त्योहारों या मांगलिक मौकों पर घर में पारंपरिक पकवान बनाते समय दूध से तैयार होने वाली मुख्य सामग्री का चयन अक्सर लोगों को असमंजस में डाल देता है। डेयरी या हलवाई की दुकान पर जाने पर कोई खोया मांगता है तो कोई मावा कहता है, और कई बार विक्रेता भी इन दोनों शब्दों को एक दूसरे के बदले इस्तेमाल कर लेते हैं। ऐसे में मन में यह दुविधा पैदा होना स्वाभाविक है कि क्या खोया और मावा वाकई दो अलग चीजें हैं या फिर केवल जुबान और बोलचाल का अंतर है। सही जानकारी न होने पर घर में बनने वाले पेड़े, बर्फी, कलाकंद, गुझिया या गुलाब जामुन का स्वाद और उसकी बनावट बिगड़ सकती है, इसलिए रसोई में जाने से पहले इनके वास्तविक स्वरूप को समझना बहुत जरूरी है।
क्षेत्रीय बोलचाल का फर्क और तैयार करने की समान प्रक्रिया
भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो भारत के अलग-अलग हिस्सों में एक ही दूध उत्पाद को अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। उत्तर भारत के राज्यों में इसे आमतौर पर खोया कहा जाता है। दूसरी तरफ राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे पश्चिमी और मध्यवर्ती इलाकों में लोग इसे मावा या खवा के नाम से पहचानते हैं। हकीकत यह है कि बुनियादी तौर पर खोया और मावा दोनों दूध को गाढ़ा करके तैयार किए जाने वाले एक ही उत्पाद के दो नाम हैं। इन्हें बनाने के लिए शुद्ध दूध को भारी तले की कड़ाही में धीमी अथवा मध्यम आंच पर लगातार उबाला जाता है। जैसे-जैसे दूध में मौजूद पानी भाप बनकर उड़ता जाता है, बर्तन में केवल दूध के ठोस तत्व बचते हैं। आखिर में जो गाढ़ा और क्रीमी मिश्रण शेष रहता है, वही खोया या मावा कहलाता है। इसलिए इन्हें दो बिल्कुल अलग चीजें मानना तकनीकी रूप से सही नहीं है।
बनावट और नमी के आधार पर खोया या मावा के प्रकार
यद्यपि नाम एक ही उत्पाद के हैं, लेकिन बाजार में इनकी बनावट और उनमें बची नमी के हिसाब से अलग-अलग किस्में उपलब्ध होती हैं। मिठाई की रेसिपी के मुताबिक खोया मुख्य रूप से दो तरह की बनावट में मिलता है, जिसे समझकर खरीदना चाहिए
- नरम और चिकना खोया: इस किस्म में नमी की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है। इसकी बनावट एकदम मुलायम, मखमली और चिकनी होती है। जब आपको ऐसा मिश्रण तैयार करना हो जिसे आसानी से गूंथा जा सके या एकसार मिलाया जा सके, तब यह सबसे उपयोगी साबित होता है। पेड़ा, चिकनी बर्फी और कुछ खास भरावन वाली मिठाइयों के लिए यह पहली पसंद बनता है। अधिक नमी होने की वजह से इसे पकाते समय आंच पर खास ध्यान रखना पड़ता है ताकि यह चिपके नहीं।
- दानेदार खोया: इस प्रकार के मावे में नमी कम रखी जाती है और इसकी बनावट थोड़ी खुरदरी होती है, जिसमें छोटे-छोटे दाने साफ दिखाई देते हैं। कई पारंपरिक भारतीय मिठाइयों में यही दानेदार अहसास पसंद किया जाता है। कलाकंद, दानेदार बर्फी और गुझिया की फिलिंग तैयार करने के लिए दानेदार खोया सबसे उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि यह भरावन को गीला किए बिना बढ़िया स्वाद और कसावट देता है।
दुकान से खरीदते समय गुणवत्ता की पहचान कैसे करें
बाजार से खोया या मावा लेते समय केवल नाम पर भरोसा करने के बजाय उसकी ताजगी, रंग और महक की जांच करना बहुत जरूरी है। सबसे पहले उत्पाद को सूंघकर देखें। ताजे और शुद्ध खोये में हमेशा ताजे उबले दूध जैसी स्वाभाविक और भीनी महक आनी चाहिए। यदि उसमें से खट्टी, बासी या किसी भी तरह की अजीब दुर्गंध आ रही हो, तो उसे बिल्कुल न खरीदें। इसके अलावा उसके रंग पर नजर डालें; बहुत ज्यादा पीलापन, अस्वाभाविक चमक या चिपचिपापन खराब गुणवत्ता का संकेत हो सकता है। किसी भी मिलावट या बासीपन से बचने के लिए हमेशा साफ-सफाई रखने वाली विश्वसनीय डेयरी या दुकान का ही चुनाव करें। दुकान पर खड़े होकर यह स्पष्ट रूप से पूछें कि उनके पास मौजूद खोया नरम किस्म का है या दानेदार, जिससे आप अपनी रेसिपी के हिसाब से सही सामग्री घर ला सकें।
घर पर शुद्ध खोया तैयार करने का आसान तरीका
यदि आप बाजार की शुद्धता को लेकर आशंकित हैं, तो इसे बहुत आसानी से घर की रसोई में भी तैयार किया जा सकता है। इसके लिए केवल शुद्ध दूध और एक भारी तले वाले बर्तन की आवश्यकता होती है। दूध को चौड़े और मोटे तले के बर्तन में डालकर धीमी से मध्यम आंच पर पकने के लिए रख दें। इस दौरान एक बड़े चम्मच या करछी से तली को लगातार चलाते रहना आवश्यक है, ताकि दूध बर्तन के पेंदे में चिपककर जले नहीं। जैसे-जैसे पानी वाष्पीकृत होगा, दूध पहले गाढ़ा रबड़ी जैसा बनेगा और फिर धीरे-धीरे ठोस रूप ले लेगा। जब पूरा पानी सूख जाए और गाढ़ा द्रव्य कड़ाही छोड़ने लगे, तब आपका घर का बना ताजा खोया तैयार हो जाता है।



















