झारखंड के कोडरमा जिले के ग्रामीण इलाकों में सादे खान-पान को बेहद अनोखे देसी तौर-तरीकों से बेहद लजीज बना दिया जाता है। वहां की रसोई में तैयार होने वाले पकवान अपनी खास महक और मिट्टी से जुड़े स्वाद के लिए पहचाने जाते हैं। इसी पारंपरिक खान-पान का एक नायाब नमूना है लकड़ी के कोयले की मदद से तैयार की जाने वाली खास स्मोकी टमाटर की चटनी। गांव-देहात में बनने वाली यह चटनी अपनी सोंधी खुशबू, सरसों के कच्चे तेल के तीखेपन और कोयले के धुएं के चलते खाने की थाली का आकर्षण बन जाती है।
धीमी आंच पर टमाटर भूनने की पारंपरिक तकनीक
इस अनूठी चटनी को बनाने का तरीका काफी सरल मगर बेहद सधा हुआ है। स्थानीय गृहणी राधिका प्रजापति के अनुसार, इसकी शुरुआत ताजे और पके हुए टमाटर को पानी से अच्छी तरह धोने से होती है। साफ करने के उपरांत टमाटर को धीमी आंच पर सीधे पकाया जाता है। भूनते वक्त टमाटर को लगातार उलटते-पलटते रहना बेहद जरूरी होता है, ताकि उसकी बाहरी परत जले बिना चारों तरफ से एकसमान सिक जाए और टमाटर अंदर तक पूरी तरह गलकर नरम हो जाए।
लहसुन और हरी मिर्च के साथ देसी मिलान
जब टमाटर भुनकर पूरी तरह तैयार हो जाता है, तो उसे आंच से उतारकर एक बर्तन में थोड़ी देर ठंडा होने के लिए रखा जाता है। सामान्य तापमान पर आने के बाद उसकी जली हुई ऊपरी परत यानी छिलका बेहद आसानी से अलग हो जाता है। छिलका उतारने के बाद टमाटर को मैश किया जाता है और उसमें लहसुन की कलियां तथा बारीक हरी मिर्च मिलाई जाती हैं। राधिका प्रजापति ने बताया कि इन सभी चीजों को हाथ या चम्मच से एकसार मिलाया जाता है और ऊपर से स्वादानुसार साधारण नमक डाला जाता है। इस स्तर तक यह एक साधारण टमाटर का चोखा या चटनी जैसी दिखती है, लेकिन अगला कदम इसे बिल्कुल असाधारण बना देता है।
दहकते अंगारे और सरसों तेल का धुआंधार तड़का
चटनी में असली देहाती सोंधापन लाने के लिए लकड़ी के कोयले का प्रयोग किया जाता है। इसके लिए लकड़ी के एक टुकड़े को आंच पर तब तक सुलगाया जाता है जब तक कि वह लाल अंगारे में तब्दील न हो जाए। पूरी तरह दहक जाने के बाद उस गर्म कोयले को बहुत सावधानी से एक चम्मच की सहायता से चटनी वाले बर्तन के ठीक बीच में रख दिया जाता है। इसके फौरन बाद उस लाल अंगारे के ऊपर थोड़ा सा शुद्ध सरसों का तेल डाला जाता है।
गर्म कोयले के संपर्क में आते ही सरसों का तेल घना धुआं छोड़ने लगता है। इस उठते हुए धुएं को चटनी के बर्तन के भीतर ही रोककर रखा जाता है, जिससे धुएं का पूरा अर्क और सरसों के तेल की भीनी महक चटनी के रेशे-रेशे में समा जाए। कुछ समय तक धुएं का असर जमने देने के बाद कोयले को बाहर निकाल दिया जाता है। इसके बाद पूरी चटनी को एक बार फिर अच्छी तरह मिला दिया जाता है, जिससे एक लाजवाब सोंधे स्वाद वाली देसी चटनी बनकर तैयार होती है।
बिना किसी तड़क-भड़क के बेमिसाल ग्रामीण जायका
राधिका प्रजापति ने स्पष्ट किया कि इस बेहतरीन चटनी को पकाने के लिए बाजार के किसी महंगे मसाले या अतिरिक्त सामग्री की कतई आवश्यकता नहीं होती। सिर्फ पका टमाटर, हरी मिर्च, लहसुन, नमक, कच्चा सरसों तेल और जलता कोयला मिलकर ऐसा स्वाद गढ़ते हैं जो बड़े-बड़े होटलों के खाने पर भारी पड़ता है। खासतौर पर गरमागरम सादे चावल के साथ इस स्मोकी चटनी का मेल ग्रामीण इलाकों में सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है। यह व्यंजन केवल भूख मिटाने का जरिया नहीं, बल्कि झारखंड के देहाती इलाकों की समृद्ध पाक कला और रसोई की सदियों पुरानी सूझबूझ का जीवंत उदाहरण है।



















