देवभूमि उत्तराखंड अपनी मनोरम पहाड़ियों के साथ-साथ अपने सादे और पौष्टिक खान-पान के लिए भी दुनिया भर में जानी जाती है। पहाड़ी रसोई की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहाँ बहुत ही कम और सुलभ सामग्री का इस्तेमाल करके बेहद स्वादिष्ट और सेहतमंद व्यंजन तैयार किए जाते हैं। इन्हीं खास पहाड़ी जायकों में शामिल है भांग के बीजों की चटनी। वैसे तो उत्तर भारत के घरों में भोजन के साथ टमाटर या हरे धनिये की चटनी परोसने का चलन आम है, लेकिन उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में भांग के भुने हुए बीजों से बनी चटनी हर भोजन की शान मानी जाती है। हाल के दिनों में यह पारंपरिक स्वाद केवल पहाड़ी घरों तक सीमित न रहकर दून घाटी के आधुनिक स्ट्रीट फूड का हिस्सा भी बन चुका है।
देहरादून के स्ट्रीट फूड में झोल मोमो और भांग चटनी का संगम
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में आजकल युवाओं और स्ट्रीट फूड के शौकीनों के बीच झोल मोमो की जबरदस्त मांग देखने को मिल रही है। मोमो के मसालेदार और तीखे झोल यानी सूपनुमा रसे के जायके को और अधिक समृद्ध बनाने के लिए अब उसमें पारंपरिक भांग के बीजों की चटनी मिलाई जा रही है। भांग के बीजों का एक अनोखा नटी यानी अखरोट जैसा सोंधा स्वाद होता है, जो पहाड़ी नींबू की खटास और मिर्च के तीखेपन के साथ मिलकर एक अद्भुत संयोजन बनाता है। जब इस चटनी को गर्मागर्म झोल मोमो के साथ परोसा जाता है, तो इसका स्वाद कई गुना बढ़ जाता है। यही कारण है कि देहरादून के फूड स्टॉलों और कैफे में यह फ्यूजन डिश बहुत तेजी से लोकप्रिय हो रही है।
औषधीय गुणों की खान: बिना किसी नशे का सुपरफूड
सामान्य तौर पर भांग का नाम सुनते ही लोग इसे किसी नशीले पदार्थ से जोड़कर देखने लगते हैं, लेकिन भांग के सूखे बीजों में किसी भी प्रकार का नशा या साइकोएक्टिव तत्व मौजूद नहीं होता है। इसके विपरीत, वैज्ञानिक और पोषण विशेषज्ञ भांग के बीजों को एक बेहतरीन सुपरफूड मानते हैं। इन बीजों में प्रचुर मात्रा में ओमेगा-3 और ओमेगा-6 फैटी एसिड, उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन, आहार संबंधी फाइबर और कई आवश्यक खनिज तत्व पाए जाते हैं। यह चटनी पाचन क्रिया को सुचारू बनाए रखने में मदद करती है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है। पहाड़ी इलाकों के बुजुर्ग अक्सर सर्दियों के मौसम में जोड़ों के दर्द और ठंड से राहत पाने के लिए भोजन में इस चटनी को शामिल करने की सलाह देते हैं।
उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत और मौसमी महत्व
उत्तराखंड की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में भांग के पौधे का विशेष स्थान रहा है। महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर भांग की पत्तियों से तैयार ठंडाई और प्रसाद का धार्मिक महत्व सर्वविदित है, वहीं इसके सूखे बीजों को दैनिक आहार का एक अनिवार्य हिस्सा माना जाता है। पहाड़ों में मानसून की बारिश और कड़ाके की सर्दियों के दिनों में भांग के बीजों से तरह-तरह के व्यंजन बनाए जाते हैं। चटनी के अलावा इसके बीजों का उपयोग स्थानीय सब्जियों और नमकीन में भी किया जाता है। माना जाता है कि इन बीजों की तासीर गर्म होती है, जो कड़ाके की ठंड के दौरान शरीर को अंदरूनी रूप से गर्माहट प्रदान करती है और मौसमी बीमारियों से बचाती है।
भांग की चटनी बनाने की आवश्यक सामग्री
इस स्वादिष्ट पहाड़ी चटनी को बनाने के लिए किसी जटिल सामग्री की आवश्यकता नहीं होती है। इसे बनाने के लिए मुख्य रूप से भांग के सूखे बीजों का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा स्वाद और खुशबू बढ़ाने के लिए तवे पर भुना हुआ जीरा, सूखी लाल मिर्च या हरी मिर्च, ताजा हरा धनिया और स्वादानुसार नमक की जरूरत होती है। चटनी में सही खटास लाने के लिए पारंपरिक रूप से पहाड़ी नींबू के रस या फिर अनारदाने के रस का इस्तेमाल किया जाता है। सभी मसालों, बीजों और खट्टे रस का सही अनुपात ही इस चटनी के बेजोड़ स्वाद का मुख्य रहस्य है।
चटनी तैयार करने की प्रामाणिक विधि
भांग की चटनी बनाने की प्रक्रिया बेहद सरल है। सबसे पहले एक सूखे तवे पर भांग के बीजों को धीमी आंच पर हल्का भून लिया जाता है। जब बीजों से हल्की-हल्की चटकने की आवाज आने लगे और सोंधी खुशबू फैलने लगे, तो गैस बंद करके बीजों को ठंडा होने के लिए रख दिया जाता है। इसके बाद भुने हुए बीजों को हरी मिर्च, भुने जीरे, लहसुन की कलियों और ताजे हरे धनिये के साथ पीसा जाता है। जब सभी सामग्रियां अच्छी तरह से पिसकर एकसार हो जाएं, तो अंत में इसमें ताजा नींबू का रस और नमक मिलाकर एक गाढ़ा और चिकना पेस्ट तैयार कर लिया जाता है।
सिलबट्टे की पिसाई बनाम आधुनिक मिक्सी का स्वाद
आजकल की व्यस्त जीवनशैली में अधिकतर लोग समय बचाने के लिए मिक्सी ग्राइंडर का सहारा लेते हैं, लेकिन पहाड़ी बुजुर्गों का मानना है कि भांग की चटनी का असली और प्रामाणिक स्वाद केवल सिलबट्टे पर ही आ सकता है। जब सिलबट्टे के भारी पत्थरों के बीच भांग के बीज और ताजे मसाले धीरे-धीरे पिसते हैं, तो बीजों के अंदर मौजूद प्राकृतिक तेल और मसालों की सुगंध पूरी तरह से निकलकर बाहर आती है। मिक्सी में तेज ब्लेड की गर्मी के कारण यह प्राकृतिक तेल और सौंधापन अक्सर कम हो जाता है। यही पारंपरिक पिसाई का तरीका इस चटनी को एक खास पहचान देता है।
मोमो से परे: हर व्यंजन के साथ बेजोड़ जुगलबंदी
भांग की यह चटनी केवल झोल मोमो या स्ट्रीट फूड तक ही सीमित नहीं है। पहाड़ी घरों में इसे पारंपरिक खिचड़ी, मंडुवे की रोटी, दाल-चावल और विभिन्न प्रकार के पराठों के साथ भी बड़े चाव से खाया जाता है। यदि सादे से सादे भोजन के साथ भी एक चम्मच भांग की चटनी परोस दी जाए, तो वह पूरे खाने के जायके को दोगुना कर देती है। यही वजह है कि उत्तराखंड घूमने आने वाले देशी-विदेशी पर्यटक भी इस अनूठे पहाड़ी स्वाद के कायल हो रहे हैं और यह चटनी अब देवभूमि की खान-पान संस्कृति का एक अटूट प्रतीक बन चुकी है।



















