक पहुंचने में लगभग 10 से 15 मिनट का समय लगता है।
दुकान के खुलने और बंद होने का समय क्या है?
दुकान शाम 3 बजे से 7 बजे तक खुलती है, और माल बचा रहने पर रात 8 बजे तक चालू रहती है।
जलेबी बनाने में रोजाना कितनी लागत आती है?
दुकानदार के मुताबिक प्रतिदिन जलेबी तैयार करने में 1000 से 1500 रुपये की लागत आती है।
दुकान से प्रतिदिन कितनी बिक्री और मुनाफा होता है?
दुकान पर रोजाना करीब 4000 रुपये की बिक्री होती है और लगभग 1570 रुपये का शुद्ध मुनाफा होता है।
ग्राहक इसके स्वाद की तुलना किस जगह की मिठाई से करते हैं?
नियमित ग्राहक लक्ष्मीकांत राय के अनुसार इस जलेबी का स्वाद राजस्थान की पारंपरिक जलेबी जैसा महसूस होता है।
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